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छह गलतियां अमेरिका को यहां ले आईं

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Corona America - फोटो : PTI

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि वह चीन से बहुत नाराज हैं, क्योंकि चीन ने अपने यहां फैले कोरोना वायरस संक्रमण के बारे में पहले नहीं बताया था। अगर वह शुरू में ही बता देता, तो अमेरिका और बाकी दुनिया में हालात इतने नहीं बिगड़ते। लेकिन जो लोग ट्रंप की शैली और उनकी राजनीति को जानते हैं, उनका कहना है कि अगर चीन पहले बता देता, तब भी क्या गारंटी थी कि ट्रंप उसकी बात पूरी गंभीरता से लेते?



अमेरिका में बहुत से लोग मानते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप अपनी गलतियां छिपाने के लिए चीन को दोषी ठहरा रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि चीन दूध का धुला है। आज जब अमेरिका अचानक दुनिया में कोरोना के संक्रमण का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है और मरीजों की संख्या के मामले में इटली, स्पेन और चीन से भी आगे निकल गया है, तब यह सवाल हर एक के मन में है कि दुनिया का सबसे आधुनिक, सबसे विकसित, सबसे ज्यादा सक्षम देश होने के बावजूद अमेरिका इस मामले में कैसे पिछड़ गया। इसका जवाब है कि अमेरिका ने समय रहते इस वायरस का प्रसार रोकने के लिए कदम नहीं उठाए।


ट्रंप ने पहली बड़ी गलती 2018 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ग्लोबल हेल्थ सेक्युरिटी की टीम को भंग करके की। यह टीम कोरोना जैसी महामारियों से बचाव की तैयारियां देखती थी। इस संस्था के अध्यक्ष रियर एडमिरल टिम जेमर को ठीक उस दिन हटाया गया, जिस दिन कांगो में इबोला की महामारी होने का एलान किया गया। पिछले साल अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी थी कि फ्लू की अगली महामारी बड़ी तबाही ला सकती है। फिर भी इस संस्था को बहाल नहीं किया गया।


अमेरिका की दूसरी गलती यह थी कि जब जनवरी में चीन के साथ-साथ दूसरे देशों में वायरस के फैलने की खबरें आने लगी थीं,  तब भी ट्रंप प्रशासन ने स्थिति को गंभीरता से नहीं लिया। तब ट्रंप ने कहा था कि हालात पूरी तरह काबू में हैं। 24 जनवरी को उन्होंने एक ट्वीट किया था कि चीन कोरोना वायरस को काबू में करने के लिए बहुत मेहनत कर रहा है और अमेरिका उसकी कोशिशों और पारदर्शिता की प्रशंसा करता है। सिंगापुर, हांगकांग और ताइवान जैसे देशों ने तो चीन में वायरस फैलते ही अपने यहां बड़े पैमाने पर एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए थे।


पर अमेरिका ने ऐसा कुछ नहीं किया। वहां लोगों को हालात की गंभीरता का एहसास ही नहीं था। वे स्कूल, कॉलेज और दफ्तर जा रहे थे, समुद्र तटों पर वक्त बिता रहे थे, पार्टियां कर रहे थे और जमकर खरीदारी कर रहे थे। अमेरिका की मशहूर वेबसाइट एमएसएनबीसी ने लिखा है कि ट्रंप प्रशासन ने उस बहुमूल्य मौके को हाथ से निकल जाने दिया।


अमेरिकी सरकार ने तब जाकर मामले को गंभीरता से लिया, जब लंदन के इंपीरियल कॉलेज ने अपनी एक रिपोर्ट में चेतावनी दी कि अगर सरकारों ने कुछ न किया, तो ब्रिटेन में 5,10,000 और अमेरिका में 22 लाख लोग मारे जा सकते हैं। अगर अब जरूरी कदम उठा लिए जाएं, तब भी मौतों की संख्या आधी ही की जा सकती है। इसके बाद ट्रंप प्रशासन की नींद उड़ गई और उसने तत्परता दिखानी शुरू की।


अमेरिका की तीसरी गलती यह थी कि उसने चीन से आने-जाने वालों पर पाबंदी देर से यानी दो फरवरी से लगाई, और वह भी बहुत सीमित थी। पूर्व ओबामा प्रशासन के दौरान इबोला महामारी के समय व्हाइट हाउस का प्रभार देखने वाले रॉन क्लैन ने पांच फरवरी को कहा था कि पिछले महीने करीब तीन लाख लोग चीन से अमेरिका आ चुके हैं। उन्होंने कहा था कि आज यानी पांच फरवरी को भी 30 विमान अमेरिका के शहरों में उतरेंगे, जो या तो चीन से ही चले हैं या फिर चीन से होते हुए आ रहे हैं। उसके कुछ दिन पहले 24 जनवरी को ही अमेरिका में वुहान से आए दो लोगों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि हो गई थी।
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वायरस के संदिग्धों की बड़े पैमाने पर जांच न किया जाना अमेरिका की चौथी बड़ी गलती था। आज ताइवान, हांगकांग, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर ने इस वायरस के संक्रमण को बढ़ने नहीं दिया है, तो इसके तीन कारण हैं-शुरुआती मामले आते ही तुरंत प्रतिक्रिया जताना, ज्यादा से ज्यादा लोगों की जांच करना और लॉकडाउन या सोशल डिस्टेंसिंग को लागू करना।


अमेरिका ने ये सभी काम करने में बहुत देर कर दी। अमेरिका में कहा जा रहा है कि ये कदम उठाने में देर करने के पीछे ट्रंप के मन में बैठा यह डर हो सकता है कि बड़ी संख्या में लोगों की जांच करना और मरीजों की पहचान करना या तो दहशत पैदा करेगा या फिर प्रभावितों का बड़ा आंकड़ा उजागर होना चुनाव में ट्रंप पर भारी पड़ सकता है। 26 फरवरी को प्रेस से बातचीत में ट्रंप ने कहा था, 'हमने जितना काम किया है, उसकी वजह से अमेरिकी जनता के लिए जोखिम बहुत कम हैं। हमारे यहां 15 मरीज हैं और एकाध दिन में यह संख्या शून्य के आसपास आ जाएगी।'


अमेरिका की पांचवीं गलती यह है कि ट्रंप प्रशासन ने अपने यहां महामारियों से लड़ने के लिए ज्यादा बिस्तरों वाले अस्पताल, क्वारंटीन के ठिकाने, बड़े पैमाने पर जांच की व्यवस्था, व्यापक इमर्जेंसी मेडिकल आपूर्ति आदि का कोई ढांचा तैयार नहीं किया। बल्कि कहा यह जाता है कि पिछले ओबामा प्रशासन ने जो कुछ ढांचा तैयार भी किया था, मौजूदा सरकार ने उसे खत्म कर दिया। सुविधाओं के अभाव में इतने बड़े वैश्विक संकट से निपटना अब आसान नहीं होगा।


ट्रंप प्रशासन की छठी गलती संभवतः यह थी कि उसने जर्मनी में बने डायग्नोस्टिक टेस्ट की खरीद की पेशकश ठुकरा दी। यह टेस्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मंजूरीशुदा था, पर अमेरिका ने इसके किट्स नहीं खरीदे और  बाकी देशों ने वे खरीद लिए। नतीजतन अमेरिका में टेस्टिंग किट्स की भारी किल्लत हो गई और वायरस प्रभावितों की ढंग से जांच ही नहीं हो पाई। अफसोस की बात है कि दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति आज भीषण महामारी का सबसे बड़ा वैश्विक केंद्र बन गई है। इससे लाखों अमेरिकी नागरिकों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही है, अगले चुनाव में खुद राष्ट्रपति ट्रंप के जीतने की संभावना पर भी इसका असर पड़ा है। (लेखक विज्ञान और तकनीक के विशेषज्ञ हैं।)

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