चुनावी भाषणों का दौर शुरू हो गया है। राजनेताओं की मंडियां मैदानों में सजने तथा टेलीविजन चैनलों में गरजने लगी हैं। आम आदमी फिर से पांच साल के लिए अपने भाग्यविधाता की उम्मीद में मुंह बाए रहेगा।
पहले तो पांच राज्यों में, उसके बाद लोकसभा के चुनाव रस्मी तौर पर होने को हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष एवं नेहरू-गांधी परिवार के युवराज राहुल जी ने उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में अपने कुर्ते की बांह चढ़ाते हुए कहा था कि मैं गरीबों-दलितों और आदिवासियों के हक में अपने सपनों को कुचलने के लिए तैयार हूं।
उधर गांधी जी के जन्म प्रदेश गुजरात से भारत को विकास के उच्च शिखर तक पहुंचाने का इरादा संजोए वहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी बिगुल बजाते हुए एक सभा में कहा कि मैं सपने देखने में विश्वास नहीं रखता, अपनी सक्रियता को सामने रखता हूं। उनके कुर्ते की बाहें आधी ही होती हैं, इसलिए उन्हें बांहें चढ़ाने की जरूरत नहीं होती।
भारत की जनता के भी सपने होते हैं। वह जानना चाहती है कि राहुल जी के सपने क्या-क्या हो सकते हैं- आयु के पांचवें दशक में प्रवेश कर जाने पर भी विवाह का सपना कुचलना या अपनी गणेश परिक्रमा करने वालों के सपने पूरे करने के लिए प्रधानमंत्री पद पाना? उसकी चिंता होती है कि मोदी जी सत्ता संभालने के बाद गुजरात की पुनरावृत्ति तो नहीं करेंगे! उनके विकास में किसानों और मजदूरों के लिए जगह होगी या नहीं!
सपने देखने और देश को दिखाने वालों में सिर्फ ऊपर लिखित दो अति धुरंधर नेता ही नहीं हैं, और भी अनेक हैं-कुछ अनुमानित, कुछ वांछित, कुछ अवांछित और कुछ लांछित। और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टकटकी लगाने वालों की तो पूछिए मत। राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी ही नहीं, मुलायम सिंह से लेकर नीतीश कुमार, नवीन पटनायक से लेकर जयललिता और मायावती से लेकर ममता बनर्जी तक इनमें शामिल हैं।
सपने देखने से कौन किसको रोक सकता है! लेकिन इस देश के मतदाता भाग्य विधाताओं की तरह बड़े-बड़े सपने नहीं देख पाते, तो यह उसकी लाचारी है। नेता तो गंदे कस्बे को न्यूयॉर्क बना डालने की कसम खाते हैं, जबकि वोट देनेवाला आदमी सड़क, पानी, बिजली और रोजगार से ज्यादा कुछ नहीं चाहता, पर वह भी पूरा नहीं हो पाता। फिर भी एक गरीब, हताश और हाहाकारी देश में सपने दिखाने वालों का स्वागत है।