इटली के एक प्रसिद्ध अभिनेता तुल्लियो सोलेंगी के करीब तीन मिनट का एक वीडियो-क्लिप इन दिनों खूब देखा जा रहा है, जिसमें वह जर्मनों को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं कि दो विश्वयुद्ध छेड़ चुके और साठ लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार चुके जर्मन आज भी खुद को ऊंची नस्ल समझते हैं। इटली के कई नेताओं की भी यही शिकायत है। वहां की एक नेता जॉर्जिया मेलोनी के फेसबुक वीडियो का संदेश भी यही है कि कोरोना वायरस की मार से पहले ही अधमरे इटली को जर्मनी बर्बाद कर देना चाहता है।
उनके इस वीडियो को 90 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं। जर्मनी पर गुस्से की वजह है। विगत नौ अप्रैल को यूरोपीय संघ के वित्त मंत्रियों की एक वीडियो कॉन्फ्रेंस थी। उसमें तय होना था कि कोविड-19 से सर्वाधिक पीड़ित देशों की अर्थव्यवस्थाओं का उद्धार कैसे किया जाए। दरअसल इटली, फ्रांस और स्पेन चाहते हैं कि यूरोपीय संघ की ओर से सीमित अवधि के लिए कोरोना बांड नाम का विशेष ऋणपत्र जारी किया जाए।
उनसे मिला पैसा सर्वाधिक प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं को पुनः पटरी पर लाने के लिए आवंटित किया जाए। पर जर्मनी की लीक पर चल रहा उत्तरी यूरोपीय देशों का एक गुट यूरोपीय संघ द्वारा बांड जारी करने के विरुद्ध है। इन देशों का तर्क है कि ऐसा कोई बांड यूरोपीय संघ के सभी देशों को कर्जदार बनाने और ब्याज देने पर बाध्य करने के समान होगा, जबकि बांड का लाभ सर्वाधिक पीड़ित कुछ चुने हुए देशों को ही मिलेगा। यूरोपीय संघ के संधिपत्र भी यही कहते हैं कि एकल देशों के ऋण सबकी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं बननी चाहिए।
जर्मनी और उसके समर्थक देशों का कहना है कि बांड का सुझाव देने वाले देश अपने ही नाम पर कर्ज लें और ब्याज दें। जबकि बांड की मांग करने वाले देशों का कहना है कि लंबे लॉकडाउन ने उनके उद्योग-धंधों की अभी ही ऐसी दुर्गति कर दी है कि उनके बांड कोई तभी लेना चाहेगा, जब उन्हें घोषित समय पर और ऊंची ब्याज दर पर सारा पैसा मिलने का पक्का भरोसा होगा।
यूरोपीय संघ में बहुतेरे लोगों का कहना है कि संघ में सबसे बड़ी और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था वाला जर्मनी कोरोना बांड से लाभ-हानि को किसी बनिये की तरह नाप-तौल रहा है। अपने विदेश व्यापार का दो-तिहाई लाभ उसे यूरोपीय संघ के देशों को निर्यात से मिलता है। इसलिए जर्मनी की आनाकानी में इटली, फ्रांस और स्पेन के लोगों को निरा स्वार्थ और अहंकार दिखाई पड़ता है।
वे भौंचक्के हैं कि उनके इस संकट काल में जर्मनी की चांसलर अंगेला मर्केल इतनी हृदयहीन कैसे हो सकती हैं, जिन्होंने 2015 में पश्चिम एशिया के लाखों शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएं खोल दी थीं और आज भी उन पर सालाना 26 अरब यूरो खर्च कर रही हैं। जर्मनी के रवैये से इटली सबसे अधिक आहत है।
सवा छह करोड़ की आबादी वाला इटली ही यूरोपीय संघ का वह देश है, जो कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे पहले शिकार बना। कोविड-19 से औसत मृत्यु दर दो प्रतिशत मानी जाती है, जबकि इटली में वह 12 प्रतिशत से अधिक है। जर्मनी और इटली यूरोपीय संघ के संस्थापक सदस्य हैं। इसलिए भी जर्मनी के रवैये पर इटली के नेता चुप नहीं रह पा रहे। इटली के प्रधानमंत्री जर्मन पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हुए यह समझाने में लगे हैं कि इटली को जर्मनी की एकजुटता क्यों चाहिए।
जर्मनी के सबसे प्रतिष्ठित दैनिक ने इटली के दो प्रादेशिक सरकार-प्रमुखों और नौ बड़े शहरों के मेयरों का एक सामूहिक पत्र छापा है, जिसमें शिकायत की गई है कि बहुत कम दरों वाली अपनी कर-प्रणाली द्वारा वर्षों से यूरोपीय संघ के सभी बड़े देशों के साधन-स्रोतों को खींचने वाला हॉलैंड आज यूरोपीय संघ की उद्धार-योजना के विरोधी उत्तरी यूरोपीय गुट की अगुआई कर रहा है।
पत्र लेखकों ने दुख व्यक्त किया कि हॉलैंड नैतिकता और एकजुटता के जिस नितांत अभाव का उदाहरण बन गया है, जर्मनी उसी का अनुसरण करता दिख रहा है। यूरोपीय संघ के भीतर एक-दूसरे के सबसे घनिष्ठ मित्र रहे जर्मनी और फ्रांस के रिश्तों में भी इस वायरस ने खटास पैदा कर दी है। दोनों देशों के बीच की सीमाएं पूरी तरह बंद हैं। फ्रेंच राष्ट्रपति मैक्रों भी अपनी अर्थव्यवस्था के उद्धार के लिए यूरोपीय संघ की ओर से कोरोना बांड चाहते हैं। फ्रांस में 17 मार्च से लागू लॉकडाउन को 11 मई तक बढ़ा दिया गया है और मृतकों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
वह इटली या स्पेन के नेताओं की तरह विलाप तो नहीं कर रहे, पर जर्मनी के व्यवहार से काफी निराश प्रतीत होते हैं। जर्मनी की पूर्व विवादास्पद रक्षा मंत्री उर्जुला फॉन देयर लाइन को पिछले साल यूरोपीय संघ के कार्यकारी आयोग के अध्यक्ष का पद मैक्रों की कृपा से ही मिल पाया था। लेकिन कोरोना बांड मामले में मैक्रों का साथ न देकर उन्होंने यही संकेत दिया है कि जर्मन चांसलर की तरह वह भी इस सुझाव के प्रति अनमनी हैं।
यूरोपीय संघ में कलह के बीच उनके वित्त मंत्रियों ने विगत नौ अप्रैल के अपने वीडियो कॉन्फ्रेंस में अर्थव्यवस्था के उद्धार का एक तीन सूत्री पैकेज तय किया। पहला है, 2008 के आर्थिक-वित्तीय संकट से सीख लेते हुए 2012 में बने 'ईएसएम' नाम के सामूहिक कोष से 240 अरब यूरो आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी प्रत्यक्ष-परोक्ष खर्च के लिए बतौर कर्ज दिए जा सकते हैं। दूसरा है, कंपनियों आदि के लिए यूरोपीय निवेश बैंक (ईआईबी) द्वारा 200 अरब यूरो तक ऋण दिलाए जा सकते हैं।
और तीसरा यह है कि कामबंदी से प्रभावित कर्मचारियों को यूरोपीय आयोग के 'श्योर' नामक वेतन-सहायता कार्यक्रम द्वारा 100 अरब यूरो बांटे जा सकते हैं। अलबत्ता कुल 540 अरब यूरो की बराबर धनराशि वाले इस तीन सूत्री पैकेज से कोविड-19 से पीड़ित यूरोपीय देशों का उद्धार नहीं हो पाएगा। ऐसे में, यूरोपीय संघ के कई सदस्यों द्वारा कोरोना बांड की मांग, जाहिर है, जल्दी ठंडी नहीं पड़ने वाली।