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बच्चों को मिले साझा परवरिश

Tue, 09 Jun 2015 07:20 PM IST
ऋतु सारस्वत
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विधि आयोग ने केंद्र सरकार को सौंपी अपनी 157वीं रिपोर्ट में तलाकशुदा दंपतियों के बच्चों की परवरिश को लेकर कई सिफारिशें की हैं, ताकि माता-पिता के अलग होने के बाद बच्चों पर विपरीत प्रभाव न पड़े। आयोग ने तलाकशुदा दंपति के बच्चों की पारिवारिक न्यायालय की निगरानी में साझा परवरिश का कानूनी प्रावधान किए जाने पर जोर दिया है। ऐसा आयोग ने पति-पत्नी, दोनों को बच्चों का स्वाभाविक अभिभावक मानते हुए कहा है। आयोग का यह कदम स्वागतयोग्य है, क्योंकि देखने में आता है कि तलाक के बाद पति-पत्नी के बीच बच्चों पर हक की कानूनी लड़ाई का परोक्ष रूप से बच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में विधि आयोग की यह पहल अदालतों में बच्चों को कानूनी दांव-पेच का मोहरा बनने से बचाएगी।
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बीते दशकों में भारतीय संस्कृति और सामाजिक परिवेश में परिवर्तन के चलते विवाह संस्था भी प्रभावित हुई है। पारिवारिक मूल्यों और संयुक्त परिवार के टूटने के अलावा, पुरुषों में वर्चस्ववादी सोच, महिलाओं में बढ़ती मनोवैज्ञानिक और वित्तीय स्वतंत्रता के कारण तलाक के मामलों में वृद्धि हुई है। दस वर्ष पूर्व जहां तलाक दर प्रति एक हजार दंपति पर मात्र एक प्रतिशत थी, वह वर्तमान में 1.3 प्रतिशत हो गई है। तलाक के मामले हर साल देश में बढ़ रहे हैं। तलाक की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है, खासकर जब दंपति के बच्चे हों।

दरअसल तलाक और बच्चे ऐसे संवेदनशील विषय हैं, जिनके संबंध में कोई  निश्चित परिपाटी नहीं अपनाई जा सकती। मानवीय भावनाएं किसी परिभाषा में नहीं बंध सकतीं। दो व्यक्ति अगर एक-दूसरे से किसी भी मुद्दे पर सहमत न हों, और उनके बीच कड़वाहट और घृणा हो, तो उनका एक छत के नीचे रहना संभव नहीं है। शोध बताते हैं कि माता-पिता के बीच निरंतर होते झगड़े बच्चों के भीतर डर और अवसाद पैदा करते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों की बेहतरी इसी में है कि वे ऐसे माहौल से दूर रहें।
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मौजूदा कानून के अनुसार, पांच साल तक के बच्चे की कस्टडी मां के पास होनी चाहिए। कस्टडी के मामले पर अदालत महीने-पंद्रह दिनों में बच्चे से पिता को मिलने का एक निश्चित दिन तय कर देती है। लेकिन देखने में आया है कि आपसी रिश्तों की कड़वाहट के चलते मां और उसके मायकेवाले बच्चे को पिता के खिलाफ कर देते हैं। इसका एक भावनात्मक पक्ष यह भी है कि अदालत द्वारा सामान्यत: यह माना जाता है कि बच्चा पिता की अपेक्षा मां से अधिक जुड़ा होता है। इसलिए ज्यादातर कस्टडी के मामलों में बच्चे मां को ही सौंपे जाते हैं। लेकिन बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी चाहे मां को मिले या पिता को, वे किसी एक के प्यार से वंचित रह जाते हैं।

इसलिए हर मायनों में साझा परवरिश की अवधारणा बच्चों के हित में है और इसलिए विधि आयोग ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षण कानून और अभिभावक एवं आश्रित कानून में बदलाव की संस्तुति की है। हमें मानना होगा कि विचारधाराओं का टकराव और अलगाव पति-पत्नी का होता है, बच्चों का नहीं। इसलिए अगर तलाक अपरिहार्य हो जाए, तो भी उन्हें अपने बच्चों को प्यार और संरक्षण के अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए। यह बच्चों के भविष्य के लिए भी जरूरी है।
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