कोरोना जैसी अति संक्रामक बीमारी ने चेता दिया है कि अगर रोग की प्रकृति बदल रही है, तो इलाज के तरीके भी बदलने होंगे। मरीजों और डॉक्टरों, दोनों के लिए आमने-सामने बैठकर इलाज करना और करवाना, दोनों जोखिम भरा काम हो गया है। देश की स्वास्थ्य सेवाओं का आधारभूत ढांचा खुद रोगग्रस्त है। ऐसे में उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, हृदय रोग या अन्य सामान्य जीवन-शैली आधारित बीमारियों से ग्रसित मरीजों, जिन्हें चिकित्सकों से नियमित जांच की जरूरत होती है, के स्वास्थ्य पर भी भारी संकट आ गया है। कोरोना के हलके लक्षणों वाले रोगी भी घर में ही क्वारंटीन रहकर कोरोना से लड़ रहे हैं।
ऐसे तमाम रोगियों के लिए इंटरनेट आशा की एक किरण के रूप में उभरा। मार्केट इंटेलिजेंस फर्म कलगाटो के एक विश्लेषण में यह तथ्य सामने आया कि अप्रैल, 2021 में ऑनलाइन फार्मेसी कंपनी फार्म इजी और नेटमेड्स के डेली एक्टिव यूजर्स की संख्या में दो गुना से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई, वहीं ऑनलाइन डॉक्टरों के वीडियो परामर्श दिलाने वाली वेबसाइट प्रैक्टो के उपभोक्ताओं की संख्या में तीन गुना से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई। भारत के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए ऐसे एप/वेबसाइट का न केवल प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि वहां ज्यादा समय भी बिता रहे हैं। जैसे, प्रैक्टो और ऑनलाइन दवा की रिटेल चेन मेडप्लस में यह समय अप्रैल में दो सौ प्रतिशत बढ़ गया। दुनिया में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स भारत में हैं। टेलीमेडिसिन सेसंबंधित सरकार के दिशा-निर्देश देश के सुदूर इलाकों में चिकित्सकों को इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएं देने को विधिक स्वरूप प्रदान करती है, जिसे मार्च, 2020 में जारी किया गया था। चिकित्सा का यह तरीका न केवल मौजूदा संकट के समय में, बल्कि भविष्य में भी लोगों को फायदा पहुंचाएगा।
टेलीमेडिसिन से संबंधित ये दिशा-निर्देश भारतीय चिकित्सा परिषद और नीति आयोग ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने टेलीमेडिसिन को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है, जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच उन लोगों तक हो, जहां दूरी एक महत्वपूर्ण कारक है। डॉक्सएप, एमफाइन और प्रैक्टो जैसे इंटरनेट प्लेटफॉर्म मरीजों को डॉक्टरों से जुड़ने और आभासी परामर्श प्राप्त करने में सहायता दे रहे हैं। हालांकि अभी यह प्रयोग सीमित मात्रा में है, क्योंकि इसमें सबसे बड़ी बाधा रोगी की वह मानसिकता है, जिसमें वह डॉक्टरों से आमने-सामने मिल कर ही अपने रोग का निदान चाहता है। यह सोच अस्पतालों में कई बार अनावश्यक भीड़ बढ़ाती है।
दिशा-निर्देश के अनुसार अब डॉक्टर रोगियों को वीडियो, ऑडियो, ईमेल द्वारा परामर्श दे सकते हैं। यह दिशा-निर्देश उन दवाओं को भी श्रेणीबद्ध करता है, जिन्हें टेलीमेडिसिन द्वारा रोगियों के लिए नियत किया जा सकता है। पर गंभीर रोगों में डॉक्टर टेलीमेडिसिन से दवाएं नहीं निर्धारित करेंगे। टेलीमेडिसिन का यह प्रारूप भविष्य में ई-स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक रूप देने में मदद करेगा। इससे न केवल दूरस्थ परामर्श को लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी, बल्कि यह ऐसे समाधान भी निकालेगा, जो रोगियों, डॉक्टरों, क्लीनिकों और फार्मेसियों को आपस में जोड़ देंगे, जिसका फायदा निश्चित रूप से रोगी को जल्दी स्वस्थ होने में मिलेगा।
टेलीमेडिसिन भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद लाभकारी हो सकता है, जहां डॉक्टरों की भारी कमी है। स्टेटिस्टा के एक शोध के अनुसार देश में टेलिमेडिसिन के बाजार का आकार तीस प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से साल 2020 से 2025 के बीच बढ़ेगा। भारत जैसे गरीब देशों में मेडिकल सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने में यह अहम हो सकता है। इसे सभी जगहों तक पहुंचाने के लिए हेल्थ रिकॉर्ड को डिजिटाइज करना पहला अहम कदम है। हालांकि देश में अब भी करोड़ों लोग इंटरनेट की पहुंच से दूर हैं। ऐसी सेवाओं के लिए अंग्रेजी का कामकाजी ज्ञान भी जरूरी है। देश में टेलीमेडिसिन की सफलता इस पर भी निर्भर करेगी कि लोग स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक के इस्तेमाल को कितनी जल्दी अपने व्यवहार में शामिल कर लेंगे।