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पूरब की चुनौती और महाशक्तियों के खेल: चीन-US का मददगार है PAK, भारत विशिष्ट कूटनीतिक स्थिति में, बड़ी चुनौती..

महेंद्र वेद
Updated Sat, 19 Jul 2025 07:04 AM IST

सार

पूरब का समग्र क्षेत्र अमेरिका और चीन के लिए खेल का मैदान बनता जा रहा है, और पाकिस्तान दोनों के लिए मददगार साबित हो रहा है। दूसरी तरफ दलाई लामा और शेख हसीना का समर्थन करने वाले भारत ने खुद को एक विशिष्ट कूटनीतिक स्थिति में खड़ा किया है। ऐसे में पूरब का प्रबंधन भारत के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
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बॉर्डर पर तैनात बीएसएफ जवान। (फाइल) - फोटो : संवाद


बांग्लादेश में बीते साल हुए सत्ता परिवर्तन के बाद तीसरे मोर्चे की संभावनाएं गहरी और व्यापक हो गई हैं। विदेशी सैनिकों की मौजूदगी और हथियार लेकर आ रहे जहाज चिंताजनक घटनाक्रम की ओर इशारा करते हैं। उन्हें भारत के मिजोरम, बांग्लादेश के टेकनाफ और म्यांमार की अशांत रखाइन घाटी के त्रि-जंक्शन की ओर भेजा जा रहा है, जहां सशस्त्र विद्रोही यांगून में चीन समर्थित सैन्य जुंटा को चुनौती दे रहे हैं। मौजूदा अस्थिरता के बीच, रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के लिए एक ‘मानवीय गलियारे’ की योजना बनाई जा रही है, जिनमें से कई भारतीय धरती पर भी हैं। विश्लेषकों का कहना है कि हालांकि इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रायोजित माना जाता है, लेकिन यह सीधे अमेरिकी चाल है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार इस परियोजना को आगे बढ़ाने की जल्दी में है, लेकिन बांग्लादेशी सेना इसका विरोध कर रही है।


सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमान ने कहा है कि इसे जल्द चुनाव कराने के बाद अगली सरकार पर छोड़ दिया जाए। बांग्लादेश सेना, विदेशी सेनाओं की उपस्थिति से पहली बार स्वयं को खतरे में महसूस कर रही है, क्योंकि मुक्ति संग्राम के दौरान वहां मौजूद भारतीय सेना तीन महीने के भीतर ही वहां से निकल गई थी। इसका भारत की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। सुरक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यह क्षेत्र अमेरिका और चीन के लिए एक खेल का मैदान बनता जा रहा है, और पाकिस्तान, जिसने हथियारों की खेप भेजी है, दोनों के लिए मददगार साबित हो रहा है।


अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक गठबंधन के बावजूद, भारत को लगता है कि वाशिंगटन इस क्षेत्र में चीन का सामना करने के लिए ज्यादा उत्सुक है। इस प्रक्रिया की शुरुआत बाइडन प्रशासन के समय ही हुई थी, लेकिन ट्रंप के नेतृत्व में इसकी गति और तेज हो गई है। भारत को पूर्व की ओर देखने व कार्रवाई करने की जरूरत की एक और वजह है। विदेशी नेताओं को शरण देने का भारत का लंबा इतिहास रहा है। दलाई लामा और शेख हसीना का मुद्दा अभी चर्चा में है, जो दक्षिण एशिया में तेजी से बदलते समय की राजनीतिक और कूटनीतिक मजबूरियों और जटिलताओं को रेखांकित करता है। तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय के अपने अनुयायियों के लिए उत्तराधिकार के मुद्दे पर दलाई लामा की बात पर मोदी सरकार ने अलग-अलग प्रतिक्रिया व्यक्त की। एक तरफ जहां वरिष्ठ मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, ‘उत्तराधिकार के मुद्दे पर दलाई लामा के अलावा किसी और को निर्णय लेने का अधिकार नहीं है’, वहीं विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस मुद्दे पर उसका कोई ‘रुख’ नहीं है। बाद में रिजिजू ने स्पष्ट किया कि उन्होंने दलाई लामा के एक ‘अनुयायी’ के रूप में यह बात कही थी।


वर्ष 1959 में दलाई लामा के भारत पलायन, उनके निरंतर प्रवास और निर्वासित तिब्बती सरकार ने भारत और चीन के संबंधों को गहराई से प्रभावित किया है। बीजिंग ने कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकार का मुद्दा भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में एक ‘कांटा’ है। इससे निपटने के लिए दीर्घकालिक और कुशल रणनीति की आवश्यकता होगी, क्योंकि यह वैश्विक दिलचस्पी को आकर्षित करता है।


बांग्लादेश में भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो रही है, जहां की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना पिछले वर्ष से भारत में रह रही हैं। यूनुस सरकार उनकी वापसी की मांग कर रही है, लेकिन भारत ने दृढ़ता से इससे इन्कार कर दिया है। यह बांग्लादेश के अंदर और बाहर उनके समर्थकों के लिए एक भावनात्मक मुद्दा बन गया है। इससे दिल्ली-ढाका संबंध और खराब हो सकते हैं। बांग्लादेश का घरेलू परिदृश्य भी भारत के लिए उतना ही चिंताजनक है। पिछले साल की हिंसा में पुलिस और नौकरशाही जनता के निशाने पर थी। अब भी उनमें आत्मविश्वास नहीं आया है और वे अपनी भूमिका नहीं निभा पाए हैं। मौजूदा अराजकता ने इस्लामी कार्यकर्ताओं को आलोचकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ कार्रवाई करने की खुली छूट दे दी है। भारत-विरोधी इस्लामवादी बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर हावी हैं, और यूनुस खुद अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना से बदला लेना चाहते हैं। यूनुस अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाकर उन्हीं गलतियों को दोहरा रहे हैं, जो आरोप वे हसीना पर लगाते हैं। इस्लामवादियों को छोड़कर, बाकी स्थापित पार्टियां जल्द चुनाव कराने पर जोर दे रही हैं।


सेना प्रमुख ने भी सुरक्षा कारणों से यही मांग की है, ताकि कानून-व्यवस्था की चौतरफा बिगड़ती स्थिति को रोका जा सके, जिससे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को खुली छूट मिल गई है। हालांकि, यूनुस ने आगामी अप्रैल में चुनावों की घोषणा कर दी है, लेकिन उनके करीबी लोगों द्वारा लाभ उठाने की होड़ के कारण चुनाव कराना मुश्किल हो रहा है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) इस देरी को निराशाजनक मान रही है। उसे डर है कि अंतरिम सरकार ऐसी परिस्थितियां पैदा कर रही है, जिसमें अगर वह स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाती है, तो उसे इस्लामवादियों का समर्थन लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
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विश्लेषकों का कहना है कि यूनुस और उनके समर्थकों को डर है कि अगर समय से पहले चुनाव हुए, तो हसीना की अवामी लीग को अपनी कानूनी और राजनीतिक चिंताओं को दूर करने के लिए अनुकूल माहौल मिल सकता है। अगर बीएनपी सत्ता में वापस आती है, तो भी अवामी लीग के लिए एक राजनीतिक सरकार से निपटना आसान हो जाएगा। ढाका से आ रही खबरों के अनुसार, अवामी लीग के पास अब भी भारी मात्रा में धन है। चुनावों को लेकर संशय बरकरार रहने के बीच, हसीना की भारत में मौजूदगी का भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर पड़ना तय है। साथ ही, इनके नतीजे भारत के पूर्वी हिस्से में महाशक्तियों के खेल को भी तय करेंगे।

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