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कोरोना संकट: हमारे समय के नए नायक

नीरजा चौधरी
Updated Wed, 22 Apr 2020 08:43 AM IST
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कोरोना योद्धा - फोटो : PTI

कोरोना संकट ने हमें इस बात को लेकर जागरूक बनाया है कि हमारे असली नायक कौन हैं। ज्यादातर लोग इससे सहमत होंगे कि ये हमारे डॉक्टर और नर्सें व अस्पताल के अन्य कर्मचारी हैं, जो अपने जीवन को जोखिम में डालकर उस वायरस से संक्रमित लोगों के जीवन को बचाते हैं, जिसने पूरी दुनिया को घुटने पर ला दिया है। ऐसा नहीं है कि उनके परिवार नहीं हैं या उन्हें जीवन का डर नहीं है। लेकिन उन्होंने डर को धता बता दिया है और उनमें से कुछ ने अपना कर्तव्य निभाते हुए जान गंवा दी।



यह देखना दुखद है कि मदद के लिए कॉलोनी में आने वाले डॉक्टरों पर लोग पत्थर फेंकते हैं या अपनी कॉलोनी में रहने वाले डॉक्टरों को खदेड़ते हैं, भले ही उनका डर इस चिंता से उपजा हो कि उनकी कॉलोनी में रहने वाले चिकित्साकर्मी उन्हें वायरस से संक्रमित कर सकते हैं। एक ऐसा भी वक्त था, जब चिकित्सा पेशे को सम्मानजनक समझा जाता था और आदर्शवादी युवा इसे अपने करियर के पहले विकल्प के रूप में चुनते थे। समय के साथ यह पेशा भी अन्य पेशों जैसा हो गया। लेकिन आज फिर जब कोरोना हमारे पीछे पड़ा है, चिकित्सा के पेशे ने अपनी खोई हुई गरिमा वापस पा ली है।


इसके अलावा किराने के दुकानदार, खाद्य पदार्थों के आपूर्तिकर्ता और उनकी ढुलाई करने वाले नेटवर्क और दवा विक्रेताओं के प्रति भी हमारा सम्मान बढ़ गया है। ठेलेवाले और सब्जीवाले, जो स्थानीय मंडी से सब्जी लाकर हमारे दरवाजे पर पहुंचाते हैं, उनके लिए भी हमारे मन में सम्मान है। इसी तरह उन ट्रक ड्राइवरों के प्रति भी सम्मान बढ़ा है, जो बड़ी मंडियों से अनाज और सब्जी शहरों में लाते हैं। और सबसे बढ़कर सम्मान के हकदार वे किसान हैं, जो हमारे लिए अपने खेतों में खाद्यान्न उपजाते हैं। सम्मान का हकदार वह कूड़ा उठाने वाला भी है, जो अब भी कूड़ा उठाने आता है, जिसके बिना स्वास्थ्य के लिए स्थिति और भी खराब हो जाती। और बेहद बदनाम पुलिस वाले को भी हम नई नजरों से देखने लगे हैं।


वे यह सुनिश्चित करते हैं कि लोग घरों में रहें और उनमें से कुछ को हमले भी झेलने पड़े हैं, हालांकि कुछ को कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही के लिए दंडित भी किया गया है, जैसे कि पालघर में एक भीड़ ने तीन लोगों की हत्या कर दी और वहां मौजूद पुलिस वाले उन्हें बचाने के लिए कुछ न कर सके। सम्मान के पात्र हमारे सशस्त्र बल भी हैं, जो किसी भी तरह की घटना होने पर तत्परता से काम करते हैं। उतने ही महत्वपूर्ण मीडियाकर्मी भी हैं, जो अपनी जान जोखिम में डालकर हमारे लिए जानकारियां लाते हैं कि जमीनी स्तर पर कहां क्या हो रहा है, जिसके बिना न हमें कोई सटीक तस्वीर मिलेगी और न ही सरकार को सही प्रतिक्रिया मिलेगी, ताकि वह सुधार करने में सक्षम हो सके। हममें से कई लोगों के लिए यह वास्तविकता को परखने का अवसर है, क्योंकि हम घरों में बैठकर यह सोचने के लिए बाध्य हैं कि हमारे जीवन में क्या सार्थक है और क्या महत्वपूर्ण नहीं है।


हमारी अपनी दुनिया, और जिस दुनिया में हम रहते हैं अभूतपूर्व तरीके से बदलने जा रही है और हममें से कई को इसका एहसास है। नौकरियां जाएंगी, वेतन में कटौती होगी, अर्थव्यवस्था में सुस्ती आएगी और कुछ का तो कहना है कि मंदी आ जाएगी। कुछ समय के लिए चारों तरफ भयंकर आर्थिक संकट आने वाला है और हमें उन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। यहां तक कि जब कोरोना वायरस का संकट थम जाएगा और बाजार में वैक्सीन आ जाएगा, तब भी हमेशा के लिए 15-20 वर्षों बाद वायरस के फिर से लौटने का संकट बना रहेगा। यह आशंका कई तरह से हमारी मानसिकता को प्रभावित करने के लिए बाध्य है, जिसका असर इस बात पर पड़ सकता है कि हम कैसे सामाजिक बनते हैं और कैसे काम करते हैं।


घर से काम करने का मॉडल कुछ पेशों में आदर्श बन सकता है। स्पष्ट रूप से महामारी प्रवास पर असर डालने के लिए बाध्य है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही बाहर से प्रवासन को फिलहाल बंद कर दिया है। भारत में लॉकडाउन ने प्रवासियों को सबसे अधिक प्रभावित किया है। कई लोगों ने अपने गांव लौटने के प्रयास में सैकड़ों किलोमीटर की दूरी तय की। सबसे ताजा हृदय विदारक कहानी उस बारह वर्षीय लड़की की है, जो तीन दिन तक पैदल चली और जब घर से एक घंटे की दूरी पर थी, तो उसकी मृत्यु हो गई।


अन्य लोग भी अपने गांव-घर लौटने के लिए लॉकडाउन खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं। अशोक गहलोत जैसे मुख्यमंत्रियों ने केंद्र से कहा है कि प्रवासी मजदूरों को अपने प्रियजनों के पास घर लौटने की अनुमति दी जाए और स्थिति सामान्य होने पर वे वापस आ सकते हैं। बेशक उनमें से बहुत से लोग कम से कम निकट भविष्य में वापस नहीं आना चाहते, ऐसे में और चुनौतियां पैदा होंगी। लेकिन उन्हें काम और भोजन की अनिश्चितता के दौर में रोककर रखना उनके ऊपर नंगी तलवार लटकाने जैसा है, जो टाइम बम की तरह फटने का इंतजार कर रहा है।
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अगर यह विस्फोट करता है, तो शहरों में एक अलग तरह की समस्या पैदा होगी। इसे केंद्र और राज्यों को मिलकर बड़े पैमाने पर और समग्र रूप से निपटाया जाना चाहिए, न कि अगल-अलग तरीके से, जैसा कि पश्चिम बगाल में हुआ। लॉकडाउन-2 के खत्म होने से पहले शीघ्र ही एक कार्य योजना बनाए जाने की जरूरत है।


अंततः स्थिति हमें अब तक आजमाए गए तरीके से अलग समाधान तलाशने के लिए मजबूर कर सकती है, जैसे कृषि को ज्यादा तवज्जो देना, गांवों के निकट कृषि संबंधी ज्यादा उद्योगों की स्थापना और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों को स्थानांतरित करने के साथ श्रमिकों के लिए कार्यस्थल के पास आवास सुविधा देना और उनकी देखभाल करना। उम्मीद है कि पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा और खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी बातों को प्राथमिकता में रखा जाएगा, 


क्योंकि इन पर हमारा जीवन निर्भर है। लेकिन यह सब भविष्य के लिए है। फिलहाल जो मोर्चे पर हैं, वे मुख्यमंत्री हैं। वे हॉट सीट पर हैं, उनमें से कई के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। पीएम-सीएम-डीएम-सरपंच की शृंखला में डीएम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। जहां डीएम ने मोर्चे  का नेतृत्व किया है, वहां से सफलता की कहानियां सामने आई हैं।

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