एक बार महर्षि गालब गलतफहमी के कारण चित्रसेन गंधर्व से रूठ गए। उन्होंने द्वारिका पहुंचकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा, चित्रसेन ने मेरा घोर अपमान किया है। मैं जीवित रहने की स्थिति में नहीं हूं।
श्रीकृष्ण ने कहा, आप निश्चिंत रहें। चित्रसेन अब जीवित नहीं रहेगा। नारद जी को जब यह जानकारी मिली, तो उन्होंने चित्रसेन को बताया कि श्रीकृष्ण उसके वध की प्रतिज्ञा ले चुके हैं। उन्होंने उसे सुभद्रा की शरण में जाकर प्राण बचाने की विधि बताई।
चित्रसेन ने किसी युक्ति से सुभद्रा जी से वचन ले लिया कि वह उसके प्राणों की रक्षा करेंगी और सुभद्रा जी के वचन की रक्षा के लिए अर्जुन तत्पर हो उठे। युधिष्ठिर ने अर्जुन को समझाया कि श्रीकृष्ण से विरोध उचित नहीं, पर अर्जुन ने कहा, मैं शरणागत को दिए वचन से हटने का पाप मोल नहीं ले सकता।
अंततः श्रीकृष्ण और अर्जुन आमने-सामने आ डटे। युद्ध का भयंकर दृश्य उपस्थित हो गया। अर्जुन ने भगवान शंकर से मदद की गुहार लगाई। महादेव प्रकट हुए। उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हुए कहा, अर्जुन आपका परम भक्त है। भक्तों के आगे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज गुण है। अर्जुन के प्राणों की रक्षा में ही आपका गौरव है।
श्रीकृष्ण भगवान शंकर की ओर देखकर मुस्कराए और अर्जुन को गले से लगा लिया। उन्होंने चित्रसेन को अभयदान दे दिया।