इस योजना की खास बात यह है कि यह नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम से प्रेरित है, और जो केंद्र के ग्यारह मंत्रालयों की छत्तीस मौजूदा योजनाओं को एकीकृत करेगी, जिससे संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित होगा। भारतीय कृषि को लंबे समय से कम उत्पादकता, जलवायु में बदलाव, और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह योजना इन चुनौतियों के अलावा, टिकाऊ खेती को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देती है। योजना के तहत फसल विविधीकरण के माध्यम से किसानों की एक ही फसल पर निर्भरता कम होेगी।
यह योजना खासकर छोटे और सीमांत व महिला किसानों, कृषि-तकनीकी स्टार्टअप और स्वयं-सहायता समूहों को फायदा पहुंचाएगी। अनुमान है कि इस योजना से करीब 1.7 करोड़ किसान लाभान्वित होंगे, जिससे स्वाभाविक ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी विकास होगा। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि यह केवल सब्सिडी आधारित राहत न होकर, संरचनात्मक सुधारों पर केंद्रित है। इससे किसान उत्पादन से लेकर विपणन तक के हर चरण में सशक्त बनेगा। हालांकि कम उत्पादकता वाले सौ जिलों का चयन और वहां रणनीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन एक जटिल प्रक्रिया होगी। इसके अतिरिक्त, किसानों तक योजना की जानकारी और लाभ पहुंचाने के लिए जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण की जरूरत होगी।
आवेदन प्रक्रिया को सरल व पारदर्शी बनाना भी उतना ही जरूरी है, ताकि छोटे और सीमांत किसान आसानी से इसका लाभ उठा सकें। टिकाऊ खेती के लिए मिट्टी की सेहत, जल संरक्षण और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने की भी जरूरत है। देश की खाद्य सुरक्षा, रोजगार और निर्यात के संदर्भ में यह योजना भारतीय कृषि का कायाकल्प करने की क्षमता रखती है, बशर्ते इसका सही ढंग से कार्यान्वयन भी हो।