कुछ वर्ष पूर्व सीबीएसई द्वारा ‘एनवायरमेंट स्टडीज’ को प्लस-टू स्तर पर एक अनिवार्य विषय के रूप में पाठ्यक्रम से जोड़ा गया था। यह पहल नई पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाने का बहुत अच्छा माध्यम बन सकती थी। पर इस विषय में केवल उत्तीर्ण हो जाना ही पर्याप्त था। कुछ वर्षों बाद इस विषय को पाठ्यक्रम से हटा ही दिया गया। यह पूरा प्रकरण पर्यावरण के प्रति हमारे तथाकथित शिक्षाविदों, सरकार और स्वयं हमारी सोच की गंभीरता पर एक सशक्त टिप्पणी है।
लालच के बाद, नीतिगत, प्रशासनिक और निजी स्तर पर समस्याओं का तत्काल समाधान ढूंढने की हमारी जल्दबाजी ने पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। पानी की दिक्कत हुई, तो हमने बोरवेल खोद डाले। कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित करने के लिए पेस्टिसाइड्स और खरपतवारों से छुटकारा पाने के लिए हर्बीसाइड्स छिड़क दिए। पर्यटन बढ़ाने की बात हुई, तो पहाड़ की चोटी तक सड़क खोद डाली। सांप जैसा कोई जीव पसंद नहीं आया, तो उसे मार डाला। समस्या की जड़ तक जाने की जरूरत ही हमने कभी महसूस नहीं की। अपने आसपास की जमीन और उससे जुड़ी चीजों के साथ सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास शायद ही हमने कभी किया हो। आज हम टिड्डियों के कहर, बेमौसम बरसात, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन को ‘दैवीय आपदा’ मानते हैं, पर ये सब हमारी ही खड़ी की हुई समस्याएं हैं। ये प्रकृति के साथ हमारे खोखले होते जा रहे रिश्तों के परिणाम हैं।
हमारी पिछली पीढ़ी के अधिकांश लोगों को ‘पर्यावरण’ का अर्थ भी मालूम नहीं होगा, पर उनके पास पर्यावरणीय संवेदनशीलता की एक सरल समझ थी। मेरे जीवन की सबसे बड़ी पर्यावरणविद् मेरी आमा (दादी) ने मुझे बताया था कि हरे पेड़ नहीं काटने चाहिए; पेड़ पर आए फलों पर पहला अधिकार चिड़ियों का होता है; खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए; शाम के बाद पेड़-पौधों से कुछ नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि उन्हें भी नींद आती है। चींटियों को आटा खिलाना चाहिए। मछलियों को चारा देना चाहिए। आमा के इस सहज ज्ञान को हमारी माता-पिता वाली पीढ़ी ने भी जिया था। शायद इसी वजह से हमारे घर में और उसके चारों ओर फैले बगीचे में फल-फूलों, चिड़ियों, तितलियों, सांपों, मेंढकों और असंख्य छोटे-बड़े जीवों का अपना एक संसार है।