कैंसर से समय पर सतर्क होने और उससे जूझने की क्षमता हमारी बहुसंख्यक गरीब आबादी के पास नहीं है। कैंसर के अस्पतालों का अकाल तो है ही, उचित अस्पतालों तक गरीबों की पहुंच बड़ी मुश्किल है। हर महीने आंखों के सामने, आसपास और जानने वालों को कैंसर से तबाह होते देखा जा सकता है। कीमोथेरेपी के लिए गरीब मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भागते देखा जा सकता है। जिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कम कीमत पर कीमोथेरेपी संभव है, वहां प्रतीक्षा सूची लंबी है।
निजी अस्पतालों का खर्च गरीबों के बाहर है। आयुष्मान योजना का लाभ बिना उपयुक्त अस्पताल और योग्य डॉक्टर के नहीं मिलने वाला। ऐसे में कैंसर के गरीब मरीजों के पास हर हाल में मौत एकमात्र विकल्प बचता है, मगर यह कैंसर मौत तक पहुंचने के पूर्व परिवारों को भी निचोड़ मारता है। इलाज के लिए अस्पताल दर अस्पताल भागते, घर, गहना बेचते गरीब मरीज के साथ, उसका पूरा परिवार तबाह हो जाता है। देश के जो बड़े अस्पताल हैं, वहां कैंसर के मरीजों का नंबर आने से पूर्व ही उनकी मौत करीब खिसक आती है।