मेरी मातृ संस्था दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले महीने उस समय विवाद पैदा हो गया था, जब छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के बुतों के नजदीक हिंदुत्व के प्रतीक विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा स्थापित करने की कोशिश की। मूर्तियां स्थापित करने वालों के विपरीत जिन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की बखूबी जानकारियां हैं, उन्होंने रेखांकित किया कि वैचारिक आधार पर उन दो देशभक्तों की स्थिति एकदम असंगत है, जिन्हें एबीवीपी सावरकर के समकक्ष बताना चाहती है।
बोस वामपंथी कांग्रेसी थे; भगत सिंह एक क्रांतिकारी मार्क्सवादी। एबीवीपी के आलोचकों ने सवाल किया कि आखिर कैसे उन्हें विभाजनकारी सावरकर के साथ रखा जा सकता है?
एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि वे बौद्धिक बहस के बजाय नारेबाजी करने में सहज महसूस करते हैं। हालांकि दक्षिण पंथ द्वारा इन वामपंथी नेताओं के स्तुतिगान की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय की इस घटना से नहीं हुई है। ऐसा पिछले कई वर्षों से चल रहा है।
प्रधानमंत्री सिर्फ बंगाल में नहीं, बल्कि अन्य जगहों में भी बार-बार सुभाष बोस का नाम लेते हैं। बढ़ा-चढ़ाकर चीजों को पेश करने की उनकी प्रवृत्ति के चलते भारतीय अभिलेखागार में रखे दस्तावेजों के विशाल संग्रह को उन्होंने खुद सार्वजनिक किया (यह अलग बात है कि इन दस्तावेजों ने कोई क्रांतिकारी खुलासा नहीं किया)। भाजपा के अन्य नेता निरंतर अंग्रेजों के शासन से आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले भगत सिंह की तारीफ करते रहते हैं। वास्तव में कोई यह तर्क दे सकता है कि विनायक दामोदर सावरकर की एबीवीपी द्वारा की जा रही स्तुति ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है।
1930 के दशक में सावरकर हिंदू महासभा के साथ थे और उस समय वह अपने आपको आरएसएस से श्रेष्ठ समझती थी। इस सांगठनिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद हालांकि मरणोपरांत एबीवीपी द्वारा किए जा रहे स्तुतिगान में एक वैचारिक संगति है, वह यह कि सावरकर इस विचार के प्रभावशाली समर्थक थे कि भारत हिंदुओं का देश है और यहां सिर्फ हिंदुओं का राज होना चाहिए। दूसरी ओर भगत सिंह और सुभाष बोस दोनों ही हिंदू बहुसंख्यकवाद के एकदम खिलाफ थे। भगत सिंह एक मार्क्सवादी थे, जो कि यह मानते थे कि किसी की व्यक्तिगत पहचान बुनियादी रूप से उसकी वर्गीय स्थिति से निर्धारित होनी चाहिए। वह मानते थे कि किसी का हिंदू या मुस्लिम या सवर्ण या दलित होने की तुलना में उसका मजदूर या किसान होना अधिक महत्वपूर्ण है।