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कोरोना से करुणा

सत्यनारायण दास
Updated Fri, 03 Apr 2020 12:58 AM IST
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कोरोना वायरस का कहर - फोटो : बासित जरगर

मौत का भय हर तरह के भय से सर्वाधिक मौलिक होता है। भय ऐसी आशंका है, जिसमें हमें लगता है कि हम अपनी कोई चीज खो देंगे। जिस चीज को हम खो सकते हैं, उससे लगाव की तीव्रता के साथ ही भय की तीव्रता भी बढ़ती जाती है। हमारे पास जो चीज है, वह जितनी कीमती होगी, उसे खोने का भय भी उतना ही तीव्र होगा। हमारे पास जो सबसे कीमती चीज है, वह है हमारा जीवन, क्योंकि जब हम इसे गंवाते हैं, तो हम सारी चीजें खो देते हैं। इसलिए मौत का भय सबसे बड़ा भय है। कोरोना वायरस घातक है। यह अदृश्य है, इसलिए हम नहीं जान सकते कि यह कैसा है। इसके शुरुआती लक्षण सर्दी या फ्लू से कुछ खास अलग नहीं हैं, इसलिए हम यह भी नहीं जान सकते कि क्या हम इससे ग्रस्त हैं। और इससे भी बड़ी बात यह है कि इसके इलाज की अब तक कोई दवा नहीं है। वायरस के अपने भय के साथ ही इससे जुड़ी चिंताएं भी हैं। भोजन की कमी हो सकती है।



अर्थव्यवस्था में गिरावट आ सकती है, लोग स्वतंत्र रूप से कहीं यात्रा, खरीदारी यहां तक कि काम नहीं कर सकते। लोग 1930 के दशक की महामंदी से भी बदतर स्थिति की आशंका जता रहे हैं। भविष्य को लेकर अनिश्चितता है और पूरी तस्वीर अत्यंत धुंधली नजर आ रही है। हमें तय यह करना है कि इस विषादपूर्ण स्थिति से कैसे निपटें। या तो हम भविष्य में क्या होगा, इसे लेकर सिर्फ चिंतित हो सकते हैं या फिर हम इसे जीवन के गहरे अर्थ पर मनन करने के अवसर की तरह ले सकते हैं। हर प्रतिकूल परिस्थिति आगे बढ़ने का भी एक अवसर है। भगवत गीता (2.27) में कृष्ण कहते हैं कि हमें ऐसी चीजों के लिए चिंता नहीं करनी चाहिए, जो हमारे नियंत्रण से बाहर की हैं।


यानी हमें ऐसी चीजों के बारे में सोचना चाहिए, जिन्हें हम नियंत्रित कर सकते हैं। जो अपरिहार्य है, उसके लिए भय और चिंता हमारे सुख में कोई योगदान नहीं करते। हम जिस तरह से जीवन जीते हैं, वह हमारे नियंत्रण में है। हमें इस घातक वायरस से खुद की रक्षा करने के लिए सावधानी बरतने की जरूरत है, लेकिन हमें धैर्य नहीं खोना चाहिए। हम कोरोना वायरस को भावनात्मक और बौद्धिक रूप से मजबूत होने के अवसर की तरह देख सकते हैं। इसलिए इसे 'कोरोना कर्स' (कोरोना अभिशाप) की तरह देखने के बजाय हम इसे 'कोरोना करुणा' की तरह देख सकते हैं। भगवत गीता (10.14.8) में ब्रह्मा कहते हैं कि हमें हर परिस्थिति में चाहे अच्छी हो या बुरी कृष्ण की करुणा को देखने का प्रयास करना चाहिए और समझना चाहिए कि विशेष रूप से अच्छे या बुरे परिणाम हमारे स्वयं के कर्म से उपजे हैं।


हमारे जीवन में घटने वाली सभी अच्छी और बुरी परिस्थितियां हमारे व्यक्तिगत या सामूहिक कर्म से उपजती हैं। इसलिए आंशिक रूप से इनका नियंत्रण हमारे हाथ में होता है। इसलिए हमारे लिए यह समझदारी होगी कि हम व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से लिए गए हमारे कदमों के बारे में विचार करें, जिसने कोरोना वायरस जैसी परिस्थितियां निर्मित कीं और भविष्य में ऐसी गतिविधियों से बचने के उपाय तलाशें। उदाहरण के लिए, कोरोना वायरस ऐसा रोग है, जो जानवरों से मानव में फैला है, इसलिए क्या हमें एक समाज के रूप में हमारे मांसाहारी सांस्कृतिक कायदों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है? यहां तक कि हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ने वायरस से लड़ने के लिए योगा, प्राणायाम, आसन और ध्यान की सलाह दी है।


क्या यह महामारी ऐसी चीजों में हमारी समझ विकसित करने और बेहतर जीवन शैली के विकल्पों में चुनाव का अवसर देती है ? हमें सलाह दी गई है कि हम खुद को क्वारंटीन करें। अधिकांश कंपनियां घर से काम करने की सलाह दे रही हैं। क्यों न 'जाप क्वारंटीन' को अपनाया जाए और दिन भर कोरोना वायरस से जुड़ी खबरों के बजाय अन्य आध्यात्मिक और प्रगतिशील गतिविधियों में खुद को संलग्न किया जाए। इससे हमारी चिंता कम होगी और हमें ब्रह्मा के निर्देश (तत्' तेनुकम्पाम सुस्मिक्षमाना...) को अपनाने में मदद मिलेगी, जिसका संदेश है सभी अच्छी और बुरी परिस्थितियों में करुणा। कृष्ण का स्मरण करने में कोई हानि नहीं है, मगर चिंता से कुछ भी अच्छा हासिल नहीं हो सकता। - सत्यनारायण दास (जीवा इंस्टीट्यूट ऑफ वैष्णव स्टडीज)

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