फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मतदाताओं के मन में क्या चलता है

Thu, 27 Jul 2017 06:25 PM IST
अमित आहूजा
विज्ञापन
मतदाता
विज्ञापन
भारत के लोग त्वचा के रंग का बहुत ख्याल रखते हैं। जब भी किसी शिशु का जन्म होता है, तब अभिभावक सबसे पहले दो चीजों के बारे में जानना चाहते हैं, उसका लिंग और उसकी त्वचा का रंग। वर्ष 2014 में भारतीयों ने गोरेपन से संबंधित उत्पादों पर 3,695 करोड़ रुपये खर्च किए। सौंदर्य प्रसाधन कंपनियों के विज्ञापन उपभोक्ताओं को लगातार याद दिलाते हैं कि विवाह और रोजगार के बाजार में सफलता गोरेपन की क्रीम पर निर्भर है। पर क्या गोरी त्वचा उम्मीदवारों को चुनाव में जीत दिला सकती है? उम्मीदवारों की त्वचा के रंग का चुनावी नतीजे पर असर जानने के लिए मैंने नाट्रेडम विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर सुसान ओस्टर्मन तथा यूसी सांटा बारबरा में विकास अर्थशास्त्री आशीष मेहता के साथ अध्ययन शुरू किया। चुनावों के दौरान आमतौर पर मतदाताओं को उम्मीदवारों के बारे में बहुत जानकारी नहीं होती है। नतीजतन वे उम्मीदवारों के बारे में निर्णय लेने के लिए शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं, जैसे पार्टी संबद्धता, जाति, धर्म, लिंग जैसे कारकों पर ध्यान देना। शोध में हमने पाया कि दलित (और खासकर गरीब) मतदाता समाज के बाकी हिस्सों की तुलना में काली त्वचा वाले उम्मीदवारों के प्रति समर्थन जताते हैं।
विज्ञापन


दुनिया भर में हुए अनुसंधानों ने स्थापित किया है कि मतदाता उम्मीदवारों की शारीरिक छवि पर प्रतिक्रिया देते हैं, जिनमें त्वचा का रंग भी शामिल है। सामान्यतः गोरी त्वचा को ज्यादा पसंद किया जाता है। मसलन, अमेरिका में अश्वेत त्वचा वाले अफ्रीकी अमेरिकी की तुलना में श्वेत त्वचा वाले उम्मीदवारों की जीत की संभावना ज्यादा होती है। हमने चुनावी नतीजे पर उम्मीदवारों की त्वचा के रंग का असर जानने के लिए 599 मतदाताओं का सर्वे किया। इनका चुनाव छह मतदान केंद्रों से किया गया था, जिनमें से तीन अपेक्षाकृत समृद्ध इलाके दक्षिण दिल्ली से और तीन अपेक्षाकृत गरीब इलाके पूर्वी दिल्ली से थे। हमने चुनाव लड़ने वाले काल्पनिक उम्मीदवारों के तीन प्रोफाइल तैयार किए। इनमें एक ही व्यक्ति की गोरी, गेंहुआं और श्याम वर्ण की तस्वीरें थीं और वैचारिक रूप से तटस्थ एक समान प्रचार संबंधी वायदे थे। हमने प्रत्येक मतदाता को बेतरतीब ढंग से केवल एक तस्वीर दिखाई और उनसे पूछा कि अगर ये आपके विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ते हैं, तो क्या आप उन्हें वोट देंगे। हमारे सर्वेक्षणकर्ताओं ने संभावित उम्मीदवारों को समर्थन देने से संबंधित हर मतदाता की इच्छाओं को दर्ज किया, जो कि मतदाताओं के अपने रंग से मेल खाता था। हमने अपने उत्तरदाताओं से उनकी जाति, आय, शिक्षा और अन्य प्रासंगिक विशेषताओं के बारे में भी पूछा। जैसी कि अपेक्षा थी, मतदाताओं के तीनों उप-समूह जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं के मामले में पूरी तरह समान नहीं थे। हमने सांख्यिकीय तकनीक से इन असंतुलनों को संबोधित किया।

हमारा शोध बताता है कि बाकी दुनिया की तरह दिल्ली की चुनावी राजनीति में भी गोरी त्वचा को वरीयता मिलती है। लेकिन यह प्रवृत्ति कम है। इसलिए नहीं कि लोग चुनावी मामले में त्वचा के रंग के आधार पर भेदभाव नहीं करते, बल्कि इसलिए कि उम्मीदवारों की त्वचा के रंग में पसंद को लेकर विविधता है। रंगवाद को लेकर आवेग सच है, हमारे सभी उत्तरदाताओं ने गोरी त्वचा के संभावित उम्मीदवार के प्रति पर्याप्त समर्थन जताया, सर्वे में शामिल अन्य उम्मीदवारों से गोरी त्वचा वाले उम्मीदवार को आठ फीसदी ज्यादा समर्थन मिला। इससे समझा जा सकता है कि ज्यादातर भारतीय राजनेताओं को पोस्टरों में उनके असली रंग से ज्यादा गोरा क्यों दर्शाया जाता है। पोस्टर निर्माताओं से इंटरव्यू से पता चला कि राजनेताओं को गोरा बनाने की प्रथा व्यापक है।
विज्ञापन


 जैसी कि अपेक्षा थी, काले रंग के उम्मीदवारों के प्रति अप्रत्याशित समर्थन हाशिये पर रहने वाले समूहों, दलित एवं गरीबों की ओर से जताया गया। इन दोनों वर्गों के उत्तरदाताओं में काले और गोरे उम्मीदवारों के समर्थन में बहुत कम अंतर था।  गरीब और दलित मतदाता काले रंग को निम्न मानी जाने वाली जाति और निम्न सामाजार्थिक स्थिति के लिए निहित चिह्न मानते हैं। यह आचरण तर्कहीन नहीं है, हमारे आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि उच्चतर जाति और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के अपने समकक्षों की तुलना में इन सीमांत समूहों के उत्तरदाता औसतन काले रंग के होते हैं। काले रंग के उम्मीदवार शायद इन मतदाताओं को अपने ज्यादा करीबी लगते हैं। हमने यह भी पाया कि काली त्वचा वाले उत्तरदाताओं द्वारा काली त्वचा वाले उम्मीदवारों की तुलना में गोरी त्वचा वाले उम्मीदवारों को चुनने की ज्यादा संभावना होती है।

यह बताता है कि लोग गोरी और गेंहुआं त्वचा वाले उम्मीदवारों को ज्यादा पसंद करते हैं। अपने आप में मतदाता की त्वचा का रंग उम्मीदवारों के चयन को प्रभावित नहीं करता। इसी तरह, जब हमने जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर ध्यान दिया, तो पाया कि उत्तरदाताओं का लिंग भी उम्मीदवारों के समर्थन को प्रभावित नहीं करता।

दिल्ली और पूरे भारत में दलित और गरीब मतदाताओं की बड़ी संख्या है। लोकतंत्र में संख्या का महत्व होता है और जब दलित एवं गरीब मतदान के लिए निकलते हैं, तो आबादी के कुछ हिस्सों में रंगभेद की भावना के बावजूद सीमांत वर्गों में श्याम वर्ण वाले उम्मीदवारों के जीतने की ज्यादा संभावना होती है। दिल्ली विधानसभा और संसद में किए गए अध्ययन का विश्लेषण इसकी पुष्टि करता है कि भारत में श्याम वर्ण वाले निर्वाचित उम्मीदवारों की संख्या बहुत ज्यादा है। हमने पाया कि 2014 में संसद में चुने गए 28.5 सदस्य और 2013 में दिल्ली विधानसभा में चुने गए 25 फीसदी सदस्य श्याम वर्ण के हैं। चुनावों में श्याम वर्ण के लोगों के पर्याप्त संख्या में चुने जाने और सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा मिलने से भारत में दीर्घकाल से प्रचलित काले लोगों से संबंधित लांछन को कम किया जा सकता है।
विज्ञापन


-लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में राजनीतिक विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर हैं
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें