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कोरोना के बीच भी विश्व वर्चस्व की होड़

प्रदीप कुमार, वरिष्ठ पत्रकार Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 04 Apr 2020 08:56 AM IST
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हांगकांग से प्रकाशित भरोसेमंद अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की यह रिपोर्ट अब निर्विवाद हो चुकी है कि चीन में कोरोना का पहला मामला पिछले साल 17 नवंबर को सार्वजनिक हुआ था। करीब डेढ़ महीने तक चीन की घटनाओं से दुनिया लगभग नावाकिफ रही। इस दौरान चीन और अन्य देशों में आवाजाही का सिलसिला बना रहा। जनवरी में पर्दा तार-तार होने लगा। चीन ने तुरंत विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को अपनी छवि के निर्माण में खड़ा कर दिया। हालांकि संगठन की टीम तब तक वुहान नहीं गई थी, इसके महानिदेशक टेड्रोस गेब्रेयसस ने चीन के प्रयासों की सराहना कर डाली।



चीन ने कोरोना के बहाने अपने राष्ट्रीय हित में डब्ल्यूएचओ का इस्तेमाल किया। टेड्रोस जानते हैं कि उनकी करीब डेढ़ लाख सालाना अमेरिकी डॉलर की नौकरी और अन्य सुविधाएं बहुत हद तक चीन पर निर्भर हैं,इसलिए खासतौर से कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी योगदान में 53 प्रतिशतकटौती की घोषणा कर दी है। पूंजीवादी मार्ग पर बड़े-बड़े डग भरने के बावजूद चीन बंद समाज है।


सेंसर से छन कर ही बाहर कोई जानकारी जा सकती है। इसलिए पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कितनों को संक्रमण हुआ, कितनी मौतें हुईं और अब क्या स्थिति है। बहरहाल राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इस एलान पर यकीन कर लेते हैं कि वुहान में कोरोना का सफाया किया जा चुका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वहां खुशियां मनाई जा रही हैं, खरगोश, बतख, चमगादड़,  सांप और पैंगोलिन की प्लेटें डाइनिंग टेबल पर आने लगी हैं। दूसरी ओर अमेरिका और कई यूरोपीय देशों की हालत बहुतखराब है।


भारत में हालत बदहाल होने के संकेत नहीं हैं, मगर यह भी नहीं कहा गया है कि कोरोना पर काबू पाया जा चुका है। कोरोना पर नियंत्रण चीन की बेहतर व्यवस्था और शासन प्रणाली की श्रेष्ठता का परिचायक है या इसके पीछे कुछ और? क्या चीन लैब में संहारक जीवाणु पैदा करने और उसके सफल काउंटरडोज का विकास कर चुका है? चोर की दाढ़ी में तिनका-इस कहावत को चरितार्थ करते हुए चीन के सोशल मीडिया पर प्रचार शुरू हो गया कि 2019 में वुहान में हुए वर्ल्ड मिलिट्री गेम्स में आए अमेरिकी सैनिकों ने कोरोना के वायरस को सी-फूड मार्केट में छोड़ दिया था।


चीनी सेना के एक रिटायर जनरल ने कहा कि नए प्रकार का जीवाणु युद्ध आ रहा है, जिसके मद्देनजर स्थायी जीवाणु प्रतिरक्षा बल की जरूरत है। चीन पहले से ही इस पर काम नहीं कर रहा? दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने मंचूरिया में चीनी सैनिकों पर जीवाणु अस्त्रों का प्रयोग किया था। इस कड़वे तजुर्बे को याद रखते हुए कम्युनिस्ट क्रांति के बाद प्रधानमंत्री चाउ एन लाइ ने 1951 में इस पर काम शुरू करवाया था। उसके बाद की प्रगति सार्वजनिक संज्ञान में नहीं है। दुनिया बस यह जानती है कि वुहान में जीवाणु प्रयोगशाला चल रही है।


इस तरह की प्रयोगशालों में कोई भी सक्षम देश रचनात्मक और विध्वंसात्मक, दोनों काम कर सकता है। करीब पचास साल पहले हुए जीवाणु अस्त्रों पर प्रतिबंध के अंतरराष्ट्रीय करार में अमेरिका और चीन दोनों शामिल हैं। लेकिनइसके बाद एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन हुआ था। सोवियत प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका लाहौर की एक बाहरी बस्ती में स्थापित प्रयोगशाला में घातक बीमारी फैलाने वाले मच्छरों पर काम कर रहा था। उस दौर में पाकिस्तान पर अमेरिका का पूर्ण वर्चस्व था।


कोरोना फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराने के बाद अब अमेरिकी सीनेट में रखे गए प्रस्ताव में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की गई है कि वह वुहान प्रकरण की जांच करे। यह महज प्रचार है। सच यह है कि चीन और अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों और विश्वमत की परवाह नहीं करते। अंतरराष्ट्रीय महामारी से निपटने में सारे संसाधन झोंक देने के बजाय, चीन और अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की होड़ में लगे हैं।
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लगातार बढ़ रहे संक्रमण और मौतें अमेरिका को परमाणु अस्त्र का प्रयोग करने लायक हाइपरसोनिक मिसाइल के प्रोटोटाइप के परीक्षण से नहीं रोक पाईं। दुश्मन के लिए इस मिसाइल को मार गिराना आसान नहीं होगा, क्योंकि यह संभावित मार्ग को बदल सकती है। अब चीन और रूस भी इसकी काट निकालने की पूरी कोशिश करेंगे। उधर चीन के दो सहयोगियों-उत्तर कोरिया और पाकिस्तान ने भी नए मिसाइलों का परीक्षण किया।


उत्तर कोरिया और पाकिस्तान, दोनों को मिसाइल टेक्नोलॉजी चीन से ही मिली है। भारत और दक्षिण कोरिया-जापान-अमेरिका के खिलाफ चीन की सड़सीनुमा व्यूह रचना में पाकिस्तान और उत्तर कोरिया दो हैंडल हैं।

कोरोना संरक्षण और इससे जुड़े कूटनीतिक खेल में अमेरिका चीन से पहले दौर में हार चुका है? इसका उत्तर विश्व प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका फॉरेन अफेयर्स में छपे दो विशेषज्ञों, कुर्ट कैंबेल और राश डोशी के मत से मिलता है।


उन्होंने लिखा है कि यह अमेरिका का स्वेज संकट हो सकता है। (1956 में मिस्र में स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और इस्राइल ने उस पर संयुक्त हमला कर दिया था। सोवियत अल्टीमेटम और उसके नतीजतन अमेरिकी दबाव ने हमलावरों को पीछे हटने को मजबूर कर दिया था। वह ब्रिटिश वर्चस्व की समाप्ति का प्रस्थान बिंदु था। वे लिखते हैं कि ट्रंप प्रशासन की गलती से चीन ने कोरोना से लड़ाई का वैश्विक मोर्चा संभाल लिया है।


चीन समझता है कि दुनिया उसे नेतृत्वकर्ता और अमेरिका को सहायता करने में अक्षम या बेमन देख रही है; यह अवधारणा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका की स्थिति और 21 वीं शताब्दी में नेतृत्व की प्रतिस्पर्द्धा को बुनियादी तौर पर बदल सकती है। चीन के विदेश मंत्रालय और समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने चीन की श्रेष्ठता को रेखांकित किया।


पांच साल पहले अमेरिकी विशेषज्ञ माइकल पिल्सबरी ने अपनी अति चर्चित किताब द हंड्रेड ईयर मैराथन में आशंका जताई थी कि 2050 में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के सौ साल पूरे होने तक चीन अमेरिका को पीछे छोड़ महाशक्ति बनने की रणनीति पर चल रहा है। लगता है,कोरोना ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है। कोरोना के इस संभावित परिणाम से भारत भी अछूता नहीं रह पाएगा।

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