मुर्शिदाबाद जिले के धुलियान, जंगीपुर और शमशेरगंज सहित कई इलाकों में हिंसा और बर्बादी के दृश्य न केवल हृदयविदारक हैं, बल्कि यह हमारे समाज और प्रशासन की विफलता के भी प्रतीक हैं। राज्य की ममता सरकार अक्सर सांप्रदायिक मुद्दों पर केंद्र सरकार को निशाना बनाती है, लेकिन अपने राज्य में इस तरह के तनावों को रोकने में उसका रवैया ढुल-मुल ही रहा है, अलबत्ता, उसके शासन में समुदायों के बीच अविश्वास की खाई और गहरी होती जा रही है।
ताजा हिंसा के मामले में भी राज्य सरकार की प्रतिक्रिया केवल औपचारिक बयानों और विपक्ष पर आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रही। क्या यह पर्याप्त है? सैकड़ों लोग, जो अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं, उनके लिए तत्काल राहत और पुनर्वास की ठोस योजना कहां है? मालदा में शरण लिए लोगों की मदद भले ही स्थानीय लोग और स्वयंसेवी कर रहे हों, लेकिन यह सरकार का दायित्व था कि वह स्थिति को इस हद तक बिगड़ने ही न दे।
राज्य में विभिन्न चुनावों और पर्व-त्योहारों के दौरान अक्सर सांप्रदायिक तनाव की खबरें सामने आती रही हैं। हर बार सरकार की तरफ से केवल खानापूिर्त ही की जाती रही है, लेकिन समस्या की जड़ में जाकर समाधान करने की इच्छाशक्ति कभी नहीं दिखी। वक्फ विरोधी प्रदर्शन से निपटने के मामले में ममता पड़ोसी राज्य असम से सबक सीख सकती हैं, जहां तीस फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद कोई हिंसा नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में भी कमोबेश यही स्थिति रही। चिंताजनक यह भी है कि हिंसा के बाद ममता सरकार का रवैया रक्षात्मक रहा है।
वह विपक्ष को सियासी फायदे के लिए दंगे न भड़काने की नसीहत तो दे रही हैं, लेकिन क्या वह अपने प्रशासन की जवाबदेही तय करेंगी, जिन अधिकारियों ने हिंसा को रोकने में लापरवाही बरती, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी और सबसे अहम, उनका भरोसा कैसे जीता जाएगा, जो डर के मारे अपना घर छोड़ चुके हैं? उन्हें समझना होगा कि राजनीतिक बयानबाजी से कानून-व्यवस्था नहीं सुधरती। पश्चिम बंगाल को मुर्शिदाबाद के लोगों की उनके घरों में सुरक्षित वापसी, दोषियों पर सख्त कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की प्रभावी नीतियां चाहिए।