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कूटनीति: अशांत पड़ोस से घबराने की जरूरत नहीं, असल चुनौती आंतरिक है

दीपक वोहरा
Updated Thu, 18 Sep 2025 06:57 AM IST

सार

भारत को पड़ोस की चुनौतियों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, अलबत्ता वह तो पड़ोस की प्रतिकूल प्रवृत्तियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर रहा है। असली चुनौती हमारे आंतरिक उपद्रवियों से निपटने की है, जिनका नेतृत्व के प्रति गुस्सा उन्हें देश को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाता है।
 
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भारत के पड़ोसी देशों में अशांति। - फोटो : अमर उजाला


इस्लामी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा चीन से उतनी ही नफरत करता है, जितनी अमेरिका से, और इसलिए अधिकतर मुस्लिम देश भारत को एक सुरक्षा कवच के रूप में देखते हैं। भारत किसी का पक्ष नहीं लेता, बल्कि अपने क्षेत्र में शांति और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करता है, जो विकास और समृद्धि के हमारे सर्वोपरि लक्ष्यों के लिए आवश्यक है। भारत के खिलाफ अनिवार्य तौर पर नफरती भाव रखने वाले पाकिस्तान को छोड़कर हमारे अन्य सभी पड़ोसी हमारी सद्भावना चाहते हैं, जिसे हम देने के लिए भी तत्पर हैं।


अरब सागर और फिर हिंद महासागर तक चीन की पहुंच उसकी सड़क पहल के माध्यम से है, जो गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तानी कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र से होकर गुजरती है। यदि वह क्षेत्र भारत को वापस मिल गया, तो चीन हमसे मित्रता करना चाहेगा। दूसरी ओर, अमेरिका चीन पर नियंत्रण चाहता है, इसलिए वह कोशिश करेगा कि गिलगित-पाकिस्तान भारत के हिस्से में न आए। चीन अरब सागर तक पहुंच पाने के लिए कट्टर इस्लामी पाकिस्तान को अपने खेमे में रखना चाहता है। उधर, अमेरिका ने चीन के लिए दरवाजा बंद करने की खातिर इस्लामाबाद से दोस्ती की। क्या भारत को अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता से चिंतित होना चाहिए? नहीं, हम इतने मजबूत हैं कि अपने किसी भी क्षेत्र को पाकिस्तान या चीन द्वारा हड़पे जाने से रोक सकते हैं। अमेरिका भारतीय क्षेत्र की लालसा नहीं रखता, लेकिन चीन रखता है। लेकिन गलवान (2020) के बाद उसे एहसास हुआ है कि यह एक नया आत्मविश्वासी शक्तिशाली भारत है, जिसे धकेला नहीं जा सकता। अमेरिका को भी इसका एहसास है।


एक अफ्रीकी कहावत है कि जब हाथी लड़ते हैं, तो नुकसान घास को ही होता है। इसलिए छोटे देश चाहते हैं कि भारत उनकी रक्षा करे। अमेरिका चीन पर नजर रखने के लिए दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में पैठ बनाना चाहता है, जबकि चीन इस क्षेत्र को अपना गढ़ बनाने की मंशा रखता है। वे दोनों भारत की सहमति के बिना कुछ नहीं कर सकते। हम अपने क्षेत्र में अपनी भूमिका के बेहतरीन मुकाम पर हैं। इसलिए, चिंतित होने के बजाय हमें अपनी आंखें खुली रखनी हैं। सतर्कता स्वतंत्रता की शाश्वत कीमत है।


भारत हमेशा अकेला चला है और उसने दुनिया को बदल दिया है। एक अमेरिकी विश्लेषक ने 2024 के अंत में दावा किया कि भारत वैश्विक स्तर पर सबसे अच्छी भू-राजनीतिक स्थिति में होगा, वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व की भूमिका निभाएगा, चीन के साथ संबंधों में सुधार करेगा, जी-7 से मजबूत संबंध बनाएगा और पश्चिम से महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया के बिना रूस के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाएगा। हमारे पड़ोस में कुछ समस्याएं हैं, लेकिन हमने उनका समाधान कर लिया है। पिछले दशक में हमने अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर अधिक समय, प्रयास और ऊर्जा खर्च की है। आइए, देखते हैं कि अपने अशांत पड़ोसियों से भारत कैसे निपटा है। अफगानिस्तान से रिश्ते बनाए रखने के लिए हमने मानवीय कदम उठाए हैं और तालिबानी विचारधारा से असहमत होने के बावजूद पर्याप्त सद्भावना अर्जित की है। यों तो पाकिस्तान के साथ रिश्ते में व्यापार और निवेश, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सांस्कृतिक संपर्क, लोगों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध होने चाहिए थे, लेकिन उसकी जगह सीमा पार आतंकवाद ने ले ली है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद मई 2025 में हमने पाकिस्तानी आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया।


नेपाल में पिछले कुछ वर्षों में भारत विरोधी भावनाओं को भड़काया गया, लेकिन हाल ही में हुई जेन-जी क्रांति ने उसे धो दिया। युवा नेपालियों की पीढ़ी ने उन भ्रष्ट कुलीनतंत्रों से अपना भविष्य वापस पाने की कोशिश की है, जिन्होंने देश को बर्बादी के कगार पर ला खड़ा किया है। भूटान अच्छी समझ और अच्छे पड़ोसी संबंधों का नखलिस्तान बना हुआ है। बांग्लादेश में पिछले साल युवाओं के विरोध प्रदर्शन के कारण भारत की मित्र शेख हसीना को सत्ता से बेदखल होना पड़ा और भारत में उनकी शरण ने यह साबित कर दिया कि यह देश हमारे लिए नाजुक चुनौती है, खासकर जब कट्टरपंथी इस्लामवादियों ने विरोध प्रदर्शन पर कब्जा कर लिया और अमेरिका द्वारा थोपे गए मुख्य सलाहकार यूनुस को प्रभावी रूप से हाशिये पर डाल दिया है।


अपने कूटनीतिक कौशल, विशेषकर रणनीतिक धैर्य के बल पर भारत स्थितियों को नियंत्रित करने में सफल रहा है। चीन के लाख प्रयासों के बावजूद, चीन के प्रिय राजपक्षे परिवार को सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद भारत और श्रीलंका के बीच विश्वास में वृद्धि हुई है। मालदीव के राष्ट्रपति का भारत विरोधी रुख भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मालदीव दौरे के बाद, खत्म हो गया। भारत को पड़ोस की चुनौतियों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, अलबत्ता वह तो पड़ोस की प्रतिकूल प्रवृत्तियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर रहा है। सभी मामलों में, संबंधित देश में घरेलू परिवर्तन और उनकी अदूरदर्शी नीतियां हमारे साथ उनके संबंधों में गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं। कूटनीति के क्षेत्र में अपने 52 वर्षों के दौरान मैंने जो भी देखा और महसूस किया है, उस आधार पर कह सकता हूं कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम सभी बाहरी तत्वों से उचित तरीके से निपटेंगे। असली चुनौती हमारे आंतरिक उपद्रवियों से निपटने की है, जिनका नेतृत्व के प्रति गुस्सा उन्हें देश को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाता है। 1.4 अरब भारतवासी जानते हैं कि उन्हें क्या करना है।

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