हम अपनी राजनीति के अजीब मोड़ पर खड़े हैं! आप वाले आकाश गुंजाकर, दिल्ली का आसमान जीत चुके हैं। वे इसी आसमान का राष्ट्रीय विस्तार करने की उमंग में जुटे हैं। दूसरी तरफ इसी पार्टी की दिल्ली सरकार के मंत्री इतिहास की मांग और वक्त की नजाकत को न सुनते-समझते हुए, अपनी संवेदना और प्रतिबद्धता का बौनापन जाहिर करते जा रहे हैं। आप के पास कुर्सी से, कद से बड़े लोगों का इतना अकाल क्यों है? ऐसा क्यों है कि आप की तरफ से कुछ भी समझदारी भरा या संवेदनापूर्ण सुनना हो, तो लोगों को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक ही जाना पड़ता है? आप को बहुत तेजी से, बहुत बड़ा होने की जरूरत है, क्योंकि उसे हलाल करने वाली ताकतें तेजी से अपनी छुरियां तेज कर रही हैं। आप वाले समझें कि आम आदमी आपको कुर्सी तक पहुंचा तो सकता है, पर उस पर बैठने की हिकमत तो आपको खुद ही पैदा करनी होती है।
दो मामले, या कहूं कि तीन मामले देखें हम! दिल्ली के किसी अस्पताल में नवजात बच्ची की लाश कूड़े के ट्रक में फेंक दी गई और रोते-कलपते पिता को वहीं से उठाकर दे दी गई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। आम आदमी के प्रति हिकारत और बेदरकारी का आलम हमारे मन में इतना ही गहरा है! लेकिन दिल्ली में एक ऐसी सरकार बन गई, जो नाम से भी आम है और जिसका नजरिया भी आम आदमी जैसा ही है। कम-से-कम इतना भरोसा बन गया है कि कुछ हो या न हो, सुनवाई तो जरूर होगी। लेकिन हमने देखा कि आप सरकार के स्वास्थ्य मंत्री के पास इस संवेदनशील प्रसंग को सुनने का वक्त नहीं था। हम क्या करें, अस्पताल सरकारी है कि निजी और निजी है, तो हमारे करने जैसा कुछ नहीं है, जैसी दो-एक आधी-अधूरी, टालने वाली वैसी ही बातें हमने सुनीं, जैसी वर्षों से सुनते आए हैं। दूसरा कुछ नहीं होता, पर इतना तो होना ही था कि ऐसी खबर पाते ही मंत्री, उस अभागे पिता को अपनी गाड़ी में लेकर, उस अस्पताल को भागते दिखाई देते! बस, इतना होता, तो हवा बदलती दिखाई देती!
मामला क्या था, गलती कहां थी और किसकी थी, बच्ची की मौत के पीछे की सच्चाई क्या थी आदि अनेक बातों की परतें जब खुलतीं, तब खुलतीं; पहली जकड़न तो टूटती कि इस सरकार के किसी मंत्री के पास ऐसी बात पहुंचेगी, तो उसकी पहली प्रतिक्रिया होगी कि वह आम आदमी के साथ खड़ा होगा। पूछेगा कोई, अगर मंत्री यही करते रहेंगे, तो दूसरे काम कब करेंगे? जवाब सिर्फ इतना है कि कितनी ही सरकारें तो बनीं, और सब दूसरे जरूरी काम करते रहे, आदमी नहीं बने! यह सरकार और इसके मंत्री आदमी तो बने रहें!
दूसरा मामला कानून मंत्री द्वारा दिल्ली के सभी न्यायाधीशों को एक जगह बुलाने से संबंधित है। किसी को, किसी तरह का मुगालता नहीं होना चाहिए कि देश में चौतरफा पतन हुआ है। न्यायपालिका कि फौज कि कोई उच्चतम वैज्ञानिक संस्थान पतन से अछूता नहीं है। इसलिए आप सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने अगर सोचा हो कि दिल्ली सरकार को अपने न्यायाधीशों से बात करनी चाहिए, तो इसमें गलत कुछ भी नहीं है। लेकिन सरकार और न्यायपालिका के रिश्ते की नजाकत को कोई मंत्री कैसे भूल सकता है? कहते हैं न कि सरकार का इकबाल बन जाए, तो इस्तकबाल होने लगता है। इसलिए धीरज से अपना वह सब काम करने की जरूरत है, जिससे आम आदमी को सरकार की नीति और नीयत में फर्क समझ में आने लगे। और न्यायपालिका या न्यायाधीशों के स्तर पर कुछ करना जरूरी हो, तो उसके रास्ते खोजने होंगे।
बेहतर होता कि इसकी पहल मुख्यमंत्री के स्तर पर होती और इसे सरकार की बदली प्राथमिकताओं से न्यायाधीशों को अवगत कराने के रूप में प्रायोजित किया जाता। आप सरकार को इंदिरा गांधी वाली प्रतिबद्ध न्यायपालिका की तरफ तो जाना नहीं है न! हम तो मात्र यही चाहते हैं कि न्यायपालिका न्याय के प्रति प्रतिबद्ध हो; और ऐसी प्रतिबद्धता का सीधा मतलब होता है कि न्याय जल्दी और सस्ता मिले! हमारी न्यायपालिका को इसका एहसास होना चाहिए कि वह न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की इन बुनियादी कसौटियों से भटक रही है। लेकिन दिल्ली का कानून मंत्री न्यायाधीशों को यह पाठ पढ़ाने की सोचे, इसमें न्याय-विवेक की कमी रह जाती है। इस सरकार को कदम-कदम पर ऐसे विवेक की जरूरत पड़ेगी।
तीसरा मसला कश्मीर का है! यहां भी परिस्थिति-विवेक की जरूरत है। प्रशांत भूषण आप सरकार के मंत्री नहीं हैं, बल्कि आप की अंतरात्मा के प्रहरी हैं। इसलिए विवेक की यह तलवार उन पर गहरी लटकती है। ऐसे दूसरे मसले भी हो सकते हैं, जिनके बारे में प्रशांत भूषण की भावनाएं अत्यंत तीव्र हों, लेकिन देश में उसकी मनोभूमिका तैयार करना भी उनकी ही जिम्मेदारी है।
जब आप सरकार की जिम्मेदारी संभालते हैं, तब कब, क्या कहना और कैसे कहना इसका विवेक रखना रणनीति नहीं, जिम्मेदारी बन जाती है। कश्मीर का नासूर इतना गहरा और जटिल बन गया है कि उसे सामान्य बयानों से हल तो नहीं ही किया जा सकता है। प्रशांत भूषण समेत आप के तमाम नेतृत्व वर्ग को इसकी पहली और अंतिम सावधानी रखनी ही होगी कि वे समस्याओं को उलझाने वाला और सांप्रदायिक संकीर्णता वाले तत्वों को पहल लेने का मौका देने वाला न तो कुछ कहेंगे, न ही करेंगे। अप्रैल-मई 2014 के बाद हो सकता है कि यही कश्मीर हो और सामने सीधे प्रशांत भूषण खड़े हों। तब देख लेंगे कि वह क्या कहते और करते हैं। अभी तो हम सब यही देखें कि दिल्ली में ये कैसे चलते हैं और क्या कहते हैं।