चीन एआई परिदृश्य में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है-चीनी एआई फर्म डीपसीक ने हाल ही में अपने कम लागत वाले ओपन-सोर्स बड़े भाषा मॉडल के साथ उद्योग में खलबली मचाने और अमेरिकी तकनीकी दिग्गजों को चुनौती देने के लिए वैश्विक सुर्खियां बटोरीं। लेकिन सवाल यह है कि एआई के इस पूरे परिदृश्य में भारत कहां है? पिछले साल, भारत में 245 अरब डॉलर के प्रौद्योगिकी उद्योग की शीर्ष संस्था नैसकॉम (नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज) ने कहा था कि भारतीय एआई बाजार बढ़ रहा है और एआई कौशल उद्योग तथा राष्ट्र के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। नैसकॉम और डेलॉइट की एक संयुक्त रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की एआई प्रतिभा पूल वर्तमान में लगभग छह लाख से बढ़कर 2027 तक 12.5 लाख से अधिक होने की उम्मीद है। सरकार का सक्रिय रुख 1.2 अरब डॉलर के भारत एआई मिशन जैसी पहलों द्वारा चिह्नित ‘संप्रभु एआई’ हासिल करने की उसकी महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है। भाषिनी जैसी पहल- जो एक एआई-संचालित भाषा अनुवाद उपकरण है, जिसे क्षेत्रीय भाषाओं का समर्थन करने के लिए डिजाइन किया गया है- समावेशिता के लिए एआई का लाभ उठाने की भारत की क्षमता का उदाहरण है। हालांकि, खुद की क्षमताओं के बावजूद भारत की अपनी एआई यात्रा में काफी बाधाएं भी हैं। मौजूदा दौर में उन्नत सेमीकंडक्टर चिप तकनीकी नवाचार की रीढ़ हैं।
एआई, विशेषकर डीप लर्निंग को बड़े डाटासेट को संसाधित करने और जटिल गणना करने के लिए महत्वपूर्ण कंप्यूटेशनल शक्ति की जरूरत होती है। यह वह जगह है, जहां सेमीकंडक्टर, विशेष रूप से जीपीयू (ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट), टीपीयू (टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट) और एएसआईसी (एप्लिकेशन-स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड सर्किट) जैसे माइक्रोचिप चलन में आते हैं। भारत की प्रमुख चुनौतियों में एक आयातित सेमीकंडक्टर पर निर्भरता है।
भले ही भारत ने पूरी तरह से आयात पर निर्भर खिलाड़ी से सेमीकंडक्टर्स का निर्माता बनने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किया है, लेकिन जब ताइवान, दक्षिण कोरिया, अमेरिका जैसे स्थापित वैश्विक खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की बात आती है, तो इस उद्योग की अत्यधिक पूंजी-गहन प्रकृति भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। अन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि भले ही राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन और एनवीडिया जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी का उद्देश्य महत्वपूर्ण कमियों को दूर करना है, फिर भी एक आत्मनिर्भर हार्डवेयर पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए निरंतर निवेश और नवाचार की आवश्यकता होती है। भारत को एआई अनुसंधान और विकास का समर्थन करने के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण क्षमताओं के निर्माण और उन्नत कंप्यूटिंग बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश करने की आवश्यकता है। दूसरी चुनौती मानव संसाधन है। हालांकि, इंडिया एआई मिशन जैसी पहलें इस कमी को दूर कर रही हैं, लेकिन देश के भीतर प्रतिभा को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। एक अन्य जरूरी मुद्दा शहरी-ग्रामीण डिजिटल विभाजन है। बंगलूरू और हैदराबाद जैसे बड़े शहर नवाचार के रूप में उन्नति कर रहे हैं, जबकि विशाल ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल उपकरणों और अवसरों तक पहुंच का अभाव है। भाषिनी जैसे प्रोजेक्ट का लक्ष्य एआई का लोकतंत्रीकरण करना है, लेकिन इन प्रयासों को बढ़ाने के लिए कनेक्टिविटी, शिक्षा और सामर्थ्य में प्रणालीगत निवेश की आवश्यकता है। यदि भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि एआई का लाभ उसके सभी नागरिकों को मिले, न कि चुनिंदा लोगों को, तो डिजिटल विभाजन को पाटना होगा।
एआई की परिवर्तनकारी क्षमता अन्य जोखिम भी पैदा करती है, खासकर भारत जैसे विविध और विशाल आबादी वाले देश के लिए। ऐसे देश में जहां युवा बेरोजगारी गंभीर चुनौती बनी हुई है, स्वचालन लाखों नौकरियों को विस्थापित कर सकता है, खासकर विनिर्माण और सेवाओं जैसे क्षेत्रों में, जो कार्यबल के एक बड़े हिस्से को रोजगार देते हैं। मजबूत रीस्किलिंग कार्यक्रमों के बिना ये व्यवधान सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को गहरा कर सकते हैं।
भारत को अपने कार्यबल को बदलते नौकरी बाजार के लिए तैयार करने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी रीस्किलिंग और अपस्किलिंग कार्यक्रमों में निवेश करने की आवश्यकता है कि एआई के लाभों को समान रूप से साझा किया जाए। डिजिटल सिस्टम पर भारत की निर्भरता इसे साइबर सुरक्षा खतरों के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। चूंकि एआई डाटा पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है, इसलिए डाटा गोपनीयता, संरक्षण और सुरक्षा को लेकर चिंताएं हैं। भारत का डाटा संरक्षण कानून अब भी विकसित हो रहा है, और नागरिकों के व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा व एआई तकनीकों का दुरुपयोग रोकने के लिए और अधिक मजबूत नियमों की आवश्यकता है। वैश्विक एआई परिदृश्य में भारत की प्रतिभा, नवाचार और डाटा में इसकी ताकत इसे एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है, जबकि इसकी कमजोरियां रणनीतिक योजना और समावेशी नीति निर्माण की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। भारत में न केवल राष्ट्रीय प्रगति के लिए एआई का उपयोग करने की क्षमता है, बल्कि वैश्विक मंच पर न्यायसंगत और टिकाऊ एआई विकास के लिए एक उदाहरण भी स्थापित किया जा सकता है। दुनिया देख रही है।