किसी वर्ष के जब अंतिम दिन आते हैं, तो उस वर्ष के अच्छे-बुरे दिनों का हिसाब लगाना स्वाभाविक है। इस वर्ष ऐसा करना और भी आवश्यक है, क्योंकि अच्छे दिनों का वायदा करके नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। राजनीतिक तौर पर शायद ही कोई वर्ष इतना महत्वपूर्ण रहा होगा, जितना 2014 रहा। जब मैंने तुलना करने की कोशिश की, तो याद आए 1977 और 1984, जिनमें ऐतिहासिक राजनीतिक परिवर्तन आया था। इतिहासकारों के लिए 2014 इनसे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि पहली बार राष्ट्रीय राजनीति के रंगमंच पर एक ऐसा राजनेता उभर कर आया है, जो पूर्व प्रधानमंत्रियों से बिल्कुल अलग है।
मणिशंकर अय्यर ने जब नरेंद्र मोदी का अपमान करने की भावना से उनको कांग्रेस के मुख्यालय में चाय बेचने की नौकरी करने को कहा, तो उनकी इस पेशकश को मजाक समझ के टाल दिया गया था। लेकिन गंभीरता से अय्यर के बयान का विश्लेषण किया जाए, तो मालूम पड़ेगा कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति के दरवाजे उन लोगों के लिए बंद थे, जो लुटियन्स दिल्ली के बाशिंदे पहले से नहीं थे। मोदी का प्रधानमंत्री बन जाना अपने आप में बहुत बड़ी बात है, क्योंकि जिस दिन 7, रेसकोर्स रोड में वह विराजमान हुए, उस दिन से ही इतिहास का नया पन्ना पलट गया था।
तीस वर्ष बाद पूर्ण बहुमत लेकर प्रधानमंत्री बनना भी ऐतिहासिक था। मोदी जात-पांत, मंदिर-मस्जिद के मुद्दों को त्यागकर परिवर्तन और विकास के मुद्दों को जनता के सामने रखकर आए हैं, तो यह भी ऐतिहासिक है। पर 2015 में उनकी असली अग्निपरीक्षा होगी। आम आदमी को अगर, अगले वर्ष परिवर्तन और विकास के आसार नहीं दिखेंगे, तो देश भर में दोबारा निराशा का माहौल पैदा होने में देर नहीं लगेगी। जब मोदी के पहले सात महीनों का हिसाब लगाते हैं, तो उनकी सबसे बड़ी सफलता चुनाव में हुई दिखती है। हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और कुछ हद तक जम्मू-कश्मीर-सब आ गए भाजपा की छत्रछाया में।
विदेशों में अपनी पहचान कायम करना प्रधानमंत्री मोदी की दूसरी बड़ी सफलता है। अमेरिका से लेकर जापान तक उनके विदेशी दौरे जितने सफल रहे, उतने शायद ही किसी अन्य प्रधानमंत्री के रहे होंगे। न्यूयॉर्क में जब मैंने कुछ छात्रों से बातें कीं, तो उन्होंने कहा कि पहली बार उन्हें भारतीय होने पर गर्व महसूस हो रहा है। सो सवाल यह है कि अब विकास, परिवर्तन और सुशासन की जगह क्यों दिखने लगे हैं कट्टरपंथी हिंदुत्व के फैलने के असर। क्यों आर्थिक सुधारों के बदले धर्मांतरण की बातें हो रही हैं? क्यों प्रधानमंत्री की आवाज से ऊंची आरएसएस के सरसंघचालक की आवाज सुनाई दे रही है? क्यों साधु और साध्वियों के जहरीले भाषण सुनने को मिल रहे हैं?
अभी तक प्रधानमंत्री ने इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया है, पर 2015 में उन्हें देना होगा, क्योंकि जिस नौजवान पीढ़ी के मोदी हीरो बने हुए हैं, उस पीढ़ी में सब्र का अभाव है। झारखंड और जम्मू-कश्मीर के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाए, तो मालूम होता है कि थोड़ी-बहुत निराशा अभी से फैलने लग गई है। धर्मांतरण का मुद्दा नहीं आया होता, तो संभव है कि कश्मीर में भाजपा ज्यादा सफल होती। सो इस दुआ के साथ, कि मोदी जल्दी ही कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों पर लगाम कसेंगे, मेरी तरफ से आप सबको नववर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।