सितंबर, 2013 में लोकसभा चुनाव प्रचार की गहमागहमी के बीच नरेंद्र मोदी ने वायदा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी, तो वह सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों की लंबे समय से लंबित मांग-वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी)- पूरी करेंगे। सत्ता पाने के बाद शुरू में उन्होंने जोर देकर कहा कि वह अपना वायदा पूरा करेंगे। लेकिन दो साल बाद जब इस पर अमल शुरू हुआ, तो उनकी सरकार ने कहा कि हो सकता है कि ओआरओपी को परिभाषित करने की जरूरत पड़े और पूर्व सैन्यकर्मियों को थोड़ा और धैर्य रखने की जरूरत है। अंततः सितंबर, 2015 में सरकार ने घोषणा की कि वह ओआरओपी योजना लागू कर रही है। लेकिन समस्या यह है कि सरकार ने अपने मन मुताबिक ओआरओपी को परिभाषित किया।
आम समझ के मुताबिक ओआरओपी का मतलब है कि एक समान सेवा विस्तार वाले एक ही रैंक से सेवानिवृत्त हुए सभी सैन्यकर्मी को, चाहे उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि कुछ भी हो, बराबर पेंशन मिलनी चाहिए। इसलिए न केवल पुराने और नए पेंशनधारकों के बीच की खाई को पाटने की जरूरत है, बल्कि भविष्य में होने वाली पेंशन वृद्धि में भी एकरूपता सुनिश्चित हो।
स्पष्ट है कि इस विचार में वास्तव में कुछ गड़बड़ियां हैं कि एक अधिकारी जो बीस वर्ष पहले सेवानिवृत्त हुआ, उसे वही पेंशन मिलेगी, जो आज सेवानिवृत्त होने वाले को मिलती है। पेंशन सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाले वेतन से संबंधित मानी जाती है। जीवन भर के लिए इसे एकरूप बनाना अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होगा, खासकर तब, जब सभी सरकारी कर्मचारियों को एक ही तरह से सेवानिवृत्त होना है। इस तरह से सितंबर, 2015 की सरकार की योजना के मुताबिक सशस्त्र बलों की पेंशन को हर पांच साल में संशोधित करना तर्कसंगत है। असली समस्या कहीं और है। तथ्य यह है कि सरकार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के कर्मियों को पूर्ण और वास्तविक ओआरओपी दी है, जबकि ज्यादातर सैन्यकर्मियों को इससे वंचित रखा गया है। सरकार ने फैसला किया है कि शीर्ष स्तर के अधिकारियों को वास्तविक ओआरओपी मिलेगी, यानी उनकी पेंशन हमेशा, यहां तक कि भविष्य में संशोधन होने पर भी शीर्ष स्तर के बराबर ही होगी। और हैरानी की बात है कि सभी आईएएस और आईएफएस अधिकारी इसी स्तर पर सेवानिवृत्त होते हैं। इस चालबाजी के साथ आईएएस नौकरशाही ने इस योजना का विस्तार सैन्यसेवाओं के वरिष्ठतम अधिकारियों-तीनों सेना प्रमुख, उप प्रमुख, सैन्य कमांडर व उसके समकक्ष तथा कुछ वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल स्तर के अधिकारी के लिए किया है।
इसलिए अब जब विभिन्न अनुभागों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने ओआरओपी की मांग की, तो मोदी सरकार (जिसने जोरदार ढंग से इसका वायदा किया था) पीछे हटने लगी। ऐसा सरकार ने क्यों किया, यह समझना मुश्किल नहीं है। रक्षा विभाग की पेंशन, जो मोटे तौर पर आम पेंशन से दोगुना होती है, बजट का सबसे बड़ा हिस्सा है। इस वर्ष सरकार ने अकेले रक्षा पेंशन के लिए 82,332 करोड़ रुपये का बजट रखा, पांच वर्ष पहले 2010-11 में इसकी बजट राशि 37,336 करोड़ रुपये थी।
नौकरशाही की दलील है कि यदि सैन्यकर्मियों को ओआरओपी दी गई, तो अन्य कर्मचारी भी इसकी मांग करने लगेंगे। यह सही और उचित है, कई अन्य समान रूप से कठिन पेशे हैं, जैसे अर्धसैनिक बल, पुलिस, अग्निशमन कर्मी, रेलवे कर्मचारी और स्कूल शिक्षक, जो कठिनाई का दावा कर ओआरओपी की मांग कर सकते हैं, हालांकि इनमें से ज्यादातर 60 वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं। सैन्यकर्मी नाराज दिख रहे हैं, क्योंकि 1973 तक उन्हें ओआरओपी मिल रही थी, साथ ही जल्दी सेवानिवृत्ति की क्षतिपूर्ति के लिए उन्हें उच्च पेंशन मिल रही थी। लेकिन उसके बाद बाबुओं ने मुआवजा पैकेज को अपने लाभ के लिए व्यवस्थित किया, जिससे सैन्यकर्मियों को नुकसान हुआ। सरकार को पहले तो आईएएस, आईएफएस और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को दी जा रही ओआरओपी खत्म करनी चाहिए। यह पेंशन प्रणाली का मजाक बनाता है और यह उन अन्य सैन्य अधिकारियों और लोक सेवकों के साथ अन्याय है, जो जीवन भर सरकार के प्रति निष्ठावान रहकर परिश्रम करते हैं।
दूसरी बात यह है कि सरकार को सशस्त्र बलों के लिए पूरी तरह से अलग एक वेतन आयोग गठित करना चाहिए। इस वेतन आयोग को कुछ ऐसे उपाय जरूर खोजने चाहिए कि सैन्यकर्मियों की उचित क्षतिपूर्ति हो और वे युवा भी बने रहें। अभी खासकर पैदल सेना के अधिकारियों को अक्सर 20 वर्ष की सेवा के बाद छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जबकि उनकी उम्र संभवतः 38-40 वर्ष तक होती है। एक सामान्य जवान 34 से 36 की उम्र में सेवानिवृत्त होता है।
तीसरी बात यह कि पुलिस भर्ती बोर्ड को यह निर्देश दिया जाए कि वे सेवानिवृत्त जवानों को नौकरी पर रखें। 34 वर्ष का जवान अर्धसैनिक बल या सिविल पुलिस के लिए आदर्श हो सकता है। वह अनुशासित और प्रशिक्षित होगा। लेफ्टिनेंट कर्नल या कर्नल की तरह वह कुछ प्रशिक्षण के बाद पुलिस सुप्रीटेंडेंट या सीनियर सुप्रीटेंडेंट बनकर अच्छा काम करेगा। सरकारी और अर्ध-सरकारी संगठन को सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों को मैनेजर या सुरक्षा अधिकारी के रूप में नियुक्ति में पहली प्राथमिकता देनी चाहिए। लेकिन कई मंत्रालय इसमें रुकावट डालते हैं। बल्कि गृह मंत्रालय और राजनेता शर्माते हुए कहते हैं कि सैन्यकर्मी पुलिस या अन्य नागरिक सेवाओं के लिए उपयुक्त नहीं होंगे। असल में उनके कहने का आशय होता है कि वे अपने राजनीतिक आकाओं की उस तरह सेवा नहीं कर सकते, जैसा कि अन्य सिविल सेवक करने के अभ्यस्त हैं और भर्ती घोटाले में कमाई भी नहीं होगी।
ज्यादातर पूर्व सैन्यकर्मी मोदी सरकार के समर्थक हैं, पर अभी वे बहुत घबराए हुए हैं। कमतर ओआरओपी तो सिर्फ एक कारण है। विकलांगता पेंशन में कमी, असैन्य समकक्षों की तुलना में सैन्य अधिकारियों की पदावनति, और सेना द्वारा संचालित क्षेत्रों में इंजीनियरिंग के पदों पर असैन्य अधिकारियों की नियुक्ति जैसे अन्य कारण भी हैं।