उस व्यापारिक युद्धविराम के खत्म होने के बाद अब जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका पहुंचे हैं, तब उनके व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच की मुलाकात दोनों देशों के रिश्तों में एक नया अध्याय है। यह दोनों महाशक्तियों के लिए एक मौका है कि वे पिछले साल से मिले जरूरी सबक को अपनाएं और इस सोच को छोड़ दें कि कोई भी पक्ष निर्णायक रूप से ‘जीत’ सकता है। इसके बजाय वे एक मजबूत और स्थायी शांति की शुरुआत कर सकते हैं। बीजिंग और वाशिंगटन, दोनों जानते हैं कि कोई भी एक-दूसरे को निर्णायक रूप से हरा नहीं सकता, क्योंकि दोनों के पास ऐसी जबर्दस्त खूबियां हैं, जिनका मुकाबला करना दूसरे पक्ष के लिए मुश्किल है।
अमेरिका के पास बेजोड़ आर्थिक ताकत है और वह सेमीकंडक्टर डिजाइन, चिप बनाने के लिए जरूरी उपकरण तथा सबसे उन्नत एआई मॉडल के मामले में सबसे आगे है। वहीं, चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। रेयर-अर्थ मिनरल्स व जरूरी खनिजों की वैश्विक आपूर्ति, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स, कारों और हथियारों के लिए जरूरी उच्च-क्षमता के चुंबक उत्पादन पर चीन का दबदबा है। अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के लिए चीन में बने रसायन और दूसरी चीजें जरूरी हैं। चीन सस्ते एआई मॉडल उपलब्ध कराने में आगे निकल गया, जिन्हें अमेरिका समेत दुनियाभर में तेजी से अपनाया जा रहा है।
स्थायी तनाव कम करने के लिए यह दोनों पक्षों के लिए उतना ही जरूरी हो सकता है, जितना शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जरूरी था। शीत युद्ध के दौरान, परमाणु हथियारों की होड़ और दोनों तरफ से पूर्ण तबाही के डर ने वाशिंगटन और मॉस्को को विनाश के कगार से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। आज भी वही सोच काम करती है, लेकिन एक अहम फर्क है और वह यह कि उस समय अमेरिका और सोवियत संघ के बीच व्यापार बहुत कम था, जबकि आज चीन और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।
पिछले साल व्यापारिक टकराव की वजह से दोनों देशों के बीच व्यापार में 25 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद, चीन (मेक्सिको व कनाडा के बाद) अमेरिका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा। इसलिए, दोनों देशों का पूरी तरह से अलग-थलग होना न तो मुमकिन है और न ही सही। अब अमेरिका और चीन के सामने शीत युद्ध के दौर की ‘डिटरेंट’ यानी एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाने से रोकने वाली रणनीति का नया रूप है। इसमें दोनों देशों को एक-दूसरे के खिलाफ कदम उठाने पर भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। आर्थिक या रणनीतिक रूप से निर्णायक जीत हासिल करने की कोशिश से भी कोई खास फायदा नहीं होगा। इसके बजाय इससे पैदा होने वाली उथल-पुथल का असर आम लोगों पर पड़ेगा, जो इसे नहीं चाहते।
दोनों देशों के नागरिक अब टकराव से थक रहे हैं। कुछ सर्वेक्षणों के अनुसार, खासकर युवा अमेरिकी चीन से टकराव के बजाय सहयोग के पक्ष में हैं। चीन में भी लोग लगातार बढ़ती इस होड़ से थक चुके हैं। वे ऐसी अर्थव्यवस्था से दूरी बना रहे हैं, जो उनकी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के बजाय देश की ताकत बढ़ाने और अमेरिका से मुकाबला करने पर ज्यादा जोर देती है। शी जिनपिंग की नजर अगले साल होने वाली कम्युनिस्ट पार्टी शिखर बैठक पर है और वह चाहते हैं कि इस संवेदनशील समय में शांति बनी रहे। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में ट्रंप निश्चित रूप से चीन के साथ कृषि व्यापार समझौते करने को उत्सुक हैं, ताकि उन्हें वे जीत के तौर पर पेश कर सकें। इसलिए दीर्घकालीन नजरिये से यह भेंट कुछ ज्यादा अहम है।
एआई एक अहम मुद्दा है और इससे जुड़े खतरे का सामना दोनों देश कर रहे हैं। अमेरिका में, एआई सिस्टम ने संवेदनशील नेटवर्क में सेंध लगाई है और कई बार अप्रत्याशित व्यवहार किया है। इस महीने कैलिफोर्निया की एक सिक्योरिटी फर्म ने खुलासा किया कि एआई ने उन्हें चीन के प्रमुख मैसेजिंग एप ‘वीचैट’ पर अकाउंट्स को हाईजैक करने का तरीका खोजने में मदद की थी। इसके बाद चीन के शीर्ष खुफिया अधिकारी ने चेतावनी दी कि अगर एआई पर नियंत्रण नहीं रहा, तो यह राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। ऐसी चिंताओं की वजह से चीन और अमेरिका के लिए तनाव कम करना और बातचीत के रास्ते खुले रखना और भी जरूरी हो गया है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दोनों देश व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव को लेकर एक-दूसरे से होड़ करना बंद कर देंगे।
असली बात यह है कि दोनों देश इस सच्चाई को समझते हैं कि बहुत ज्यादा मांगें और धमकियां किसी भी देश के हित में नहीं हैं, और वे एक स्थिर भविष्य की नींव रख सकते हैं। वाशिंगटन को यह समझना होगा कि चीन दुनिया में अपना असर बढ़ाना चाहता है और विदेशी दबाव के प्रति अपनी कमजोरी को कम करना चाहता है, न कि अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक को कमजोर करना चाहता है। बीजिंग को भी यह समझना होगा कि जब भी वह जरूरी धातुओं पर अपने दबदबे का इस्तेमाल करता है, तो इससे अमेरिका अपनी आपूर्ति शृंखला में विविधता लाने की कोशिशें तेज कर देता है। इससे चीन की ताकत कम होती है और बीजिंग के इरादों को लेकर अमेरिका का डर और बढ़ जाता है।
तनाव कम रखने का बड़ा फायदा उन संभावनाओं का दायरा बढ़ाना है, जो भविष्य में साकार हो सकती हैं। एक ज्यादा स्थिर रिश्ते से नियमित बातचीत हो सकती है, संकटों को संभालना आसान हो सकता है और मानवता की सबसे बड़ी चुनौतियों (जैसे कि एआई, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य) पर लगातार और बेहद जरूरी काम करने के लिए रास्ते खुल सकते हैं, जिन्हें कोई भी देश अकेले हल नहीं कर सकता। इसके लिए आपसी भरोसे की नहीं, बस इतनी समझदारी और संयम की जरूरत है कि प्रतिस्पर्धा बाकी रिश्ते पर हावी न हो जाए।