उन्नाव मेरे पड़ोस में है, इसलिए रह-रहकर ध्यान लखनऊ के ट्रॉमा सेंटर की ओर जा रहा है, जहां एक बहादुर लड़की (और उसका वकील भी) अपनी जान बचाने की लड़ाई लड़ रही है। वह तीन साल से लड़ रही है। उसे न्याय पाने के लिए बार-बार अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है। अब जब देश की लाखों महिलाएं और तमाम संगठन उसके साथ हैं और खुद सर्वोच्च न्यायालय ने उसके हक में कुछ कदम उठाए हैं, वह मौत के मंडराते साये से जूझने के लिए मजबूर है।
उसने बड़ी हिम्मत के साथ न्याय की लड़ाई लड़ी है। लड़ते-लड़ते उसने पिता और दो चाचियों को खोया है। उसका घर और उसका गांव भी उसके लिए अब पराया है। उसका बचना जरूरी है, ताकि उसके जीने, उसके जीतने और उसकी प्रेरणा से न्याय की लड़ाई आगे बढ़ सके।