जाहिर है, इस दौरान देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना आर्थिक नीतियों का मुख्य मकसद होगा। अभी देश में प्रति व्यक्ति जीडीपी करीब 2,300 अमेरिकी डॉलर है, जबकि चौथे पायदान वाले जर्मनी में यह 48,000 और तीसरे पायदान वाले जापान में 33,000 डॉलर के आसपास है। जीडीपी के आकार में भारत से पिछड़ चुके इंग्लैंड में प्रति व्यक्ति आय आज भी हमसे 20 गुना से ज्यादा है।
पिछले दो-तीन दशकों से भारतीयों के जीवन स्तर में बहुत बदलाव आए हैं। इसके बावजूद अगर भारत के आर्थिक विकास के मामले में एक राय नहीं बन पा रही, तो इसका मुख्य कारण आर्थिक विकास से संबंधित विभिन्न सर्वेक्षणों, रिपोर्टों आदि के अद्यतन या नवीनतम रूप का उपलब्ध न होना है। असंगठित क्षेत्र पर निर्भर रहने वाले व्यक्तियों की संख्या तथा उनके आर्थिक जीवन स्तर से संबंधित उपलब्ध आंकड़े करीब 13 वर्ष पुराने हैं। जबकि राष्ट्रीय आय का करीब 50 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र के रोजगारों के माध्यम से उपलब्ध होता है। लेकिन जब आंकड़े एक दशक से अधिक पुराने हों, तो असंगठित क्षेत्र की वर्तमान स्थिति को कैसे समझा जाए? कृषि क्षेत्र पर निर्भर व्यक्तियों से संबंधित सर्वेक्षण भी पुराने हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की बागडोर लंबे अरसे से सेवा क्षेत्र के कंधों पर है। लेकिन इससे संबंधित सर्वेक्षण वर्ष 2011 का है, जबकि पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में अनगिनत परिवर्तन देखने को मिले हैं।
एक अन्य अचंभित करने वाली बात यह है कि मुद्रास्फीति की गणना के तौर-तरीके भी तर्कसंगत नहीं हैं। भारतीय रिजर्व बैंक सदैव उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को मुख्य आधार बनाकर चलता है और उसमें भी खाद्य पदार्थों की वेटेज तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है। मौसमी सब्जियों के मूल्य में उतार-चढ़ाव महंगाई दर को अधिक प्रभावित करते हैं, पर कच्चे तेल के मूल्य में हुए परिवर्तन विश्व स्तर पर बहुत अधिक प्रभावित नहीं करते।
ऐसे ही, पिछले एक दशक में स्वास्थ्य सुविधाओं तथा शिक्षा के मामले में निजी क्षेत्र के प्रति समाज का आकर्षण बढ़ा है। और बच्चों की ट्यूशन पर होने वाला खर्च तो महंगाई के किसी भी तरीके के आंकड़े में शामिल ही नहीं है। यह बात भी अचंभित करती है कि गेहूं के मूल्य में हुए बदलाव महंगाई बढ़ाते हैं, दूसरी तरफ सरकारी आंकड़ों में 80 करोड़ लोगों को मुफ्त में अनाज वितरित भी किया जाता है।
गौर करने वाली बात यह है कि प्रति व्यक्ति उपभोग तथा खरीदारी के तरीकों का देश में अंतिम बार सर्वेक्षण 2011-12 में हुआ था। क्या पिछले एक दशक में भारतीयों की खरीदारी के तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं हुआ है? हमारे देश की जनसंख्या के आंकड़े भी 12 वर्ष पुराने हैं, जिसके कारण हम आर्थिक विकास में प्रति व्यक्ति अंशदान की वर्तमान वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं हो पा रहे।
पिछले समय में हुए कुछ बदलाव अब स्थायी रुख अख्तियार कर चुके हैं। स्टार्ट-अप्स स्थापित हो चुके हैं। मनोरंजन उद्योग में भी पुराने सिनेमाघर को पीवीआर ने बदला तथा अब ओटीटी के प्लेटफॉर्म ने भी अलग जगह बना ली है। ऑनलाइन खरीदारी हमारी आदत में शुमार हो गई है, सोशल मीडिया ब्रांडिंग का एक मुख्य टूल बन गया है और हर मध्यवर्गीय परिवार अपने प्रत्येक सदस्य के लिए मोबाइल की खरीदारी को मुख्य प्राथमिकता देता है। नोटबंदी के बाद यूपीआई के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से होने वाले आर्थिक लेन-देन तथा लगातार बढ़ रहा जीएसटी संग्रह सबको आकर्षित कर रहे हैं।
ऐसे में, विकसित होने की राह पर चलने के लिए अब जरूरत सिर्फ इस बात की है कि अर्थव्यवस्था से संबंधित सभी तरह के आर्थिक सर्वेक्षणों की नवीनतम जानकारी उपलब्ध हो तथा उसके आधार पर आर्थिक नीतियां विकसित की जाएं।