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हिंसा की जड़ें गहरी हैं यहां

Sun, 28 Dec 2014 08:11 PM IST
विनोद रिंगानिया
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असम में पिछले सप्ताह हुई भीषण हिंसा के बाद सरकारी सख्ती को इसी से समझा जा सकता है कि भूटान से लगी सीमा सील कर दी गई है, और बोडो क्षेत्र में अर्धसैनिक बल के जवानों की मौजूदगी भी बढ़ गई है। इस हिंसा पर केंद्र सरकार का सख्त रुख भी आश्वस्त करता है। पर बोडो क्षेत्र में बढ़ती हिंसा को उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखना होगा। पड़ोसी राज्य नगालैंड और मणिपुर में भी कई दशकों से उग्रवाद चल रहा है। लेकिन वहां के उग्रवाद की असम के उग्रवाद से कई कारणों से तुलना नहीं हो सकती।
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असम के उग्रवादियों ने हमले के लिए हमेशा आसान निशाने चुने। कई बार वे हिंदीभाषियों पर हमले करते हैं, कई बार चाय मजदूरों पर, जो ज्यादातर झारखंड और ओडिशा से असम के चाय बगीचों में काम करने के लिए करीब डेढ़ सदी पहले आए थे। कई बार पूर्वी बंगाल से असम आकर बसे बंगाली मुसलमानों पर हमला किया जाता है। इसी तरह उल्फा उग्रवादियों ने भी अक्सर हिंदीभाषियों को अपने हमले के लक्ष्य के रूप में चुना, क्योंकि असम में यह समुदाय राजनीतिक रूप से काफी कमजोर माना जाता है। पिछले दिनों के हमले में तो महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। जबकि नगालैंड और मणिपुर में उग्रवादियों ने शायद ही कभी महिलाओं और बच्चों पर हमला किया हो। एनडीएफबी के उग्रवादियों ने कभी सुरक्षा बलों के साथ आमने-सामने की लड़ाई नहीं लड़ी। उन्हें अपनी ताकत पर कभी इतना भरोसा ही नहीं रहा कि सुरक्षा बलों को सीधी चुनौती दे सकें।

असम के बोडो आबादी वाले इलाकों में हिंसा का इतिहास कम-से-कम तीन दशक पुराना है। प्रेमसिंह ब्रह्म नामक उग्रवादी नेता के नेतृत्व में कभी बोडो सिक्योरिटी फोर्स से शुरू हुई हिंसा आज एनडीएफबी (संग्बिजित) की हिंसा तक आ गई है। इस दौरान बाकी असम में अपेक्षाकृत शांति आ चुकी है। लेकिन बोडो आबादी वाले इलाकों में आज भी लोग डर के साये में जी रहे हैं। और विडंबना यह कि यह सिर्फ ऐसे एक उग्रवादी गुट के कारण हो रहा है, जिसके कैडरों की संख्या 40 से 100 के बीच है। क्या कारण है कि बोडो इलाकों में आज भी शांति नहीं आ पाई है? ये उग्रवादी क्या चाहते हैं? और बोडो सिविल सोसाइटी इस उग्रवाद के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठा पाती?
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असम में उल्फा के खात्मे और शेष असम के शांत होने की वजह यह है कि असमिया सिविल सोसाइटी ने उल्फा उग्रवादियों को पूरी तरह नकार दिया था। उन्हें समाज से किसी भी तरह का सहयोग या समर्थन मिलना बंद हो गया था। बुद्धिजीवियों ने डर को दरकिनार कर उनके खिलाफ बोलना शुरू कर दिया था। इसी का नतीजा था कि जब बांग्लादेश सरकार ने उल्फा के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर भारत सरकार को सौंपा, तो उल्फा के नेता बड़ी जल्दीबाजी में बातचीत के लिए तैयार हो गए।

पर बोडो उग्रवाद के मामले में ऐसा नहीं है। बोडो समाज में उग्रवाद के खिलाफ आज भी वैसी आवाज नहीं उठ रही, जैसी ब्रह्मपुत्र घाटी में उल्फा के खिलाफ उठी थी। इसके दो कारण हो सकते हैं। एक, बोड़ो समाज उग्रवाद के कारण पूरी तरह डरा हुआ है। सिर्फ उग्रवादी ही नहीं, जो लोग वहां की स्वायत्तशासी परिषद में सत्तारूढ़ हैं, उनके खिलाफ भी कुछ बोलना निरापद नहीं माना जाता। जो लोग गैर-बोडो समुदायों से हैं, उन पर तो यह शर्त विशेष तौर पर लागू होती है।

बोडो इलाके में सिर्फ उग्रवादी नहीं, हर तरह के अपराधी तत्वों की तूती बोलती है, और किसी समाज में स्वतंत्र रूप से जिस तरह चिंतन और लेखन होना चाहिए, वह वहां नदारद है। सिविल सोसाइटी के मुंह न खोलने का दूसरा कारण यह हो सकता है कि अब भी बोडो समाज में यह उम्मीद बंधी हुई है कि स्वाधीन बोडोलैंड भले एक स्वप्न हो, पर बोडोलैंड नाम का अलग राज्य शायद ज्यादा दूर नहीं है। आखिर बोडो इलाकों के लिए स्वायत्त शासन की व्यवस्था भी तो हिंसा के रास्ते से ही हासिल की गई है।

कुछ हद तक बाकी असम में और बहुत हद तक बोडो आबादी वाले इलाकों के लिए यह बात सच है कि सरकारी नीतियों ने ही हिंसक तौर-तरीकों पर वैधता की मुहर लगाई है। आज बोडो स्वायत्त परिषद पर जिन लोगों का राज है, वे लोग कल तक जंगलों में बंदूकें लिए फिरते थे। संघर्ष विराम, समझौता, चुनाव और शासन की बागडोर व समाज का नेतृत्व-इसने इन इलाकों में हिंसक तौर-तरीकों के प्रति उन लोगों का आकर्षण बढ़ाया, जो उग्रवादी बनने का जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं।

उल्फा के उग्रवादी नेताओं के मन में यह लालच आया था कि वे लोग भी अपना राजनीतिक दल बनाकर चुनाव में उतरेंगे और सरकार चलाएंगे। उल्फा अध्यक्ष के सरकार के साथ बातचीत शुरू करने के बाद के समय के भाषणों पर फिर से नजर डालें, तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। पर असमिया समाज किसी भी तरह उग्रवादियों को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था। पर बोडो उग्रवाद को लेकर यही बात नहीं कही जा सकती। वहां जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, उसमें अस्त्र-शस्त्र का आज भी बोलबाला है। कोई साधारण व्यक्ति तभी चुनाव में उतर सकता है, जब उसे अपनी जान जोखिम डालने से कोई परहेज न हो।

इसे इस एक बात से अच्छी तरह समझा जा सकता है। बोडो समुदाय की सबसे घनी आबादी वाले लोकसभा चुनाव क्षेत्र कोकराझार से हमेशा एक बोडो नेता ही चुनाव जीतते आए थे। उन्हें चुनौती दे पाने के बारे में अब तक कोई सोच भी नहीं पाया था, हालांकि इस संरक्षित लोकसभा क्षेत्र में गैर-बोडो समुदायों के वोटरों की संख्या बोडो समुदाय के वोटरों से ज्यादा है। अंततः उल्फा के ही एक पूर्व कमांडर नव कुमार दास उर्फ हीरा शरणिया ने बोडो वर्चस्व को चुनौती दी और पहली बार एक गैर-बोडो इस चुनाव क्षेत्र से जीत पाया। इस एक उदाहरण से ही समझा जा सकता है कि किस तरह बोड़ो आबादी वाले क्षेत्र में हिंसा ने अपनी जड़ें गहरी जमा रखी हैं। हालांकि यह भी सच है कि स्थिति को बदलने के लिए सबसे पहले जो घोषित रूप से उग्रवादी हैं, उन्हें खत्म करना होगा।
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- लेखक गुवाहाटी, असम में वरिष्ठ पत्रकार हैं
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