कोरोना के कारण यह जो समय हमें मिला है, यह ईश्वर की हमें कृपा प्राप्त हुई है कि व्यस्तता के कारण अभी तक जो काम नहीं कर पा रहे थे, उन्हें अब आराम से बैठकर पूरे कर सकें। मैं इस समय फिल्में देख रहा हूं। 'मुल्क' फिल्म मुझे इतनी अच्छी लगी कि उसके निर्देशक अनुभव सिन्हा की दो-तीन फिल्में मैंने एक साथ देख डालीं।
जापान के मशहूर एनीमेटर और फिल्ममेकर हयाओ मियाजाकी की एनीमेशन फिल्में मेरे एजेंडे में शामिल थी कि जब भी मौका मिलेगा, जरूर देखूंगा। अब उनकी एनीमेशन फिल्में देख रहा हूं। अद्भुत फिल्में हैं! एक-एक फिल्म प्रेरक है। मियाजाकी एनीमेशन में पर्यावरण और अन्य तमाम मुद्दों को लेकर चलते हैं।
वैसे तो हर रचनात्मक व्यक्ति का सोचने का अपना तरीका होता है, लेकिन मियाजाकी की एनीमेशन फिल्में देखते हुए मैं यह जानने की कोशिश कर रहा हूं कि उनकी जो तकनीक है, जो कॉन्सेप्ट है, वह दरअसल आता कहां से है। लॉकडाउन न होता, तो मुझे यह सब देखने-समझने का मौका कैसे मिलता?
मैं तो लोगों से गुजारिश करूंगा कि इस समय वे मियाजाकी की एनीमेशन फिल्में देखें। जिंदगी फन है, तो जो मौका मिले, हड़प लो, छोड़ो मत। कोरोना ने जो मौका दिया है, अलबत्ता यह दुखद है, त्रासदी है, लेकिन घर में बैठकर मच्छर मारने से बेहतर है कि कुछ रचनात्मक किया जाए।
कोरोना के दौर में पानी का कोई जिक्र नहीं हो रहा है, लेकिन इससे निपटने के बाद पानी का भयानक संकट उत्पन्न होने वाला है। फैक्ट्रियां बंद होने से नदियों का पानी साफ होगा, लेकिन नगरपालिकाओं का पानी तो लॉकडाउन के दौर में भी उनमें ही जा रहा है। ऐसे में सरकार को नदियों की साफ-सफाई को मेंटेन रखना होगा। 1958-59 में मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत नाजुक थी। घर में राशन नहीं होता था। ऐसे में तनाव और अवसाद के कारण मुझे बेहोशी के दौरे पड़ने लगे।
उसी समय विख्यात बर्मी-भारतीय गुरु सत्य नारायण गोयनका जी भारत आए थे। एक दोस्त ने मुझसे मजाक में कहा कि आपके लिए दस दिन फ्री खाने का इंतजाम हो गया है। मैं तो दस दिन के भोजन की खातिर विपश्यना मेडिटेशन कैंप में गया, लेकिन उसने मेरी काया पलट दी। मेरे दिमाग की स्लेट क्लीन कर दी और दिमाग पूरी तरह शांत हो गया।
उसके बाद मैंने पत्नी और बच्चों को भी विपश्यना ध्यान शिविर में भेजा। आज भी मैं रोज सुबह एक घंटा ध्यान लगाता हूं, इसलिए मायूसी मुझे छू भी नहीं सकती। कहने का मतलब यह कि आज का जो मायूसी भरा माहौल है, इससे आपको ध्यान ही बाहर निकाल सकता है, इसलिए ध्यान लगाएं।
हर शख्स की अपनी पसंद होती है। मुझे शास्त्रीय संगीत पसंद है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के अलावा सितार और गजलें खूब सुनता हूं। 'उमराव जान' की तो एक-एक गजल मुझे आज भी याद है। तो इस समय मन को शांति प्रदान करने वाला संगीत सुनें।
कामकाजी पति-पत्नी वाले मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह मौका है कि रद्दी आदि को निकालकर घर को स्वच्छ और संवार दें। घर अगर स्वच्छ होगा तो समझो, भगवान आ गए। दूसरे, आप जिसे भी मानते हैं, आपकी सुबह उसके भजनों, उपदेशों, आयतों से होनी चाहिए।
मैं सुबह विपश्यना के बाद अपने गुरु जी के दोहे सुनता हूं। मेरे घर में सभी धर्मों के संतों के चित्र लगे हैं। मैं जब भी किसी उलझन में फंसता हूं तो सोचता हूं कि मेरी जगह अगर मुहम्मद साहब, जीसस क्राइस्ट या महात्मा गांधी होते, तो वे क्या करते, और मेरी उलझन का हल मुझे मिल जाता है। (लेखक मशहूर कार्टूनिस्ट हैं।)