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गांधी विरोधी पंथ का निर्माण: एबीवीपी बोस और भगत सिंह को सावरकर के समकक्ष खड़ा करना चाहती है

रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 22 Sep 2019 01:58 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर

मेरी मातृ संस्था दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले महीने उस समय विवाद पैदा हो गया था, जब छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के बुतों के नजदीक हिंदुत्व के प्रतीक विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा स्थापित करने की कोशिश की। मूर्तियां स्थापित करने वालों के विपरीत जिन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की बखूबी जानकारियां हैं, उन्होंने रेखांकित किया कि वैचारिक आधार पर उन दो देशभक्तों की स्थिति एकदम असंगत है, जिन्हें एबीवीपी सावरकर के समकक्ष बताना चाहती है।

बोस वामपंथी कांग्रेसी थे; भगत सिंह एक क्रांतिकारी मार्क्सवादी। एबीवीपी के आलोचकों ने सवाल किया कि आखिर कैसे उन्हें विभाजनकारी सावरकर के साथ रखा जा सकता है?


एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि वे बौद्धिक बहस के बजाय नारेबाजी करने में सहज महसूस करते हैं। हालांकि दक्षिण पंथ द्वारा इन वामपंथी नेताओं के स्तुतिगान की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय की इस घटना से नहीं हुई है। ऐसा पिछले कई वर्षों से चल रहा है।

प्रधानमंत्री सिर्फ बंगाल में नहीं, बल्कि अन्य जगहों में भी बार-बार सुभाष बोस का नाम लेते हैं। बढ़ा-चढ़ाकर चीजों को पेश करने की उनकी प्रवृत्ति के चलते भारतीय अभिलेखागार में रखे दस्तावेजों के विशाल संग्रह को उन्होंने खुद सार्वजनिक किया (यह अलग बात है कि इन दस्तावेजों ने कोई क्रांतिकारी खुलासा नहीं किया)। भाजपा के अन्य नेता निरंतर अंग्रेजों के शासन से आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले भगत सिंह की तारीफ करते रहते हैं। वास्तव में कोई यह तर्क दे सकता है कि विनायक दामोदर सावरकर की एबीवीपी द्वारा की जा रही स्तुति ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है। 

1930 के दशक में सावरकर हिंदू महासभा के साथ थे और उस समय वह अपने आपको आरएसएस से श्रेष्ठ समझती थी। इस सांगठनिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद हालांकि मरणोपरांत एबीवीपी द्वारा किए जा रहे स्तुतिगान में एक वैचारिक संगति है, वह यह कि सावरकर इस विचार के प्रभावशाली समर्थक थे कि भारत हिंदुओं का देश है और यहां सिर्फ हिंदुओं का राज होना चाहिए। दूसरी ओर भगत सिंह और सुभाष बोस दोनों ही हिंदू बहुसंख्यकवाद के एकदम खिलाफ थे। भगत सिंह एक मार्क्सवादी थे, जो कि यह मानते थे कि किसी की व्यक्तिगत पहचान बुनियादी रूप से उसकी वर्गीय स्थिति से निर्धारित होनी चाहिए। वह मानते थे कि किसी का हिंदू या मुस्लिम या सवर्ण या दलित होने की तुलना में उसका मजदूर या किसान होना अधिक महत्वपूर्ण है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर
मेरी मातृ संस्था दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले महीने उस समय विवाद पैदा हो गया था, जब छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के बुतों के नजदीक हिंदुत्व के प्रतीक विनायक दामोदर सावरकर की प्रतिमा स्थापित करने की कोशिश की। मूर्तियां स्थापित करने वालों के विपरीत जिन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की बखूबी जानकारियां हैं, उन्होंने रेखांकित किया कि वैचारिक आधार पर उन दो देशभक्तों की स्थिति एकदम असंगत है, जिन्हें एबीवीपी सावरकर के समकक्ष बताना चाहती है।

बोस वामपंथी कांग्रेसी थे; भगत सिंह एक क्रांतिकारी मार्क्सवादी। एबीवीपी के आलोचकों ने सवाल किया कि आखिर कैसे उन्हें विभाजनकारी सावरकर के साथ रखा जा सकता है?
एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने इस सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं समझा, शायद इसलिए क्योंकि वे बौद्धिक बहस के बजाय नारेबाजी करने में सहज महसूस करते हैं। हालांकि दक्षिण पंथ द्वारा इन वामपंथी नेताओं के स्तुतिगान की शुरुआत दिल्ली विश्वविद्यालय की इस घटना से नहीं हुई है। ऐसा पिछले कई वर्षों से चल रहा है।

प्रधानमंत्री सिर्फ बंगाल में नहीं, बल्कि अन्य जगहों में भी बार-बार सुभाष बोस का नाम लेते हैं। बढ़ा-चढ़ाकर चीजों को पेश करने की उनकी प्रवृत्ति के चलते भारतीय अभिलेखागार में रखे दस्तावेजों के विशाल संग्रह को उन्होंने खुद सार्वजनिक किया (यह अलग बात है कि इन दस्तावेजों ने कोई क्रांतिकारी खुलासा नहीं किया)। भाजपा के अन्य नेता निरंतर अंग्रेजों के शासन से आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले भगत सिंह की तारीफ करते रहते हैं। वास्तव में कोई यह तर्क दे सकता है कि विनायक दामोदर सावरकर की एबीवीपी द्वारा की जा रही स्तुति ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल तर्कसंगत नहीं है। 

1930 के दशक में सावरकर हिंदू महासभा के साथ थे और उस समय वह अपने आपको आरएसएस से श्रेष्ठ समझती थी। इस सांगठनिक प्रतिद्वंद्विता के बावजूद हालांकि मरणोपरांत एबीवीपी द्वारा किए जा रहे स्तुतिगान में एक वैचारिक संगति है, वह यह कि सावरकर इस विचार के प्रभावशाली समर्थक थे कि भारत हिंदुओं का देश है और यहां सिर्फ हिंदुओं का राज होना चाहिए। दूसरी ओर भगत सिंह और सुभाष बोस दोनों ही हिंदू बहुसंख्यकवाद के एकदम खिलाफ थे। भगत सिंह एक मार्क्सवादी थे, जो कि यह मानते थे कि किसी की व्यक्तिगत पहचान बुनियादी रूप से उसकी वर्गीय स्थिति से निर्धारित होनी चाहिए। वह मानते थे कि किसी का हिंदू या मुस्लिम या सवर्ण या दलित होने की तुलना में उसका मजदूर या किसान होना अधिक महत्वपूर्ण है। 

भगत सिंह के अपने संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में हिंदू, मुस्लिम, पारसी और सिख कार्यकर्ता थे। जहां तक सुभाष बोस की बात है, तो उन्होंने जीवन भर अंतर धार्मिक सद्भाव के लिए समर्पित भाव से काम किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और इंडियन नेशनल आर्मी के प्रमुख के रूप में उन्होंने ऐसे स्वतंत्र भारत के लिए लड़ाई लड़ी जिसमें हिंदुओं और मुस्लिमों में किसी तरह के भेदभाव की कोई जगह नहीं होती।

बोस और भगत सिंह अपनी वैचारिक स्थिति को लेकर जिस तरह से समर्पित थे, उसे देखते हुए हिंदुत्ववादी इन दो स्वतंत्रता सेनानियों को अपना बताने का दावा कैसे कर सकते हैं? इसका एक कारण यह है कि इन दोनों देशभक्तों का त्रासदीपूर्ण तरीके से उनके अपने वैचारिक संबंधियों ने त्याग कर दिया। अपने राजनीतिक करियर के अधिकांश हिस्से में बोस एक समर्पित कांग्रेसी थे; यहां तक कि आईएनए, जैसा कि खुद उन्होंने कहा था कि, स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्यधारा का फॉरवर्ड ब्लॉक था। लेकिन इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने बोस का उसी तरह से त्याग कर दिया, जैसा कि उसने अनेक महान कांग्रेसियों का त्याग किया था। इसी तरह से भगत सिंह एक मार्क्सवादी थे, लेकिन माकपा की आधिकारिक विभूतियों में वह एक दयनीय कारण से शामिल नहीं हैं और वह यह कि उनका संगठन एचएसआरए मूल और अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सहयोगी नहीं था। सो, माकपा लेनिन और स्टालिन को तो आगे बढ़ाएगी, लेकिन इस विश्वनीय भारतीय मार्क्सवादी को कमतर करेगी।   

वामपंथियों और कांग्रेस के इस शर्मनाक अस्वीकार ने एबीवीपी को उन सेक्यूलर सोशलिस्ट्स के प्रति अपने प्रेम का दिखावा करने का अवसर दिया, जो यदि आज जीवित होते तो वे हिंदुत्व और उसके कामों को खारिज कर देते। हालांकि एबीवीपी आखिर क्यों बोस और भगत सिंह को सावरकर के समकक्ष खड़ा करना चाहती है, इसके दो और कारण भी हैं। इसका पहला कारण यह है कि ये तीनों मानते थे कि औपनिवेशिक शासन से भारत को मुक्त कराने में अहिंसा के बजाय हिंसा की रणनीति कारगर हो सकती है। दूसरा कारण यह है कि इन तीनों ने अपने करियर के अलग-अलग क्षणों में कभी महात्मा गांधी का विरोध किया था।

यह सर्वज्ञात है कि सावरकर गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के वैचारिक गुरु थे। सही मायने में महात्मा के प्रति उनकी घृणा इस हद तक व्यक्तिगत थी कि जब जेल में कस्तूरबा गांधी की मौत हुई, सावरकर ने अपने अनुयायियों से कहा था कि वे उनकी स्मृति में बनाए जा रहे कोष में कोई योगदान न करें। दूसरी ओर भगत सिंह का महात्मा का विरोध पूरी तरह से वैचारिक था और यह मार्क्सवादी वामपंथ से आया था, जो कि विभाजनकारी दक्षिणपंथ से एकदम भिन्न था। महात्मा के साथ बोस का संबंध कहीं अधिक जटिल था। कांग्रेस से अलग होने के बाद भी वह गांधी का आदर करते थे। आजाद हिंद फौज की स्थापना के बाद बोस पहले भारतीय थे, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से गांधी को 'राष्ट्रपिता' के रूप में स्वीकार किया। 

आज के उग्र हिंदू युवा इन बारीकियों को न तो समझते हैं और न ही उनकी परवाह करते हैं। वैचारिक आधार पर सावरकर बोस के दाईं और थे और भगत सिंह से तो और भी दूरस्थ दाईं ओर, यह बात उन्हें बेचैन नहीं करती। वे उन तीनों को एक साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं, जबकि सावरकर का महात्मा का विरोध सबसे कट्टर और सबसे लंबे समय तक रहा, लेकिन इसमें उनकी दिलचस्पी नहीं है। उनके लिए यही पर्याप्त है कि अपने करियर के किसी हिस्से में, किसी भी रूप में बोस और भगत सिंह का भी गांधी के साथ टकराव हुआ था।

आज के नाराज युवा हिंदू के लिए औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अहिंसा एक कमजोर और बेबस प्रतिक्रिया थी। उसके लिए हमारे गणतंत्र में मुस्लिमों और ईसाइयों को भी हिंदुओं जैसे अधिकार की बात करने वाला विचार अभिशाप है। गांधी जैसे राजनेता अंतर धार्मिक सद्भाव के लिए अपनी जान भी देने को तैयार थे और इस आधार पर वह नाराज हिंदू युवा उनकी पूरी विरासत को खारिज करता है। कट्टरपंथी हिंदू दक्षिणपंथ का बोस और भगत सिंह के प्रति नया प्रेम उनकी विशेषताओं की ओर देर से ध्यान जाने का नतीजा नहीं है। बल्कि ऐसा महात्मा गांधी के प्रति स्थायी घृणा के कारण है। वह राष्ट्रपिता को नीचा दिखाने के लिए कभी भी किसी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं और करेंगे।
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