भवन निर्माण से लेकर अग्निशमन यंत्रों की उपलब्धता, आपातकालीन निकास मार्ग, फायर अलार्म प्रणाली और नियमित सुरक्षा ऑडिट तक सबकुछ नियम पुस्तिकाओं में दर्ज है। लेकिन समस्या इनके अनुपालन में है। अब दिल्ली के होटल को ही लें, जहां सिर्फ छह कमरों की अनुमति थी, लेकिन उसमें 25-26 कमरे थे। प्रवेश व निकास द्वार एक ही होने की वजह से स्थिति भयावह हो गई। इसी तरह, बिहार के अस्पताल में भी क्षमता से अधिक मरीज भर्ती थे और बुनियादी अग्निशमन उपकरणों की भी कमी देखी गई। इसके अतिरिक्त चरम गर्मी, एयरकंडीशनर और शॉर्ट सर्किट भी आग लगने की आम वजह बन गए हैं।
महानगरों व शहरों में आबादी के बढ़ते घनत्व, अवैध निर्माण, बेसमेंट के अनुचित इस्तेमाल और पार्किंग स्थलों के व्यावसायिक उपयोग जैसी प्रवृत्तियों ने चुनौती को और जटिल बनाया है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी में ही इस वर्ष अब तक आग लगने से करीब 65 लोग जान गवां चुके हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ भवन मालिकों को दोषी ठहराकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता। स्थानीय निकायों, विकास प्राधिकरणों और अग्निशमन विभागों की भूमिका भी उतनी ही अहम है। अगर प्रभावी ढंग से नियमित निरीक्षण किए जाएं और नियमों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई हो, तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
आम नागरिकों में भी अग्नि सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। अधिकांश लोगों को यह तक पता नहीं होता कि किसी भवन में आपातकालीन निकास कहां है या आग लगने की स्थिति में प्राथमिक कदम क्या होने चाहिए। हादसे के बाद राहत और मुआवजे की घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिसमें हादसों की आशंका न्यूनतम हो। पिछले कुछ समय में आग लगने के हादसों में आई तेजी के बाद भी अगर यह विषय औपचारिक चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में चला गया, तो यह मान लेना चाहिए कि अगली त्रासदी बस समय की ही बात है।