अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो और फ्रेंच नोबल लॉरिएट तथा एचआईवी के सह-आविष्कारक लॉक मॉन्टेनियर उन कुछ लोगों में से हैं, जिनका मानना है कि चीन ने जान-बूझकर कोविड-19 का वायरस फैलाया है।
इन दोनों का दावा है कि यह वायरस चीन के ताजा कटे पशु मांस के बाजार से नहीं, बल्कि चीन की इकलौती और सर्वोच्च चार रेटिंग वाली माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशाला से आया है।
अमेरिका और फ्रांस ताकतवर देश हैं। दूसरी ओर, आर्थिक रूप से कमजोर और चीन पर निर्भर देश इस मामले में कुछ कहने से बच रहे हैं और उन्होंने सुरक्षित रवैया अपनाया है। भारत इन दोनों ही श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में, भारत ने अमेरिका, यूरोपीय संघ के खासकर इटली, स्पेन और जर्मनी जैसे देश तथा ऑस्ट्रेलिया की तरह भारतीय कंपनियों में चीनी निवेश के मामले में सीधे विदेशी निवेश की अपनी नीति बदली है।
नई दिल्ली द्वारा हांगकांग, सिंगापुर और उन दूसरे देशों के जरिये आने वाले निवेश पर भी, जहां चीनी की परोक्ष उपस्थिति है, अंकुश लगाने का फैसला स्वागतयोग्य है। फौरी तौर पर यह कदम जहां भारतीय कंपनियों में अधिग्रहण की चीनी मंशा पर लगाम लगाएगा, वहीं स्थानीय कारोबार पर भी इसका असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए, इसका असर उन भारतीय कंपनियों पर भी पड़ेगा, जो वर्षों से चीनी निवेश पर निर्भर हैं, और जो देश में सस्ते चीनी उत्पाद बेचती हैं।
अध्ययन बताता है कि चीनी निवेशकों ने भारतीय कंपनियों में चार अरब डॉलर निवेश किए हैं और पिछले पांच साल में 30 में से 18 भारतीय स्टार्ट-अप्स में चीनी पूंजी लगी है। इसके अतिरिक्त फ्लिपकार्ट से लेकर पेटीएम और ओप्पो से लेकर फार्मा कंपनियों तक में चीनी निवेशकों ने 3.5 अरब डॉलर का निवेश किया है।
इन निवेशों को मंजूरी मिलने का एक कारण यह भी है कि भारत ने बिना आगा-पीछा देखे सीधे विदेशी निवेश पर जोर दिया, जिसे आर्थिक समृद्धि का एक संकेतक माना जाता है। इसका एक और कारण यह भी है कि मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की हमारी कंपनियां सस्ते चीनी उत्पादों को देखकर खुश होती थीं, जैसा कि नितिन गडकरी ने हाल ही में बताया कि आइस्क्रीम के साथ दिए जाने वाले लकड़ी के चम्मच चीनी बांस से तैयार होते हैं।
जाहिर है, भारतीय कंपनियों को चम्मच समेत ऐसे अनेक उत्पाद अब खुद तैयार करने होंगे। इससे न केवल देश में रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी, बल्कि 'मेक इन इंडिया' को भी वास्तविक अर्थों में इससे गति मिलेगी। कोरोना महामारी से जो व्यापक बदलाव आने वाले हैं, यह भी उनमें से एक आशाजनक बदलाव होगा।
बहुतेरे लोगों की तरह इन पंक्तियों के लेखक का भी यह मानना है कि कोविड-19 के वायरस का प्रसार संभवतः चीन की ही कारस्तानी है। क्या यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की चीन की सुनियोजित चाल थी? हालांकि इससे हजारों चीनी नागरिकों की जान गई, लेकिन चीन के लिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। चीनी नेताओं को अपने नागरिकों की मौत परेशान नहीं करतीं। क्या इसके पीछे पश्चिमी देशों की उन कंपनियों पर चीनी अधिग्रहण की मंशा काम कर रही थी, जो विश्व शक्ति बनने की चीन की राह में रोड़ा बनी हुई थीं?
लेकिन ऐसा लगता है कि चीन की यह योजना अब उल्टी पड़ गई है, क्योंकि आपूर्ति शृंखला टूट जाने के कारण अनेक पश्चिमी देशों को अब चीन पर अपनी अति निर्भरता के नुकसान का एहसास होने लगा है। इसके अलावा भय और आशंका से शेयर बाजार भी टूट चुके हैं। चीन की रणनीति का दूसरा हिस्सा यह था कि वायरस के हमले से लचर हो चुकी कंपनियों में निवेश बढ़ाकर देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर धीरे-धीरे कब्जा जमाया जाए। भारत के पड़ोस में चीन यह काम पहले ही कर चुका है।
लेकिन चीनी निवेश बहुत कठिन शर्तों के साथ आते हैं, जिससे बाहर निकलने की गुंजाइश कम ही होती है। युद्ध जर्जर श्रीलंका का ही उदाहरण लीजिए, जिसके पास चीनी सहायता के चलते उत्कृष्ट सड़कें और बंदरगाह हैं। चीनी मदद ने श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को एक ऊंचाई प्रदान की, लेकिन एक कीमत पर।
उसका हम्बनटोटा बंदरगाह एक चीनी शहर बन गया है, क्योंकि श्रीलंका चीन द्वारा मांगी गई ऊंची ब्याज दरों का भुगतान करने में असमर्थ था। इसलिए जब श्रीलंका भुगतान नहीं कर सका, तब चीनियों ने एक बड़े बैंक की तरह हम्बनटोटा बंदरगाह के साथ शहर पर कब्जा कर लिया। चीन इसी तरह की चाल मालदीव, म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल में भी चल रहा है।
इन सभी देशों को अपनी विकास दर आगे बढ़ाने के लिए धन की जरूरत है और चीन के पास धन है। इसके अलावा वह समय पर परियोजनाएं पूरी भी करता है। दूसरी तरफ भारत यह उम्मीद करता आया है कि उसकी भौगोलिक निकटता और अच्छे पड़ोसी धर्म का वादा पड़ोसी देशों के बीच चीनी आक्रामकता का उपयुक्त जवाब हो सकता है। लेकिन जैसा कि हमने पिछले एक दशक में देखा है, ऐसा कुछ नहीं है।
हममें से बहुत कम लोगों को यह पता है कि चीन भारत के साथ व्यापार कर और यहां के बाजारों में अपने उत्पादों की बिक्री से प्रति वर्ष 50 अरब डॉलर से अधिक कमाता है। यह उस राशि के बराबर है, जो कि चीन ने पाकिस्तान को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के निर्माण की दिशा में उसकी उदारता के बदले देने का वादा किया था। पाकिस्तानियों को भी यह विश्वास हो गया कि यह गलियारा पाकिस्तान के अर्ध-विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए पर्याप्त होगा! लेकिन यह सच्चाई से परे है। इसने बस पाकिस्तान को चीनियों का गुलाम बना दिया है।
इस परिदृश्य में भारतीय अर्थव्यवस्था में चीनी निवेश को प्रतिबंधित करने का हमारी सरकार का यह कदम एक आश्चर्य के रूप में आया है, क्योंकि भारत ने अतीत में और अब भी चीन के बढ़ते विस्तारवादी कदम और चीन के पक्ष में बढ़ते व्यापार असंतुलन को रोकने के लिए जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन यह और वक्त है, जब भारत ने चीन के झांसे को चुनौती दी है। (लेखक रणनीतिक विश्लेषक हैं।)