कनाडा के मौजूदा प्रधानमंत्री कार्नी एक बड़े व्यवसाय प्रतिनिधिमंडल के साथ, बहुत आकर्षक भारतीय बाजार में संभावनाएं तलाशने आए थे, और उन्होंने मुंबई एवं नई दिल्ली का दौरा किया। भारत आने से पहले, वह जनवरी 2026 में चीन भी गए थे। उनका यह दौरा न केवल दोनों देशों के रिश्तों को फिर से ठीक करने के लिहाज से अहम था, बल्कि कनाडा की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत भी था। फरवरी, 2026 में दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में, कार्नी ने कनाडा की ज्यादा रणनीतिक स्वायत्तता बनाने, भागीदारी में विविधता लाने और ज्यादा व्यावहारिक, हितों पर आधारित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की इच्छा जाहिर की। कनाडा बदलती हुई विश्व व्यवस्था को समझ रहा है, जो नियमों व आकलन से कम और लाभ व पसंद से ज्यादा तय होता है।
दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच इस कूटनीतिक बातचीत का मकसद समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप देना है, जिस पर 2010 से बातचीत चल रही है, और यह दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ाने के लिए जरूरी है। दोनों देश आर्थिक साझेदारी में विविधता लाना चाहते हैं। यह 10 महीनों में कार्नी की अपने भारतीय समकक्ष के साथ तीसरी बैठक थी। अंतरराष्ट्रीय अपराध से निपटने के लिए एक समझौता खालिस्तानी कट्टरपंथ को बनाए रखने वाले बुनियादी ढांचे को कमजोर करेगा। राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद, कनाडाई संस्थागत निवेशक ('मेपल 8' पेंशन फंड, ब्रुकफील्ड और फेयरफैक्स जैसी फर्में) भारत में अपने मुनाफे से खुश हैं। भारतीय हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा और शहरी बुनियादी ढांचे में उनका निवेश 100 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है। वे भारत में अच्छा पैसा कमाते हैं। कार्नी के दौरे के बाद एक संयुक्त बयान में, दोनों प्रधानमंत्रियों ने तकनीकी, मानव संसाधन, ऊर्जा (यूरेनियम आपूर्ति), रक्षा, निवेश, शैक्षणिक सहयोग, स्वास्थ्य सेवा, आतंकवाद और वैश्विक कट्टरपंथ के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की पहचान की। लेकिन त्रूदो के कार्यकाल में हुए नुकसान को ठीक होने में थोड़ा समय लगेगा। भारत ऐसे मामलों में सावधानी से काम करता है।
मैंने कनाडाई प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों से बात की। वे भारत की तरक्की देखकर हैरान थे। भारत ने अपनी बात पर अमल किया है, चाहे वह जलवायु परिवर्तन हो या डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी संरचना या वैक्सीन। भारत उन देशों के साथ खड़ा रहा है, जो अपनी चुनौतियों का सामना करने के लिए हमारी भागीदारी चाहते हैं। दुनिया ने भारत की काबिलियत देखी है। भारत दुनिया से जुड़ने के लिए और दुनिया भी भारत से जुड़ने के लिए तैयार है।