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धार्मिक-सामाजिक और सांस्कृतिक ज्ञान का वाहक है चातुर्मास, यह सनातन की तरह सर्वकालिक

सार

आश्वलायन गृह्यसूत्र के अनुसार, चातुर्मास तीन हैं- वैश्वदेव, वरुणप्रघास और साकमेध। कुछ लेखकों ने 'शुनासीरीय' नाम वाला एक चौथा चातुर्मास भी सम्मिलित किया है। वैश्वदेव फाल्गुन या चैत्र की पूर्णिमा पर, वरुणप्रघास आषाढ़ की पूर्णिमा तथा साकमेध कार्तिक की पूर्णिमा पर किए जाते हैं। इनमें तीन ऋतुओं- वसंत, वर्षा एवं हेमंत के आगमन का निर्देश मिलता है।
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चातुर्मास का आरम्भ - फोटो : festival


आश्वलायन गृह्यसूत्र के अनुसार, चातुर्मास तीन हैं- वैश्वदेव, वरुणप्रघास और साकमेध। कुछ लेखकों ने 'शुनासीरीय' नाम वाला एक चौथा चातुर्मास भी सम्मिलित किया है। वैश्वदेव फाल्गुन या चैत्र की पूर्णिमा पर, वरुणप्रघास आषाढ़ की पूर्णिमा तथा साकमेध कार्तिक की पूर्णिमा पर किए जाते हैं। इनमें तीन ऋतुओं- वसंत, वर्षा एवं हेमंत के आगमन का निर्देश मिलता है। वास्तव में चातुर्मास ऋतु-संबंधी यज्ञ है। शुनासीरीय चातुर्मास के लिए कोई निश्चित तिथि नहीं है।


अब प्रायः वर्षा काल का सूचक वरुणप्रघास चातुर्मास ही रह गया है, जिसके आयोजन साधु-महात्माओं द्वारा कहीं-कहीं होते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी या द्वादशी या पूर्णिमा को या उस दिन, जिस दिन सूर्य कर्क राशि में प्रविष्ट होता है, चातुर्मास व्रत का आरंभ होता है। यह चाहे जब शुरू हो, कार्तिक शुक्ल में द्वादशी को समाप्त हो जाता है। चातुर्मास में धार्मिक कृत्यों का संपादन होता था। यायावर संतों की धर्म यात्राएं थम जाती थीं। राजाओं के सैन्य अभियान रुक जाते थे। यह चातुर्मास काल की महत्ता ही है कि पुरातन काल से चले आ रहे महत्वपूर्ण चार पर्वों में होली को छोड़कर शेष तीन पर्व-रक्षा बंधन, विजयादशमी और दीपावली चातुर्मास में ही मनाए जाते हैं। चातुर्मास आध्यात्मिक, दार्शनिक और सामाजिक उत्सव थे। स्मृतियों और धर्मशास्त्र के ग्रंथों से साफ है कि सहस्राब्दियों तक इनकी परंपरा अनवरत चलती रही। कालांतर में चातुर्मास के कृत्यों में परिवर्तन होते गए।


12वीं शती में इस्लामी आक्रांताओं के आने के बाद ये समाप्त-से हो गए और इनके स्थान पर अन्य धार्मिक कृत्य किए जाने लगे, जिन पर चातुर्मास की छाया देखी जा सकती है। आज चातुर्मास के बारे में एक धूमिल-सी धारणा है। इसके बारे में घोर अज्ञान है। यह वेदों से शुरू होता है। इसकी शास्त्रीय परंपरा जो भी रही हो, पर आम आदमी इसे कर्मकांड से ज्यादा नहीं मानता। इसकी शाखाएं खुद तना बन गई हैं। हर शाखा ने वृक्ष का रूप ले लिया और मूल मरता चला गया। पर चातुर्मास सार्वभौम तथा सार्वकालिक है। जरूरी है कि इसके बारे में लोगों में भ्रम न रहे। यह एक परंपरा है। यह धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ज्ञान का वाहक है। इसका इतिहास किसी से मत पूछिए। यह उसी प्रकार सनातन है, जैसे सनातन धर्म है। ये आस्थावान बनने की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य होने का मर्म बताते हैं। आनंद की परिभाषा समझाते हैं।


देवताओं की कृपा प्राप्ति के लिए और गंभीर पापों के फल से छुटकारा पाने के लिए यज्ञ किए जाते थे। शतपथ-ब्राह्मण का कथन है कि अश्वमेध यज्ञ करने से राजा पापमुक्त होते थे। पाप से मुक्त होने का एक अन्य साधन है- पाप की स्वीकारोक्ति, यानी किए गए पापों का व्यक्ति के मुख से उच्चारण। यह स्वीकारोक्ति वरुणप्रघास चातुर्मास से व्यक्त होती है, जिसमें यजमान को अपने द्वारा किए गए दुराचरणों को सबके सामने बोलना पड़ता था। चातुर्मास के पीछे केवल इच्छापूर्ति की ही भावना मात्र नहीं थी, जैसा यूरोपीय विद्वानों ने कहा है, बल्कि पापमोचन की भावना भी निहित थी। वरुणप्रघास चातुर्मास में पति और पत्नी को उनके द्वारा स्पष्ट प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से यह स्वीकार करने पर कि उसका किसी अन्य स्त्री या पुरुष से शरीर-संबंध था, पवित्र मान लिया जाता था और उन्हें धार्मिक एवं सामाजिक कृत्यों में भाग लेने की अनुमति मिल जाती थी। इन ऋतु-संबंधी यज्ञों में व्रती को कुछ कृत्यों का त्याग करना होता था, यथा- शैया शयन, मांस, मधु, मैथुन एवं शरीरालंकरण। चातुर्मास में कुछ वस्तुओं के त्याग के फलों के विषय में कृत्यतत्व, व्रतार्क, व्रतप्रकाश एवं अन्य मध्यकालिक निबंधों में मत्स्य पुराण एवं भविष्य पुराण के कुछ वचन पाए जाते हैं- गुड़-त्याग से मधुर स्वर प्राप्त होता है। तेल-त्याग से अंग सुंदर होते हैं। घृत-त्याग से सौंदर्य मिलता है। शाक-त्याग से बुद्धि की प्राप्ति होती है तथा दधि और दूध के त्याग से व्यक्ति दिव्य लोकों में जाता है। चातुर्मास आने-जाने वाला काल मात्र नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपरा और साहित्य में रचा-बसा है।

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