राष्ट्रीय राजनीति के कोलाहल के बीच नगालैंड में फिर सत्ता परिर्वतन हो गया। करीब पांच महीने पहले जहां से सत्ता परिवर्तन का खेल आरंभ हुआ था, एक पूरा चक्र घूमकर फिर वहीं पहुंच गया है। उस समय एनपीएफ (नगालैंड पीपुल्स फ्रंट) के नेता और सत्तारूढ डेमोक्रेटिक एलायंस ऑफ नगालैंड के प्रमुख टी आर जेलियांग को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। वही जेलियांग फिर मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्हें मुख्यमंत्री भी अजीब स्थिति में बनाया गया। निवर्तमान मुख्यमंत्री शुरहोजेलि लीजीत्सु को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सदन में अपना बहुमत साबित करना था। पर वह और उनके साथी सदन में बहुमत साबित करने के लिए उपस्थित ही नहीं हुए। जब वह आए ही नहीं , तब राज्यपाल के सामने बहुमत का दावा करने वाले जेलियांग को शपथ दिलाने के अलावा कोई चारा नहीं था।
लीजीत्सु ने पहले न्यायालय का सहारा लेकर अपनी सत्ता बचाने की कोशिश की। उन्होंने सदन में बहुमत साबित करने के राज्यपाल के निर्देशों पर स्थगन लगाने का अनुरोध उच्च न्यायालय से किया था, पर न्यायालय की कोहिमा पीठ ने उसे खारिज कर दिया। लीजीत्सु को अपनी स्थिति का आभास हो गया था। इसलिए उन्होंने विधानसभा में विश्वासमत से पहले इस्तीफा देने का संकेत दिया था। यह साफ दिख रहा था कि वर्तमान 59 सदस्यीय विधानसभा में जेलियांग को करीब 43 सदस्यों का बहुमत प्राप्त है।
नगालैंड में सत्ता की रस्साकशी कई दिनों से चल रही थी। विगत चार जुलाई को जेलियांग के आवास पर विधायकों की एक बैठक हुई, जिसमें उन्हें नेता चुना गया। उसमें उन्होंने 34 विधायकों के समर्थन का दावा किया था। उन्होंने राज्यपाल से यह कहते हुए सरकार बनाने देने की अपील की कि लीजीत्सु सरकार अल्पमत में है।
नगालैंड में सत्ता परिवर्तन का आधार निकाय चुनावों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे से शुरू हुआ था। आंदोलनकारी जेलियांग सरकार के इस्तीफे की मांग पर अड़ गए थे। वे विधायकों को भी चेतावनी दे रहे थे कि अगर वे सरकार से नहीं हटते हैं, तो उनको खामियाजा भुगतना पड़ेगा। नतीजतन एनपीएफ के 48 में से 40 विधायकों ने लीजीत्सु के नेतृत्व में नई सरकार के गठन का एलान कर दिया था।
लीजीत्सु के नेतृत्व में तत्काल तो विधायकों को लगा था कि उनका भविष्य सुरक्षित है। किंतु धीरे-धीरे स्थिति पलटी। जिन्हें कोई पद नहीं मिला, वे असंतुष्ट थे। जबकि लीजीत्सु ने अपने बेटे को सलाहकार नियुक्त कर कैबिनेट मंत्री का पद दे दिया। इसके खिलाफ आवाजें उठीं। जेलियांग इन सबका लाभ उठाने के लिए तैयार बैठे थे। अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव है और विधायकों को लगता है कि सही नेतृत्व नहीं मिला, तो वे पराजित हो सकते हैं।
नगालैंड में घटनाक्रम जहां से आरंभ हुआ, वहीं पहुंच गया है। किंतु आगे नगालैंड में राजनीतिक स्थिरता कायम रहेगी, इसकी गारंटी नहीं है। जेलियांग ने महिलाओं को आरक्षण देकर गलती नहीं की थी। पर कुछ लोगों को यह अपनी परंपरा के विरुद्ध लगा और उन्होंने बगावत कर दिया। जिन विधायकों ने उस समय डर से पाला बदल दिया, वे फिर ऐसी किसी घटना पर पाला नहीं बदलेंगे, इसकी गारंटी नहीं है। यह पूर्वोत्तर का दुर्भाग्य रहा है कि वहां किसी न किसी कारण से कोई न कोई राज्य राजनीतिक अस्थिरता का शिकार होता रहा है। इस पर विचार करना होगा कि ऐसी स्थिति से पूर्वोत्तर के राज्यों को कैसे उबारा जाए।