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सबक नहीं सीखती कांग्रेस

Thu, 03 Jul 2014 07:48 PM IST
नीरजा चौधरी
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ए के एंटनी ने हाल में बयान दिया कि बहुत से लोगों का मानना है, अल्पसंख्यकों की ओर कांग्रेस के कथित झुकाव की वजह से ही उसे लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त शिकस्त का सामना करना पड़ा। उनके इस बयान ने जहां कांग्रेस के भीतर एक बहस को जन्म दिया है, वहीं छद्म सेक्यूलरिज्म के लिए भारत की सबसे पुरानी राजनीति पार्टी की बखिया उधेड़ने का भाजपा को एक और मौका भी दे दिया है। कुछ लोगों का मानना है कि एंटनी की यह टिप्पणी खासकर केरल की स्थिति पर है, जहां भारतीय जनता पार्टी के बेहतर होते प्रदर्शन ने उनको चिंता में डाल दिया है, इसलिए इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए।
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मगर ध्यान देने वाली बात है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जहां पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जहां अब तक उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था, वहीं ओडिशा, असम, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी उसने जड़ें जमाई हैं, जहां अब तक उसकी मौजूदगी नाममात्र की समझी जाती थी। उत्तर और पश्चिमी भारत में तो भाजपा ने तकरीबन सबका सफाया ही कर दिया।

भाजपा की इस जीत के लिए जहां कांग्रेस के खिलाफ लोगों की नाराजगी और 'मजबूत नेता' की छवि वाले नरेंद्र मोदी के विकास का वायदा जिम्मेदार है, वहीं कई राज्यों में हुए हिंदू-मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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ऐसे में, एंटनी की चिंता को महज केरल तक सीमित नहीं किया जा सकता। फिर समझने वाली बात यह भी है कि हाईकमान के अनुमोदन के बिना क्या एंटनी ऐसा कोई बयान दे सकते थे! वह अब भी 10, जनपथ के करीबी हैं, यूपीए-2 सरकार में प्रणब मुखर्जी के बाद दूसरे नंबर पर थे, लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन सहयोगियों के साथ तालमेल के लिए बनी समिति के अध्यक्ष थे, और फिलहाल पार्टी की हार का पोस्टमार्टम करने वाले समूह का नेतृत्व कर रहे हैं। एंटनी दिग्विजय सिंह नहीं हैं, जो राहुल गांधी के सलाहकार के रूप में चुनाव भर तो भावी प्रधानमंत्री के तौर पर उनकी योग्यता के कसीदे पढ़ते रहे, मगर हाल ही में देश का शासन संभालने में राहुल की योग्यता पर सवाल खड़े कर गए।

एंटनी ने ऐसी टिप्पणी कोई पहली बार नहीं की है। 2003 में जब वह केरल के मुख्यमंत्री थे, तब भी उन्होंने अपनी यही चिंता जाहिर की थी। वह, और शायद हाईकमान भी अब यह महसूस करने लगा है कि मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने के लिए पार्टी ने शायद कुछ ज्यादा ही रुचि दिखा दी। कांग्रेस के विरोधी मुस्लिम तुष्टिकरण कहकर जहां पार्टी की आलोचना करते रहे, वहीं इस दौरान हिंदुओं की तीखी प्रतिक्रिया का सामना भी पार्टी को करना पड़ा।

लोकसभा चुनाव के नतीजे गवाह हैं कि 2002 के गुजरात दंगों को लेकर क्षुब्ध-आशंकित मुस्लिमों के मन में नरेंद्र मोदी को लेकर जो खुला विरोध था, उस पर हिंदुओं ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई, और भाजपा को खुलकर समर्थन दिया। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगे ने भी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया, और जाटों ने हिंदू पहचान के तहत एकजुट होकर भाजपा को वोट दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो खुले तौर पर हुआ, कमोबेश वही छिपे तौर पर देश के दूसरे हिस्सों में भी हुआ।

यह विरोधाभास ही था कि हिंदुत्व का चेहरा बने नरेंद्र मोदी तो चुनाव प्रचार के दौरान विकास और सुशासन की बातें करते रहे, जबकि कांग्रेस के नेता हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही बढ़ावा देते रहे, जिसका फायदा अंततः भारतीय जनता पार्टी को ही मिला।

कांग्रेस को न तो सोनिया गांधी के जामा मस्जिद के शाही ईमाम से मिलने का लाभ मिला, न ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस बयान का फायदा मिला कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। दिग्विजय सिंह का बाटला हाउस एनकाउंटर पर बयान हो या लादेन को ओसामा जी और रामदेव को ठग कहकर संबोधित किया जाना, इन सबका पार्टी को नुकसान हुआ। मगर लगता है कि कांग्रेस ने इससे सबक नहीं सीखा। तभी तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले वहां की सरकार मुस्लिमों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के हिस्से के तौर पर नहीं, बल्कि पृथक रूप से 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि अतीत में ऐसी ही राजनीति से कांग्रेस ने कई बार फायदा भी कमाया है। मगर इस बार नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस के लिए रास्ता आसान नहीं है। एक ओर तो घोटाले और महंगाई के लांछन उसका पीछा नहीं छोड़ रहे, वहीं नरेंद्र मोदी की चुनौती भी है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को हिंदू वोट का बड़ा हिस्सा मिला, मगर यह विडंबना ही है कि कांग्रेस को उस बड़ी तादाद में मुस्लिम वोट नहीं मिले। मुस्लिम भी कांग्रेस के प्रदर्शन से उतने ही नाखुश थे, जितने कि हिंदू।

दरअसल शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में सर्वाधिक पिछड़े मुस्लिमों की परेशानियों का समाधान केवल आरक्षण नहीं है। गौरतलब है कि अगर शिक्षा और कौशल विकास, बच्चों के पोषण और रोजगार सृजन के सार्वभौमिक प्रसार पर ध्यान दिया जाएगा, तो इससे सबसे ज्यादा फायदा दलितों और मुस्लिमों को ही पहुंचेगा।

मगर दिक्कत यह है कि भाजपा ने जिस तरह हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की राह चुनी, उसी तरह कांग्रेस की प्राथमिकता मुस्लिम वोट हासिल करने में रही। जहां तक एंटनी के बयान के मतलब है, तो इसका मकसद हिंदू मतदाताओं को यह संदेश देना हो सकता है कि कांग्रेस को उनकी उतनी ही परवाह है, जितनी कि मुस्लिमों की। लेकिन कांग्रेस ने एक ऐसे मुद्दे पर बहस छेड़ दी है, जिस पर उसे पुनर्विचार करना चाहिए। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से वह पीछे हट जाए।
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