अगले कुछ महीनों में देश के 75 करोड़ से भी अधिक मतदाता सोलहवीं लोकसभा के सदस्यों का चुनाव वोट डालकर करेंगे। निष्पक्ष चुनाव के जरिये मनाया जाने वाला लोकतंत्र का यह उत्सव दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव होगा। निर्वाचन आयोग ने पिछले कुछ वर्षों में मतदाताओं को अपने सांविधानिक अधिकार का उपयोग करने में सक्षम बनाने के लिए पूरे देश में काफी मेहनत की है, यहां तक कि गिर के जंगल में एक मतदाता के लिए भी मतदान केंद्र बनाया।
लेकिन हैरानी की बात है कि चुनाव आयोग के कुछ दिशा-निर्देशों की वजह से सशस्त्र एवं अर्धसैनिक बलों के जवान एवं उनके परिवार के अनुमानतः तीस लाख लोग मतदान के सांविधानिक अधिकार से वंचित रह जाते हैं। यह तब है, जब 1971 में ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सेवारत कर्मियों का पंजीकरण सामान्य मतदाताओं की तरह ही किया जा सकता है।
उस समय चुनाव आयोग ने उनके इस अधिकार का बचाव किया था। लेकिन लगता है, बाद में किसी राजनीतिक दबाव में चुनाव आयोग ने इस संदर्भ में कुछ दिशा-निर्देश जारी किया, जिसमें कहा गया कि मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए सशस्त्र एवं अर्धसैनिक बलों को एक जगह पर तीन वर्ष तक सेवारत होना चाहिए और उनके परिजनों का भी मतदाता के रूप में पंजीकरण होना चाहिए। यह ऐसी शर्त है, जिसके चलते किसी भी वर्दीधारी का मतदान कर पाना असंभव है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर का तबादला होता रहता है और वे एक चौकी से दूसरी चौकी पर भेजे जाते रहते हैं और ज्यादातर मामलों में उनके परिजन उनके साथ नहीं होते।
चुनाव आयोग के इन दिशा-निर्देशों का कारण रहस्य के घेरे में है। ऐसे में कोई केवल यही निष्कर्ष निकाल सकता है कि चूंकि सशस्त्र और अर्धसैनिक बल किसी के वोट बैंक नहीं हैं, इसलिए उन्हें मतदान की प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव डाला गया होगा।
लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि मतदान का सांविधानिक अधिकार सभी नागरिकों का है और इसमें रुकावट नहीं डाली जा सकती। किसी भी सामान्य मतदाता पर तीन वर्ष या परिवार के साथ रहने जैसी कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए यह अस्वीकार्य स्थिति है और तीस लाख जवानों एवं उनके परिवार के जीवन और सेवा के साथ ही हमारे लोकतंत्र पर भी काला धब्बा है।
हालांकि चुनाव आयोग ने सशस्त्र बलों के जवानों को डाक के जरिये मतदान करने और प्रॉक्सी वोटिंग का विकल्प उपलब्ध कराया है, लेकिन कुछ कमियों की वजह से ये अव्यावहारिक हैं। डाक के जरिये मतदान की व्यवस्था अपर्याप्त एवं अक्षम साबित हुई है, क्योंकि सैन्यकर्मियों को मतपत्र भेजने में काफी देरी हो जाती है और उम्मीदवारों की नाम वापसी तथा मतदान में कम अंतराल होता है।
एक दशक पूर्व चुनाव आयोग ने पाया था कि 'सेवारत कर्मियों का बहुत छोटा हिस्सा मतदाता के रूप में पंजीकृत है और उनमें से भी कम लोग ही समय पर डाक-मतपत्र मिलने पर वोट डाल पाते हैं। चुनाव प्रचार की अवधि को घटाकर 14 दिन करने पर तो सेवारत मतदाताओं के लिए डाक मतपत्र के जरिये मतदान करना बिल्कुल अव्यावहारिक हो गया है।'
उसके बाद निर्वाचन कानून (संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत प्रॉक्सी वोटिंग की व्यवस्था शुरू की गई और कमांडरों से आह्वान किया गया कि वे जवानों में मताधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ाएं। दुर्भाग्यवश जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। इसलिए आगामी चुनाव में हमें एक और मौका नहीं गंवाना चाहिए।
चुनाव आयोग सशस्त्र एवं अर्धसैनिक बलों एवं उनके परिजनों को मतदान से वंचित रखने वाले किसी भी दिशा-निर्देश को रद्द करे। उन्हें अन्य मतदाताओं की तरह तैनाती की जगह पर मतदान करने का अधिकार देना चाहिए। सभी छावनियों, इकाई मुख्यालयों और रेजीमेंट मुख्यालयों में मतदान केंद्र स्थापित करना चाहिए। चुनाव आयोग को शीघ्र सशस्त्र बल मुख्यालय के सहयोग से जवानों के पंजीकरण का काम शुरू करना चाहिए और स्थानीय कमांडर की सेवारत कर्मियों की सूची का इस्तेमाल मतदाता सूची के रूप में करना चाहिए।
(लेखक राज्यसभा सांसद हैं)