वैश्विक महामारी कोरोना के कारण उपजी आर्थिक मंदी अब किसी से छिपी नहीं है। विश्व के अग्रणी आर्थिक रूप से संपन्न देशों को इस विकराल समस्या ने कैसे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, अमेरिका, फ्रांस आदि शक्तिशाली देश इसका जीता जागता उदाहरण हैं। यह समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है कि जब महीने भर से भी अधिक समय से गाड़ियों के पहिये थमे हुए हैं, रेल की पटरियां शांत हैं, आसमान में उड़ने वाले विमान जमीन में जमे हुए हैं, रेस्तरां-मॉल आदि सब बंद पड़े हैं, अति महत्वपूर्ण सामग्री जैसे दवाई आदि को छोड़कर निर्यात भी नहीं हो रहा, ऑनलाइन कारोबार हो नहीं रहा, और तो और, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य भी ठप है, तो ऐसे में लोगों की जेब में पैसा और सरकार के पास राजस्व कहां से आएगा!
बीबीसी के अनुसार अमेरिका में मार्च मध्य से अब तक लगभग 2.64 करोड़ बेरोजगारी भत्ते के नए आवेदन आ चुके हैं, हालांकि भारत में प्रधानमंत्री के सही समय पर लॉकडाउन के निर्णय और नियोक्ताओं से कर्मचारियों के लिए इस विषय पर किए गए आग्रह से अभी तक हालात नियंत्रण में हैं। दूसरी ओर यह भी वास्तविकता है कि बंगलूरू में कई आईटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह में कटौती कर दी है, वहीं गुरुग्राम में कुछ ने अपने कर्मचारियों को बिना वेतन छुट्टियां लेने को कहा है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भी कर्मचारियों के वेतन कटने के संकेत मिले हैं, तो एयरलाइंस समेत कई कंपनियोंने अपने उच्च स्तर के कर्मचारियों के वेतन में कटौती या अवैतनिक अवकाश की घोषणा की है। इसके इतर भारत सरकार ने जून, 2021 तक सभी केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते की वृद्धि पर तत्काल रोक लगा दी है। इन सबके बीच असंगठित क्षेत्रों के कामगारों एवं मजदूरों की आमदनी की बात करना बेमानी होगा।
हालांकि भारत सरकार के मार्च के अंत में घोषित 1.7 लाख के राहत पैकेज ने, जिसमें खाद्य सुरक्षा, गरीब, वरिष्ठ नागरिकों और विधवाओं को दो किस्तों में 1,000 रुपये दिए जाने, मनरेगा कामगारों की दिहाड़ी बढ़ाकर 202 रुपये करने, तीन महीने तक प्रत्येक महिला जनधन खाते में 500 रुपये डाले जाने और उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त में गैस आदि शामिल हैं, ऐसे तटस्थ लोगों को हौसला जरूर दिया है। इसके अलावा, ऐसे लोगों के लिए राज्य सरकारों द्वारा भी अपने स्तर पर कई कदम उठाए गए हैं, जिसमें गरीबों को भोजन से लेकर आर्थिक सहयोग राशि शामिल है।
उदाहरणार्थ, इसी क्रम में राजस्थान सरकार ने मार्च में 2,000 करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की, तो उत्तर प्रदेश सरकार ने खाद्यान्न की व्यवस्था तथा छोटे कामगारों के खातों में 1,000 रुपये हस्तांतरित किए, वहीं दिल्ली सरकार ने 5,000 रुपये की राहत राशि प्रदान की। यह सोचने वाली बात है कि ये राहत व्यवस्था और राशि कब तक साथ देगी? जहां तक आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था की बात है, तो आईएमएफ द्वारा जारी वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक के अनुसार, 2020 में इसके -3 फीसदी तक सिकुड़ने काअनुमान है और आर्थिक हालत 2008-2009 की समस्या से भी बदतर हो सकते हैं।
वहीं अमेरिका, फ्रांस, जापान आदि प्रमुख विकसित देशों में विकास की यह दर -6.1 फीसदी रहने एवं भारत में 1.9 फीसदी या उससे कम रहने का अनुमान लगाया गया है। भारत में लोग लॉकडाउन खुलने की प्रतीक्षा भले ही कर रहे हों, लेकिन सब कुछ इतनी जल्दी पटरी पर लौटने लगेगा, ऐसी उम्मीद कम ही नजर आती है। छूटती नौकरियों, घटते वेतन तथा आमदनी, अपने गांव-घर की ओर लौटते प्रवासी मजदूरों की बेबसी के बीच इस मुश्किल घड़ी में क्या सरकार द्वारा जारी राहत पैकेज संजीवनी साबित होंगे, यह कहना कठिन है, परंतु घनघोर बादलों के बीच चमकती बिजली से डरने के बजाय उसकी रोशनी में सबको एक दूसरे की मदद करते हुए राह तलाश कर आगे बढ़ना चाहिए।
अभी पंचायती राज दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने ग्राम पंचायतों को, 'स्वामित्व' प्रदान कर तथा ई ग्राम स्वराज पोर्टल लांच कर इस संकट की संजीवनी के रास्ते को प्रशस्त किया है। और जब भारत की आत्मा गांवों में बसती हो तथा प्रधानमंत्री का यह विश्वास, कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त भारत तथा देश की अर्थव्यवस्था हेतु महत्वपूर्ण है, तब हमें शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा।बड़े पैमाने पर प्रवासी मजदूरों, कर्मियों का अपने घर-गांव लौटना, उत्तराखंड जैसे प्रदेश में जहां गांव खाली हो गए थे, एक शुभ संकेत लग रहा हो, लेकिन यदि समय से इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, तो उसके साथ-साथ उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान आदि प्रदेशों में परेशानियां बढ़ सकती हैं।
इसके लिए जहां एक ओर सरकारों को लॉकडाउन खुलने के उपरांत वापस लौटे प्रवासियों की वजह से उपजी परिस्थितियों की समीक्षा के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य की चुनौतियों से निपटने की तैयारियां करनी चाहिए, वहीं स्थानीय स्तर पर लोगों की दक्षता के अनुसार स्वरोजगार के लिए प्रेरित करने से लेकर सामुदायिक शिक्षा तथा स्वास्थ्य हेतु पंचायतों को और प्रभावशाली बनाने की ओर कदम उठाने होंगे।
स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रयास शायद इस आर्थिक संकट के साथ-साथ भविष्य के भी संकटों से बचने का रास्ता दिखाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी अर्थव्यवस्था के बनने-बिगड़ने में भावनाओं का भी हाथ होता है। आम जन तथा उपभोक्ताओं का सकारात्मक रुख खरीदारी ही नहीं, बाजार को भी सकारात्मक तौर पर प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
यह जरूर है कि रपटों के मुताबिक, आने वाले समय में लोग अति आवश्यक वस्तुओं के अलावा अन्य प्रकार के व्ययों से परहेज करेंगे, परंतु हम अपने देश की नीतियों पर विश्वास रख सकारात्मकता का परिचय दें, तो भी यह नल-नील के किए गए श्रम समान होगा।
- दोनों लेखक शिक्षाविद हैं और दिल्ली स्थित उच्च शैक्षिक संस्थानों से संबद्ध हैं।