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जब मांझी ही नैया डुबोए: कांग्रेस अब भी भाजपा के हाथों में खेल रही है, नए अध्यक्ष पद का चुनाव ठंडे बस्ते में

रशीद किदवई
Updated Mon, 07 Jun 2021 05:16 AM IST

सार

कांग्रेस के पुनरुद्वार से संबंधित बीसियों रिपोर्टें धूल फांक रही हैं, नए अध्यक्ष के चुनाव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। न तो पहले की हारों का पारदर्शी विश्लेषण हुआ, न आगामी चुनाव से जुड़ी कोई तैयारी दिखती है।
 
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सोनिया-राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI


बदतर यह कि कांग्रेस अब भी भाजपा के हाथों में खेल रही है। पार्टी पर गांधी परिवार की मजबूत पकड़, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को महत्व न देना, मुस्लिम तुष्टीकरण और भीषण संकट के समय प्रधानमंत्री के दफ्तर को कमजोर करने की कोशिश-ये कुछ आरोप हैं, जो भाजपा कांग्रेस पर लगाती है। इन आरोपों को झुठलाने के बजाय राहुल गांधी के मनमौजी नेतृत्व, कांग्रेस शासित पंजाब और राजस्थान में अंतर्कलह, पार्टी के चुनाव रद्द करना, मोदी सरकार पर हमला करने के लिए ट्विटर पर अतिशय निर्भरता, संगठन में निरर्थक नियुक्तियां, हालिया विधानसभा चुनावों में हार पर पारदर्शी विश्लेषण की कमी और उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों के लिए तैयारी का अभाव आदि भाजपा के आरोपों को सही ही साबित करते हैं।


जब समूची कांग्रेस पार्टी और बाहरी दुनिया राहुल गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर वापसी या फिर किसी गैर गांधी को नेतृत्व की जिम्मेदारी देने की प्रतीक्षा कर रही हैं, तब कांग्रेस ने इमरान मसूद को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का सचिव और इमरान प्रतापगढ़ी को अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का प्रमुख बनाया है। कठोर छवि वाले ये दोनों लोग 2019 का लोकसभा चुनाव हार चुके हैं। मुरादाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले कवि इमरान प्रतापगढ़ी को जहां पांच प्रतिशत वोट मिले, वहीं भाजपा और बसपा से मात खाए मसूद को 16 प्रतिशत से थोड़े अधिक वोट मिले। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इन दोनों की नियुक्तियों पर कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठे हैं।


पंजाब कांग्रेस में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच के विवाद का समाधान करने के लिए पार्टी ने हाल ही में तीन सदस्यीय समिति गठित की है। पर पार्टी में ही बहुतों को हैरत है कि उच्च स्तरीय समिति गठित करने की क्या जरूरत थी, जबकि कांग्रेस के लिए इन दोनों में से कैप्टन ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? हां, सिद्धू के राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा से बेहतर संबंध हैं। पर क्या इसका समय नहीं आ गया है कि गांधी परिवार के पसंदीदा लोगों पर मजबूत नेताओं को तरजीह दी जाए, खासकर तब, जब चुनाव नजदीक हो? इस तर्क में दम है कि कैप्टन की उम्र को देखते हुए पंजाब में कांग्रेस को दूसरे नेता को तैयार करने की जरूरत है, पर मौजूदा समय उसके लिए सही नहीं है।


उत्तराखंड में भी कांग्रेस ठीक ऐसी ही दुविधा का सामना कर रही है कि अगले साल वहां होने वाले विधानसभा चुनाव में वह अपने पुराने नेता हरीश रावत को मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर पेश करे या फिर नए नेता का चुनाव जीतकर आने वाले विधायकों पर छोड़ा जाएगा। उत्तर प्रदेश के विपरीत उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए सत्ता में लौटने की बेहतर संभावना है, पर इसके लिए पार्टी को एकजुटता दिखानी होगी। राहुल ऐसे समय ट्विटर पर अति निर्भरता दिखा रहे हैं, जब भारत में यह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म संकट का सामना कर रहा है। हाल ही में राहुल ने ट्विटर पर अनेक पत्रकारों, राजनेताओं और लोगों को इस आधार पर अनफॉलो कर दिया कि वे कांग्रेस से जुड़े हुए नहीं हैं। दरअसल राहुल इस बात से क्षुब्ध थे कि उनके बचपन के दोस्त ज्योतिरादित्य सिंधिया ने विगत 21 मई को राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर ट्विटर पर श्रद्धांजलि देते हुए पहले उन्हें 'आधुनिक भारत के निर्माता' और 'भारत रत्न' के रूप में संबोधित किया, फिर उसे डिलीट कर पूर्व प्रधानमंत्री को औपचारिक श्रद्धांजलि दी।


यह समझना मुश्किल है कि राजीव और सोनिया गांधी के दोस्त अमिताभ बच्चन को फॉलो करते रहने के बाद राहुल ने उन्हें अनफॉलो क्यों कर दिया? गांधी और बच्चन के रिश्तों पर रहस्य की धुंध है। भाजपा इसका लाभ उठा रही है, तो राहुल द्वारा अनफॉलो कर दिए जाने पर कुछ बड़े पत्रकारों ने उन पर हमला बोला है। ये वे पत्रकार हैं, जिन्हें भाजपा व उसके समर्थक उदारवादी मानते हैं। यह हद है कि राहुल सोशल मीडिया तक पर अपने समर्थक खो रहे हैं। कुछ लोग तसदीक करेंगे कि अप्रैल, 2020 में सोनिया गांधी ने विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए 11 सदस्यीय कमेटी गठित की थी।


कोविड की दैनिक स्थिति का आकलन करने के लिए भी उन्होंने एक पैनल बनाया था। अव्वल तो इन समितियों की बैठक नहीं होती, और अगर होती भी है, तो उस बारे में कुछ सार्वजनिक नहीं होता। जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं, सोनिया गांधी मुद्दे के हल के लिए जो कदम उठाती हैं, वे कालातीत या व्यर्थ होते हैं। कांग्रेस के पुनरुद्धार के लिए सोनिया ने तीन बार ए के एंटोनी की मदद ली। संगठन के मुद्दों के हल के लिए 1999, 2008 और 2014 में एंटोनी कमेटी गठित हुई। कमेटी ने पार्टी के चुनाव, आंतरिक लोकतंत्र की बहाली, पार्टी के ढांचे, प्रत्याशियों के चुनाव और पार्टी पर्यवेक्षकों के बारे में बीस सुझाव दिए थे।
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इसके अलावा भी सोनिया और राहुल गांधी को सौंपी गई कई रिपोर्टें 24, अकबर रोड में धूल खा रही हैं, जिनमें संगठन चुनाव के बारे में रामनिवास मिर्धा की रिपोर्ट, पार्टी फंड पर मनमोहन सिंह की रिपोर्ट, संगठन के आधुनिकीकरण पर पीए संगमा और सैम पित्रोदा की रिपोर्टें तथा सांगठनिक मामलों पर प्रणब मुखर्जी की रिपोर्ट हैं। इन सभी रिपोर्टों में पार्टी और संगठन में व्यापक बदलाव के सुझाव दिए गए हैं, पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।


सोनिया और राहुल गांधी ने अयोध्या में बन रहे राम मंदिर पर भी खामोशी बनाए रखी है, जो उत्तर प्रदेश के चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है। जाहिर है, चुनाव अभियान में योगी आदित्यनाथ इन्हें 'मंदिर-विरोधी' के तौर पर पेश करेंगे।

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