विश्व इतिहास में कोरोना पहला संकट है, जिसने गरीब-अमीर, गांव-शहर, देश-विदेश की सभी दीवारों को ढहाकर पूरी मानवता को अपने शिकंजे में ले लिया है। भारत में इस महामारी का केंद्र और सभी राज्य सरकारें पूरी ताकत से मुकाबला कर रही हैं। महामारी के खिलाफ इस महायुद्ध के अग्रिम मोर्चे पर डॉक्टर, नर्स और पुलिस हैं, तो बाकी सारे लोग घरों में रहकर अपनी जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं। सीमित संसाधनों की सरकारी चादर, विशाल आबादी को राहत देने में छोटी पड़ रही है। इस वजह से भेदभाव और वर्गीकरण के अनेक मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे मामलों पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई, तो देश में नए तरह की सांविधानिक आपदा आ सकती है।
सांविधानिक प्रावधानों के बजाय आपदा प्रबंधन कानून के तहत केंद्र सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देश राज्यों के लिए बाध्यकारी नहीं हैं। इसलिए राज्यों द्वारा इसकी कई बार मनमाफिक व्याख्या और कई जगहों पर पुलिस के मनमाने क्रियान्वयन से लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। अनेक राज्यों ने महामारी बीमारी कानून के तहत भी कई आदेश जारी किए हैं। इन विरोधाभासी और जटिल नियमों का राज्यों की पुलिस द्वारा सख्ती से क्रियान्वयन किए जाने से कोरोना से त्रस्त लोगों की तकलीफ और बढ़ रही है। देश की राजधानी और संपन्न राज्य होने की वजह से दिल्ली में आधी आबादी के लिए लंबे समय तक मुफ्त राशन-पानी की व्यवस्था की जा सकती है।
लेकिन अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों में लंबे लॉकडाउन की वजह से करोड़ों लोगों पर भुखमरी का भारी संकट आ गया है। संसाधनों का टोटा होने की वजह से कैंसर, किडनी, टीबी, जैसी अनेक बीमारियों से जूझ रहे लाखों गैर-कोरोना मरीजों पर मौत का संकट मंडराने लगा है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सभी को जीने का और अनुच्छेद 14 के तहत सभी को समानता का हक है। मद्रास हाई कोर्ट ने हाल के फैसले में कहा है कि मरने के बाद लोगों को गरिमामय अंतिम संस्कार का अधिकार है, लेकिन लॉकडाउन के दौरान जीवित लोगों के ही सांविधानिक अधिकारों की अवहेलना होने से समानता का नियम खोखला दिखने लगा है।
अचानक घोषित हुए लॉकडाउन के बाद ट्रेन-बस और सभी प्रकार के यातायात के साधन बंद होने से करोड़ों लोग अपने घरों से दूर परदेशी शहरों में फंस गए। राजस्थान के कोटा में छात्रों की गुहार पर योगी सरकार ने विशेष बसों की व्यवस्था करवा दी। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने भी कोटा से छात्रों को लाने का फैसला किया है। वहीं मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की सरकारों पर भी छात्रों की घर वापसी के लिए बंदोबस्त करने का दबाव बढ़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अब विभिन्न राज्यों से अपने राज्य के प्रवासी मजदूरों को भी लाने का फैसला कर लिया है। दरअसल कोटा से छात्रों को लाए जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि मुंबई, सूरत और दूसरे महानगरों में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों की वापसी के लिए कोटा जैसे प्रयास क्यों नहीं हो सकते? दिल्ली-गाजियाबाद से वापस भेजे गए प्रवासी मजदूरों को उनके घर से दूर क्वारंटीन में रखा गया है, जबकि कोटा के छात्रों के लिए होम क्वारंटीन की विशेष व्यवस्था की गई है।
इस 'नए कोटा सिस्टम' से, कोरोना संकट के समाधान के बजाय नए सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि सभी राज्यों ने अपनी मर्जी से निर्णय लेना शुरू कर दिया और छात्र हों या प्रवासी मजदूर, उन्हें वापस लाए जाने और क्वारंटीन में रखने के बारे में समान नीति नहीं होगी, तो केंद्र के दिशा-निर्देश के औचित्य और बाध्यता पर भी सवाल खड़े हो जाएंगे। लॉकडाउन में घरों में कैद करोड़ों परिवारों को जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए ई-कॉमर्स कंपनियों को इजाजत देना ठीक हो सकता है।
लेकिन उन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सामान की बिक्री की इजाजत देना गलत था, जिसे बाद में सरकार को रदद् भी करना पड़ा। शहरों में बुजुर्ग नागरिकों और जरूरतमंद लोगों की सोशल मीडिया में हो रही फरमाइश पर पुलिस द्वारा दूध, फल, सब्जी और केक की व्यवस्था की जा रही है। दूसरी तरफ दूरस्थ इलाके में दो वक्त की रोटी और छिटपुट काम के लिए बाहर निकलने वाले आम लोगों पर पुलिसिया डंडों का खौफ बढ़ गया है।
कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा के पोते की शादी में मेहमानों की संख्या, सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क जैसे नियमों को दरकिनार कर दिया गया, जिनके उल्लंघन पर देश में हजारों लोगों के खिलाफ पुलिस एफआईआर दर्ज कर रही है। राज्यों के 17,000 थानों में पुलिस लॉकडाउन के उल्लंघन के मामलों में हो रही ऐसी एफआईआर पर सांविधानिक और न्यायिक सवाल खड़े हो रहे हैं। नियम और कानूनों की मनमाफिक व्याख्या होने से बढ़ रहा वर्गभेद, लॉकडाउन के बाद सांविधानिक संकट का सबब बन सकता है।
लॉकडाउन के दौरान इंटरनेट, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स कंपनियों के बढ़ते व्यापार की बानगी रिलायंस जियो के साथ फेसबुक और व्हाट्सएप के समझौते में देखी जा सकती है। लेकिन इससे बढ़ रही डिजिटल डिवाइड से असंगठित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बेकारी का खतरा बढ़ रहा है। आम जनता में यह धारणा है कि विदेशों से जनवरी से मार्च के बीच दो महीनों में भारत आए लगभग 15 लाख पासपोर्ट वालों की वजह से करोड़ों राशन कार्ड वाले कोरोना संकट का शिकार हो गए हैं।
लॉकडाउन के बाद इस सामाजिक और आर्थिक विषमता को बढ़ने से यदि नहीं रोका गया, तो संविधान की प्रस्तावना में लिखे वी द पीपुल यानी 'हम लोग' का संकल्प और सिकुड़ जाएगा। सोशल या फिजिकल डिस्टेंसिंग यानी शारीरिक दूरी को कोरोना संकट से निपटने का बड़ा हथियार बताया जा रहा है। मुंबई में संक्रमण से प्रभावित धारावी के दो वर्ग किलोमीटर इलाके में लगभग आठ लाख लोग रहते हैं।
अनेक राज्यों में क्वारंटीन केंद्रों में भारी भीड़ और सुविधाओं की कमी से भगदड़ और अराजकता बढ़ने से सोशल डिस्टेंसिंग के नियम बेमानी हो रहे हैं। यूरोप और अमेरिका जैसे अमीर और सीमित जनसंख्या वाले देशों के सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को भारतीय जनसंख्या और समाज के अनुरूप पुनर्निर्धारित करने की जरूरत है। इससे लॉकडाउन खुलने के बाद बस, ऑटो और टेंपो वालों को बेवजह की पुलिसिया कार्रवाई का शिकार नहीं होना पड़ेगा।
- सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और ब्रेक डाउन ऑफ लॉ ऐंड जस्टिस ड्युरिंग
लॉकडाउन, पुस्तक के लेखक