वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ बातचीत करने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ऐसी ही वार्ताओं के लिए मॉस्को और बीजिंग गए थे। वाशिंगटन में मनमोहन सिंह ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बिडेन और विदेश मंत्री जॉन केरी को दिल्ली आने का आमंत्रण दिया है, ताकि दोनों देशों के सामरिक हलकों को यह संदेश दी जा सके कि भारत और अमेरिका के रिश्तों में कोई ठहराव नहीं आया है।
मनमोहन सिंह ने द्विपक्षीय असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के समयबद्ध क्रियान्वयन में होने वाली कठिनाइयों के मद्देनजर अमेरिकी नीति नियंताओं के साथ तालमेल कायम किया है। उन्हें यह बताने की कोशिश भी की गई है कि भारत-अमेरिकी परमाणु व्यापार की राह में परमाणु दायित्व अधिनियम आड़े नहीं आएगा। लेकिन मॉस्को में दिमित्रोव को वह नहीं बता पाए कि दो रूसी रिएक्टर परमाणु दायित्व अधिनियम से मुक्त रहेंगे या नहीं। यानी हमारे प्रधानमंत्री की परमाणु कूटनीति ज्यादा कामयाब नहीं हुई है। इसी कारण देश का असैन्य परमाणु कार्यक्रम भी विलंबित होता जा रहा है।
मनमोहन सिंह की संक्षिप्त मॉस्को यात्रा अलबत्ता इस अर्थ में कामयाब रही कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के समर्थन की बात दोहराई। इसके अलावा उन्होंने मिसाइल तकनीक नियंत्रण क्षेत्र और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह जैसे संगठनों में भारत के प्रवेश को भी अपना समर्थन दिया। जबकि चीन की तरफ से ऐसा आश्वासन पाने में मनमोहन सिंह सफल नहीं हुए। इसका अर्थ यह है कि आगे भी बीजिंग ऐसे महत्वपूर्ण संस्थानों में भारत की सदस्यता का विरोध करेगा या सतर्क चुप्पी साध लेने की नीति का अनुसरण करेगा। यानी महत्वपूर्ण वैश्विक संस्थानों में स्थायी सदस्यता हासिल करने का भारत का इरादा फिलहाल पूरा नहीं होने जा रहा।
भारत की कूटनीति इतनी जटिल है कि उसकी वास्तविक आकांक्षाओं पर संदेह होने लगता है। भारत लगातार अमेरिका के साथ बेहतर रणनीतिक संबंध बनाने में लगा है, जबकि अमेरिका न सिर्फ वैश्विक मामलों में खुद को अगुआ दिखाना चाहता है, बल्कि वह कहीं भी अपना प्रतिद्वंद्वी पैदा नहीं होने देना चाहता। दूसरी ओर, रूस और चीन के साथ मिलकर भारत एक ऐसे बहुध्रुवीय विश्व की वकालत भी करता है, जहां किसी एक देश की दादागीरी की आशंका न हो। रूस-चीन-भारत का त्रिकोण अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहुध्रुवीय रुख अपनाने का आग्रही है। मनमोहन सिंह की रूस और चीन की यात्रा के बाद नई दिल्ली में तीनों देशों के बीच होने वाली विदेश मंत्री स्तर की वार्ता भी भारत के कूटनीतिक उद्देश्यों को ही प्रकट करती है। अमेरिका बेशक भारत के साथ द्विपक्षीय सामरिक सहयोग कर रहा है, पर उसे नई दिल्ली पर पूरा भरोसा शायद ही हो।
लेकिन क्या रूस को यह विश्वास है कि भारत उसकी नीतियों का पूरा समर्थन करता है? मनमोहन सिंह ने मॉस्को में बेहद प्रभावी भाषण दिया, जिसमें उन्होंने राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक स्तरों पर हमेशा भारत का साथ देने के लिए रूस की सराहना की। उन्होंने रूस को भारत के लिए ‘अनिवार्य सहयोगी’ तक करार दिया। भारत-अमेरिकी रिश्तों के संदर्भ में खुद ओबामा भी इस शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं।
शीतयुद्ध के बाद से अब तक अमेरिका और रूस के रिश्ते बहुत मधुर नहीं रहे हैं। कई मसलों पर दोनों के बीच मतभेद अब तक बने हुए हैं। ऐसे में, क्या अमेरिका और रूस, दोनों के साथ भारत भरोसे की साझेदारी निभा पाएगा? व्यावहारिक तौर पर यह आसान नहीं लगता। भारतीय सैन्य खरीद में रूस की हिस्सेदारी घट गई है, जिससे मॉस्को घबराया हुआ है। जबकि इसी दौरान अपने यहां सैनिक साज-ओ-सामान की खरीदारी में अमेरिकी कंपनियों का हिस्सा काफी बढ़ गया है। अगर हथियारों की बिक्री को लेकर रूस और अमेरिका में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ती है, तो यह भारत के लिए फायदेमंद होगा। हालांकि इसके कुछ नुकसान भी हो सकते हैं, इसलिए भारत को चौकन्ना रहना होगा।
जहां तक चीन का सवाल है, तो व्यापार और निवेश के संदर्भ में भारत अपने इस पड़ोसी के साथ लगातार संबंध सुधार रहा है। लेकिन सैन्य मामलों, सुरक्षा और विदेशी नीति से जुड़े कुछ जरूरी मसलों में भारत अब भी अमेरिका के ही ज्यादा निकट है। जबकि चीन और अमेरिका एक दूसरे को संदेह की निगाह से देखते हैं। चीन की धारणा है कि अमेरिका बीजिंग के उभार पर अंकुश लगाना चाहता है और भारत को खुला समर्थन दे रहा है। उसे यह भी डर है कि सामरिक मामलों में भारत और चीन के बीच चल रहे मतभेदों को लेकर अमेरिका भारत का पक्ष ले सकता है। भारत को अमेरिका की ‘एशिया-प्रशांत रणनीति’ की धुरी बताने वाले पेंटागन के बयान ने चीन की चिंताएं और ज्यादा बढ़ा दी हैं। मनमोहन सिंह हालांकि साफ कह चुके हैं कि चीन को काबू में करने की किसी भी रणनीति से भारत दूर ही रहेगा। इसके बावजूद यह मानना मुश्किल है कि उनके बीजिंग दौरे से चीन की आशंका कम हुई होगी।
अमेरिका, रूस और चीन- तीनों भारत के लिए जरूरी हैं, पर तीनों से एक साथ दोस्ती निभाना भारतीय कूटनीति के लिए बड़ी चुनौती है। शीतयुद्ध काल में अमेरिका और सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्विता की वजह से भारत को काफी कुछ खोना पड़ा था। यही वजह है कि अब भारत अमेरिका, रूस और चीन के बीच पिसना नहीं चाहता। ऐसे में, संभव है कि गुटनिरपेक्षता की जगह अब वह सबसे दोस्ती बनाए रखने की नीति पर चले।