ऐसा नहीं लगता है कि हम इस महामारी से कुछ सीख रहे हैं। हम तो बस लॉकडाउन की अवधि के खत्म होने के इंतजार में बस समय काट रहे हैं। अगर ऐसा नहीं था, तो पुलिस को इसके पालन के लिए इतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। डांट से लेकर डंडों तक सब झेलेंगे, पर एक राउंड बाजार जाना जरूरी है। ऐसा नहीं है कि भीतर डर नहीं होगा। पर चूंकि झेला नहीं, इसलिए कल्पना भी नहीं कर सकते। असल में हमने दुनिया इतनी चमकदार बना दी और इसकी आदत सब पर इस तरह गढ़ दी कि इसके बिना अब जीना संभव नहीं लगता।
ये वैसी ही लत है, जो जर्दा जैसी लगती है। कैंसर का डर इसके आगे पिट गया। स्पेन हो या फ्रांस या फिर इंग्लैंड, इनमें मात्र कोरोना ने ही बड़ी मार नहीं मचाई है, बल्कि अब लॉकडाउन के कारण एक नई समस्या भी उभर कर सामने आ रही है। घर से बाहर निकलने की आदत व तफरीहबाजी में प्रतिबंध लगने के कारण अवसाद ने इन्हें घेर लिया है। यह बीमारी एक बड़ी चुनौती के रूप में मात्र इन्हीं देशों में नहीं, बल्कि सभी जगह यह एक नए रूप में, जिसमें भय भी जुड़ा है, तेजी से आगे बढ़ रही है।
अवसाद की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दौरान कुछ आत्महत्याएं भी हुईं और बेरोजगारी व विकल्प के अभाव ने अतिरिक्त रूप से लोगों को अवसाद में धकेल दिया। दुनिया भर में लॉकडाउन कोई चार-छह दिन की कहानी नहीं है, बल्कि यह तो एक लंबी अवधि का प्रयोग होता है, ताकि घटना की पुनरावृत्ति न हो सके। लॉकडाउन के प्रतिबंध से आइसोलेशन के कारण एकाकीपन को झेलना पड़ता है। यदि समाज का ताना-बाना सांस्कृतिक रूप से उत्कृष्ट हो, तो इसे निभा ले जाने की क्षमता भी उतनी ही ज्यादा होगी।
निश्चित रूप से यह स्थिति कुछ हद तक अपने देश में भी पैर पसारेगी, परंतु हमारी परंपराएं और सांस्कृतिक बनावट इसकी क्षति को काफी कम कर देंगी। यहां परहेज भय से उतना नहीं जुड़ता, जितना कि दायित्व से जुड़ा होता है। दूसरी बड़ी बात जिस तरह अपने देश में सामान्य जीवनशैली है, उसमें आत्मबल के अलावा प्रतिरोधक शक्ति बहुत मायने रखती है और यह गुण देश के अधिसंख्य समाज का हिस्सा है। यह अध्ययन के बाद सामने आया है कि अभी तक कोरोना से संक्रमित दो प्रतिशत लोगों को ही वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ी।
98 फीसदी लोग इस बीमारी से शारीरिक कष्टों से गुजरे हैं। अब तक की रिपोर्ट यह बताती है कि संक्रमित लोगों की संख्या दूसरे देश की तुलना में अपने देश में कम है। जहां पिछले 10-15 दिनों में अन्य देशों में खासतौर से इटली, अमेरिका, फ्रांस में संक्रमण की संख्या लाखों में पहुंच गई, वहीं अपने देश में यह अभी काबू में है। यह तथ्य कई बातों की तरफ इशारा करता है। पहला, यहां समाज सामूहिक निर्णय पर निर्भर करता है। यह सामाजिक व्यवस्था को कमजोर नहीं कर पाता है और यहां का अधिसंख्य समाज भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार ही भोजन ग्रहण करता है।
इन सबके अलावा इस देश कीयोग-संस्कृति, जो शारीरिक और मानिसक शक्ति का स्रोत है, आपदाओं में एक बड़े मानसिक कवच का काम करती है। इस आपदा के दौरान भारतीय भोजन और इसकी जीवनशैली की चर्चा जोरों पर है। यह तो तय है कि विदेश और विदेशी तौर-तरीके हमने अपनाए जरूर हैं, पर रिश्तों और जीवन-मूल्यों में उनकी अब भी सामूहिक स्वीकार्यता नहीं है।
जो समाज स्वयं केंद्रित रहा, वहां संवेदनशीलता दो आंसुओं में निपट जाती है। कोरोना संकट के दौरान बुजुर्गों के जो संकट सामने आए, वे इसकी बानगी देते हैं। उन देशों में कम्युनिटी सेंटर में दवा फिर भी मिल गई, पर दुआ व दया का अभाव ही था। ऐसे कहर में सामाजिक प्रतिबद्धता संस्कारों से ही आती है। लॉकडाउन ने ठहर कर हमें यह सोचने के लिए विवश किया है कि जो सभ्यता अधिकार सिखाती है और दायित्वों से दूर कर देती है, उसका पुनरीक्षण भी हमारी जिम्मेदारी है।
समय आ चुका है कि हम सभ्यता व संस्कृति में अंतर समझें। कोरोना आज की सभ्यता की देन है और उससे हमें हमारी संस्कृति ही बचा पाएगी। हमें वह संस्कृति ही बचा पाएगी, जो प्रकृति की सर्वोपरिता और उससे सामंजस्य सिखाती है।