संविधान निर्माता के रूप में कतिपय हिंदू उनके प्रति इसलिए कृतज्ञ हैं कि उन्होंने बेशक हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया, परंतु उन्होंने विदेशी मूल के इस्लाम और ईसाई धर्म को नहीं अपनाया। इस तरह देश की लगभग चौथाई आबादी को उन्होंने दूर जाने से रोक दिया। भारत मूल के बुद्धधम्म को अपना कर उन्होंने करोड़ों अस्पृश्यों को देश की भावनात्मक व सांस्कृतिक जड़ों से कटने नहीं दिया। कांग्रेस संविधान को आगे रखकर उनके योगदान को याद कर रही है। सपा, बसपा और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) भी उनके वैचारिक वारिस होने का दावा कर रही हैं। इस तरह बौद्धों के आंबेडकर शील-प्रज्ञा की शिक्षा देने वाले हैं, मुसलमानों के आंबेडकर धार्मिक आजादी दिलवाने वाले, सिखों और ईसाइयों के आंबेडकर संविधान में नागरिक समानता दिलाने वाले और स्त्रियों के आंबेडकर समान अधिकारों के साथ ‘हिंदू कोड-बिल’ देने वाले हैं। इस तरह सबके अपने-अपने आंबेडकर हैं। और जो अपने-आप में आंबेडकर थे, वह कहीं नहीं दिख रहे। कल्पना कीजिए, आंबेडकर आपके सामने खड़े हों, और आप उनसे पूछें, ‘बाबा साहब आप किसके हैं?’ तो निश्चित ही वे कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की शायरी वाला जवाब देंगे, 'इतने हिस्सों में बंट गया हूं मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।'
दस्तावेजी रिकॉर्ड के अनुसार, रामजी सूबेदार जिन दिनों इंदौर (मध्य प्रदेश) स्थित ‘महू’ की फौजी छावनी के सरकारी आवास में रह रहे थे, उन्हीं दिनों 14 अप्रैल, 1891 को चौदहवीं संतान के रूप में भीमाबाई की कोख से जिस शिशु का जन्म हुआ, उसे घर-परिवार में ‘भीम’, बाद में ‘भीवा’ कह कर पुकारा गया।
सातारा में भीवा की प्राथमिक शिक्षा संपन्न हुई। स्कूली शिक्षा से कहीं अधिक कठोर शिक्षा उन्हें सामाजिक बहिष्कार से मिली, जो स्थायी सबक बनी। विद्या पाने की ललक और बौद्धिक समाज को मानवीय बनाने की उनकी मंशा छात्र जीवन के पहले दिन से ही प्रकट होने लगी थी। सात नवंबर, 1900 को जब उन्होंने पहली बार हाई स्कूल में अंग्रेजी की कक्षा में प्रवेश किया था, तो वह बरसात में भीगते हुए आए थे। अस्पृश्यता के माहौल में तब भी कुछ ऐसे उदार अध्यापक मौजूद थे, जो अपने कर्तव्यों में मानवीय सद्भाव को सर्वोपरि रखते थे। ‘पेंडसे’ नामक ऐसे ही एक शिक्षक ने छात्र भीवा को बदलने के लिए कपड़े दिए और फिर उन्हें पढ़ाया।
‘वसंत मून’ द्वारा प्रस्तुत डॉ. आंबेडकर की एलफिंस्टन कॉलेज की रिकॉर्ड फाईल से पता चलता है, कि 1910 में इंटर मीडियट परीक्षा में भीमराव के अंग्रेजी, फारसी, गणित और तर्कशास्त्र के कुल 600 अंकों में से उन्हें 223 अंक ही प्राप्त हुए थे। उन्होंने स्वयं लिखा, 'यद्यपि मैं विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में हर साल सफल होता रहा, फिर भी कभी दूसरी श्रेणी नहीं मिली।बीए की परीक्षा में तो मेरी दूसरी श्रेणी कुछ ही अंकों के कारण रह गई।' परंतु अध्ययन की निरंतरता और ज्ञान की ग्राह्यता ने उन्हें देश का महान अध्येता बनाया। उन्होंने अध्ययन को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से अधिक आवश्यक माना। 1916 के कालखंड में जब प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ा हुआ था, दुनिया में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी, आंबेडकर ने चार साल से रुकी अपनी कानून की पढ़ाई के लिए ‘ग्रेज इन’ तथा ‘लंदन स्कूल ऑफ इकनोमिक्स एंड पॉलीटिकल साइंस’ में प्रवेश लिया। दो साल में तीन साल की पढ़ाई पूरी कर 21 अगस्त, 1917 को आंबेडकर कोलंबो के रास्ते भारत लौटे। एक माह बाद अक्तूबर में रूस में वोल्शेविक क्रांति हुई। आंबेडकर ने प्रतिक्रिया दी-बलात किया जाने वाला शारीरिक रक्तपात बिना विचारों में बदलाव लाए क्रांति नहीं कहा जा सकता और वह टिकाऊ भी नहीं हो सकता।
यों भी वह बड़ौदा नरेश सर सयाजीराव गायकवाड़ द्वारा प्रदत्त छत्रवृति लेकर पढ़ाई न करते, तो अनैतिक वचन भंगता होती। 1919 में उन्होंने छात्रवृति शाहू महाराज की ढाई हजार की फंडिंग से मूकनायक पाक्षिक अखबार प्रकाशित किया। संपादकीय में एक रूपक दिया-भारतीय समाज बहुमंजिला इमारत की भांति है, जिसमें निकास द्वार नहीं है, जो जिस तल में जन्म लेता है, वह उसी तल में मर जाता है। किसी में यह ताकत नहीं कि निचले तल वाले व्यक्ति को ऊपर के तल में प्रवेश दिला दे, या ऊपर के तल वाला निचले तल में प्रवेश करे।
-लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष हैं।