मोदी सरकार द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और महामना मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न दिए जाने का बसपा सुप्रीमो और उत्तर प्रदेश की तीन बार भाजपा के सहयोग से और एक बार अपने बल पर मुख्यमंत्री रहीं मायावती ने इस आधार पर विरोध किया है कि ये दोनों सम्मान ब्राह्मणों को दिए गए, जबकि पिछड़ों और दलितों को नहीं चुना गया। सवाल यह है कि यह सम्मान जातिगत समीकरण से परे होना चाहिए या इसमें देश के सामाजिक तानाबाना जाति, धर्म, संप्रदायों का भी ध्यान रखना चाहिए।
जहां तक दलित और पिछड़े वर्ग का संबंध है, तो यह समुदाय हमारे देश की सामाजिक रचना से जुड़ा हुआ है। लोग तो यहां तक तर्क देते हैं कि ऋगवेद के पुरुष सूक्त में वर्ण और आश्रम की व्यवस्था है तथा यह वर्ण कर्म पर आधारित नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन के रूप में ही प्रचलित है। यह भी तर्क दिया जाता है कि ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र देश के सिर, भुजा, उर और पाद के परिचायक हैं। लेकिन इनमें से किसी को क्या कम आंका जा सकता है? यदि पैर न हों, तो आदमी अपंग हो जाएगा। इसलिए शरीर के विभिन्न अंगों के महत्व को समझना पड़ेगा। इसी तरह समाज के विभिन्न वर्गों का भी महत्व है।
इसमें शक नहीं कि समाज में दलितों के साथ बड़ा अन्याय हुआ है। हमने जिस आरक्षण व्यवस्था को 1950 में संविधान को संकल्पित करते समय लागू किया था, आज भी उसके उद्देश्यों की पूर्ण प्राप्ति नहीं कर पाए हैं। अस्पृश्यता को समाप्त किया गया, पर यह नहीं कहा जा सकता कि हम दलितों को समर्थ बनाने में सफल हुए हैं। आदिवासियों और दलितों के ऐतिहासिक अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आया है कि इनका एक हिस्सा सत्ता के लिए संघर्ष में पराजित लोगों का है, जिनके साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया गया।
जहां तक भारत रत्न सम्मान पर मायावती के विरोध का मामला है, तो सच्चाई यही है कि यह सम्मान सबको दिया गया है, इसमें किसी किस्म का भेदभाव नहीं किया गया है। संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर दलित थे और दलित आंदोलन के संचालकों में से भी। भारत रत्न उन्हें दिया गया, हालांकि उसमें देरी हुई। सरदार वल्लभभाई पटेल को भी यह सम्मान बाद में मिला, जबकि नेताजी सुभाषचंद्र बोस का तो अभी तक नंबर ही नहीं आया। स्वतंत्रता के लिए जिन लोगों ने अपने प्राण दिए, उन्हें शहीद कहकर तो सम्मानित किया जाता है, पर किसी बलिदानी को भारत रत्न देने की आवश्यकता नहीं समझी गई। इसलिए यह कोई ठोस तर्क नहीं है कि दलित समाज को इससे वंचित रखा गया है। जहां तक ज्योतिबा फुले और कांशीराम को भारत रत्न देने का मामला है, तो लगता यही है कि जैसे मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही इस कोटि में आ सके, उसी प्रकार मायावती के प्रधानमंत्री बनने की प्रतीक्षा करनी होगी।
पर भारत रत्न जैसे शीर्ष सम्मान को विवाद से परे होना चाहिए। सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देते समय भी यह सवाल उठा कि यह कहीं पूर्व शीर्ष खिलाड़ियों का असम्मान तो नहीं है, जिनके नाम पर अभी तक विचार ही नहीं हुआ। इसलिए इसका ध्यान रखना चाहिए कि भारत रत्न सत्ता का सम्मान होने तक सीमित न रहे। इसके चयन का दायरा इतना बड़ा किया जाना चाहिए, जिसमें पूरे देश के लोगों के विचार और उनकी भावनाएं समाहित हों।