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ट्रंप 2.0: 'सबसे सुंदर शब्द' टैरिफ के नाम पर जोर का झटका, धीरे से

शंकर अय्यर
Updated Mon, 24 Feb 2025 06:44 AM IST

सार

डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में अब तक अपने आदेशों से जो अनिशि्चतताएं फैलाई हैं, उसमें 'उन्होंने क्या कहा' से ज्यादा चर्चा यह है कि 'कब, क्या कहा'। उन्होंने टैरिफ को सबसे सुंदर शब्द कहा था। लेकिन जिस वूडू अर्थशास्त्र से इसे लागू करने की बात हो रही है, उससे देशों को जोर का झटका धीरे से लग रहा है।
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डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI


ट्रंप द्वारा फैलाई गई अनिश्चितताएं धीमी गति से सामने आ रही हैं। धारणाओं और बारीकियों के टकराव की अभिव्यक्ति के साथ उतार-चढ़ाव ने धारणाओं और अपेक्षाओं को बाधित कर दिया है। चेतना की कई धाराएं हैं। यह इतनी बड़ी हैं कि किसी भी प्रश्न या व्याख्या से पहले आम बात यह नहीं होती कि ‘उन्होंने क्या कहा’, बल्कि यह होती है कि ‘उन्होंने कब क्या कहा’। टैरिफ नीति का लक्ष्य दरों से सार्वभौमिक टैरिफ और पारस्परिक टैरिफ में परिवर्तन इसे उजागर करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक से कुछ ही घंटे पहले ट्रंप ने पारस्परिक (रेसिप्रोकल) टैरिफ की घोषणा की। इस अस्पष्ट रणनीति को अलग रखें, तो यह विचार अपने आप में नया नहीं है और इसकी उत्पत्ति 1934 में फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट द्वारा शुरू किए गए पारस्परिक व्यापार समझौते अधिनियम से हुई है। दोनों में बहुत बड़ा अंतर यह है कि 1934 में अमेरिका महामंदी का सामना कर रहा था। 2025 में, अमेरिकी आर्थिक वृद्धि ‘अमेरिकी अपवादवाद’ को उजागर करती है। पारस्परिक टैरिफ का खतरा जटिलताओं में उलझा हुआ है-160 देशों के लिए अमेरिका की सामंजस्यपूर्ण टैरिफ अनुसूची 98 अध्यायों में फैली हुई है, और इसमें आयात के लिए 18,000 से अधिक 10-अंकीय संहिता हैं। सरकारी दक्षता विभाग द्वारा किए गए शुद्धिकरण के वादे की पृष्ठभूमि में इसके अमल की कल्पना करें!


दरअसल, टैरिफ नीति के पीछे वूडू अर्थशास्त्र (एक अपमानजनक शब्द, जो धनी व्यक्तियों के लिए कर में कटौती का पक्षधर होता है) की एक अलग गंध है। ये विचार प्रोजेक्ट 2025 रिपोर्ट से निकले प्रतीत होते हैं। हालांकि रिपोर्ट में भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने को महत्वपूर्ण बताया गया है, लेकिन अध्याय अलग ही राग अलापते हैं। ‘निष्पक्ष व्यापार का मामला’ शीर्षक अध्याय में, पीटर नवारो तर्क देते हैं कि अगर भारत टैरिफ को अमेरिका के स्तर तक कम कर देता है, तो इससे अमेरिकी व्यापार घाटे में 24 प्रतिशत की कमी आएगी; और अगर अमेरिका टैरिफ को भारत के स्तर तक बढ़ा देता है, तो यह कमी नाटकीय रूप से 88 प्रतिशत होगी। क्या इस दृष्टिकोण के तहत द्विपक्षीय संबंध या व्यापार का विस्तार हो सकता है? स्टील और एल्युमीनियम पर 25 प्रतिशत टैरिफ को ही लें। कई अध्ययनों ने यह स्थापित किया है कि बेस इनपुट पर टैरिफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा। येल विश्वविद्यालय में लिडिया कॉक्स द्वारा 2023 में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि 'प्रतिकूल टैरिफ' का रोजगार और उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह बातचीत की रणनीति है, पर कॉक्स बताते हैं कि अस्थायी टैरिफ का भी अर्थव्यवस्था पर लगातार प्रभाव पड़ सकता है। ट्रंप की योजनाएं उनके मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (एमएजीए) के आधार को नुकसान पहुंचा सकती हैं। अपने चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने कहा था कि टैरिफ सबसे सुंदर शब्द है और उन्होंने अमेरिका से वादा किया कि वह चीन पर 60 प्रतिशत टैरिफ लगाएंगे। दरअसल, अक्तूबर 2024 में, ट्रंप ने घोषणा की कि अगर चीन ताइवान में घुसता है, तो वह टैरिफ को 150-200 प्रतिशत तक बढ़ा देंगे। पर ऐसा लगता है कि वह अपने उस रुख से पीछे हट गए हैं।


15 फरवरी तक चीन पर टैरिफ 10 प्रतिशत था, जो अमेरिका के सप्लाई चेन पार्टनर कनाडा और मेक्सिको पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ से कम है। ट्रंप का अपने पड़ोसियों और यूरोप के साथ ‘अमेरिकी सामान खरीदें या फिर कुछ और’ का दृष्टिकोण अमेरिकी जीडीपी को नुकसान पहुंचा सकता है। फिलहाल ट्रंप का कहना है कि अमेरिकियों के लिए यह दर्द अस्थायी होगा। भू-राजनीतिक मोर्चे पर यह धुरी और भी स्पष्ट है। गुरुवार को ट्रंप ने यूरोप (और कई अन्य सहयोगियों) को यह कहकर चौंका दिया कि वह रूस को जी-8 में वापस लाना चाहते हैं। इस पर चर्चा चल ही रही थी कि ट्रंप ने एक नई गुगली फेंकी। उन्होंने घोषणा की, 'मैं चाहता हूं कि मेरी पहली बैठक चीन के राष्ट्रपति शी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ हो। और मैं कहना चाहता हूं कि आइए, हम अपने सैन्य बजट को आधा कर दें।'


पिछले दिनों जब बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस आए थे, तब ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका गाजा पट्टी पर कब्जा कर सकता है। इस विचार को अरब जगत ने सिरे से खारिज कर दिया था। लेकिन ट्रंप ने ‘ईस्टर्न रिवेरा’ योजना पर दोगुना जोर दिया है। उन्होंने फॉक्स न्यूज  से कहा कि उनकी योजना के तहत फलस्तीनियों को वापस लौटने का अधिकार नहीं होगा।


शुक्रवार को अरब देशों ने ट्रंप की योजना का मुकाबला करने के लिए सऊदी अरब की पहल पर चर्चा शुरू की। जनवरी 2020 की ट्रंप शांति योजना और फलस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान अब संदेह के घेरे में हैं। अगर यह कोई कमतर राजनीतिक शक्ति होती, तो इसके नेता की संज्ञानात्मक सुसंगतता पर सवाल उठते। हालांकि, वह सौदेबाजी की कला के स्वयंभू मास्टर हैं-भव्य शुरुआत, आक्रामक उद्धरण और बड़ी घोषणाएं। आम तौर पर, यह रणनीति उद्देश्यों और परिणामों को मापने से पहले ही सफलता की घोषणा कर देती है। अगर ट्रंप को चुनाव प्रचार के दौरान विचारधारा से बंधा हुआ देखा गया था, तो सत्ता में आने पर वह अस्पष्टता से मिलने वाली सुविधा से निर्देशित होते दिखते हैं। धीमी गति से आने वाले झटके तेजी से आ सकते हैं।      

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