हवाओं में खोखले वायदे हैं। गलियों में प्रत्याशियों के प्यादे हैं। शोर का टेंशन नहीं है, मगर आश्वासन की दुर्गंध के मारे फेफड़े खराब हो रहे हैं। निर्लिप्त रहने वाला वोटर हलकान है। कैसा भेड़ियाधसान है।
चुनाव अब झुग्गी झोंपड़ियों और गांवों तक पहुंचकर अपना असर दिखा रहा है। बेटा बाप को आंखें दिखा रहा है। अमुक नेता ने अपने बेटे को पचास लाख का कर्ज दे रखा है और तुम हमें पांच सौ का कर्ज नहीं दे रहे। बाप कहता है, नेता बड़े आदमी होते हैं, मगर बेटा नहीं मानता। वह कहता है, मैं लाखों नहीं मांग रहा, सैकड़ों की बात है। आपकी इतनी तो औकात है। बेटे को कर्ज देना हर बाप का फर्ज बनता है।
आज शर्माइन पर शर्माजी हावी हो रहे हैं। देख लो कितना बड़ा नेता है, मगर उसके पास अपनी कोई गाड़ी नहीं है। तुम रोज गाड़ी की रट लगाती हो। इसलिए कार की बात अब मत करना। शर्माइन कहती हैं, चलो नहीं करेंगे, मगर उनकी पत्नी के पास जितनी ज्वेलरी हैं, उसका दशमलव एक प्रतिशत मुझे भी चाहिए। शर्माजी ने कार का जिक्र करके नई मुसीबत मोल ले ली।
बाप बेटे को टोकता है, तेरे इतने दोस्त घर में क्यों आते हैं? चीनी, चाय, दूध सब खत्म हो जाते हैं। बेटा बाप को झिड़कता है। कुछ नेता, लोगों को बुला-बुलाकर चाय पिला रहे हैं और एक आप हैं, मेरे दोस्तों को चाय पीने पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। ‘मैकडॉनाल्ड’ का पिज्जा इनको नहीं खिला पाने के अपराध बोध से मैं दबा जा रहा हूं और आप को चाय की पड़ी है।
बुजुर्ग पिता अपने बेटे से कहता है, मुझे सीढ़ियां चढ़वा दे, ताकि मैं छत पर शुद्ध हवा का सेवन कर सकूं। बेटा जवाब देता है, आपकी उम्र का नेता खंबे पर चढ़कर पोस्टर लगा आया और आप सीढ़ियां नहीं चढ़ पा रहे हैं। आपसे दस वर्ष बड़े नेता ऊंचे मंच पर लपककर चढ़ जाते हैं, और आप ऐसे थरथराते हैं।
यह आम चुनाव है, इसलिए यह हर एक को अपने रंग में रंग रहा है। अब चुनाव अपने असली रूप में घर-घर उतर रहा है।