भारत के परिवार कानून तलाक को हतोत्साहित करने के लिए बनाए गए हैं, और इस दृष्टि से ये काफी सफल भी हुए हैं : वर्ष 2011 की जनगणना में जीवन साथी से अलग हो चुके लोगों की संख्या वास्तव में तलाक हो चुके लोगों की तुलना में तीन गुना थी। यानी तलाक के कम आंकड़े से यह नहीं मानना चाहिए कि भारत में पति-पत्नी में अलग होने की प्रवृत्ति कम है। वहां की कानून संहिता तलाक की जो वजहें बताती हैं, वे संकीर्ण हैं, जैसे क्रूरता, ठीक न होने वाला कोढ़, अध्यात्म की दुनिया में चले जाने के कारण सांसारिक संबंधों में दिलचस्पी न रखना आदि। तलाक चाहने वाले अनेक लोगों ने जीवन साथी की क्रूरता को इसका कारण बताया, पर क्रूरता को परिभाषित करना बहुत कठिन है, और यह तय करना जज के विवेक पर निर्भर है।
वर्ष 2007 में वहां सर्वोच्च न्यायालय के एक पैनल ने घोषित किया था कि तलाक के लिए कोई एक सामान्य मानक तय नहीं किया जा सकता। किसी एक खास मामले में जो क्रूरता है, दूसरे मामले में उसे क्रूरता नहीं कहेंगे। यहां जजों द्वारा तलाक की मंजूरी देते हुए लिखे गए कुछ फैसलों के उदाहरण पेश हैं, जिसमें तलाक के कारण बताए हैं-
1. पत्नी द्वारा पति को उसके माता-पिता के घर से अलग रहने के लिए दुष्प्रेरित करना-फैसले में लिखा गया-हिंदू समाज में पुत्र द्वारा माता-पिता की देखभाल करने को एक पवित्र उत्तरदायित्व माना गया है। अगर कोई पत्नी पति पर इस प्रथा को न मानने के लिए दबाव डालती है, तो उसके पास कोई तार्किक वजह होनी चाहिए। स्वाभाविक तौर पर कोई भी पति इसे बर्दाश्त नहीं करेगा, और कोई पुत्र अपने वृद्ध माता-पिता से अलग होना नहीं चाहेगा।
2. 'मोटा हाथी' कहकर पति का मजाक उड़ाना-अदालत ने फैसले में लिखा-अगर पति मोटा हो, तो भी पत्नी द्वारा 'हाथी' या 'मोटा हाथी' कहकर गाली देने से पति के आत्मसम्मान को चोट लगती है। चूंकि इस मामले में पति संवेदनशील है, इसलिए पत्नी का यह दावा स्वीकार्य नहीं कि उसने मजाक में या अतिरिक्त प्यार में पति को ऐसा कहा था।
3. राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी-इस मामले में अदालत ने एक ऐसी महिला के जीवन को देखा, जिसने राजनीति और राजनेताओं के पीछे भटकते हुए अपने घरेलू माहौल और पारिवारिक संबंधों को नष्ट कर दिया। उसे बार-बार उसके पावन उत्तरदायित्वों की याद दिलाई गई, पर राजनीति की चकाचौंध से वह इतनी अभिभूत थी कि अपनी जिम्मेदारी न निभाने के नतीजे की याद न रही।
4. यौन संबंध बनाने पर रोक लगाना-अदालत की टिप्पणी थी-अगर यह मान भी लिया गया कि आवेदक को दो साल बाद ही बच्चा चाहिए था, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि पति-पत्नी के बीच संबंध ही न बनें।