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घातक भोजन के खिलाफ मुहिम

अनिल प्रकाश जोशी Updated Mon, 15 Oct 2018 07:17 PM IST
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अनिल प्रकाश जोशी

तथाकथित विकास की एक और देन को भयावह कहा जा सकता है और वह है फास्ट फूड। मतलब झटपट बाजारी खाना। आज इसका चलन इस हद तक बढ़ चुका है कि देश दुनिया के कई घरों में रसोई बंद हो चुकी है। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि आज हमारी थालियों से अपने ही व्यंजन गायब होने शुरू हो गए हैं। हमारे भोजनों पर इस नए आक्रमण के कई शारीरिक व आर्थिक नुकसान भी जुड़े हैं। फास्ट फूड का दुनिया में व्यापार 570 अरब डॉलर तक पहुंच गया है और ये कई देशों की जीडीपी से भी बढ़कर हैं। अमेरिका में वर्ष 2015 में यह 200 अरब डॉलर के आसपास रहा है। बड़ी बात यह है कि इस उद्योग की गति बड़ी तेज है। दुनिया में इस उद्योग की वार्षिक प्रगति दर 2.5 फीसदी आंकी गई है, जो आगे बढ़ेगी ही बढ़ेगी।



दुनिया में आज फास्ट फूड की तूती बोल रही है। यह चोखे धंधे में आता है। दस बड़े फास्ट फूड ब्रांड के स्टोर दुनिया में सब जगह हैं। मैक्डॉनल्स, स्टारबक, सबवे, केएफसी और पिज्जा हट जैसे ब्रांड अरबों डॉलर का कारोबार कर रहे हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक 33.66 फीसदी भारतीय हफ्ते में कम से कम दो बार जंक फूड खाते हैं। दुनिया में फास्ट फूड उपभोक्ता के रूप में भारत का 10वां स्थान है और वह प्रति व्यक्ति अपनी कमाई का 2.17 फीसदी इसी पर खर्च करता है।


असल में पश्चिम से हुई जंक फूड की पैरवी के पीछे यही दलील थी कि ज्यादा कैलोरी व ठीकठाक पोषक तत्वों वाला यह फूड कई तरह के रोजमर्रा के झंझटों से भी मुक्त रख सकता है। मतलब चूल्हे और बर्तनों की पीड़ा से दूर फास्ट फूड लंबे समय तक चलने वाला भोजन है। जबकि ऑर्गन हेल्थ व साइंस यूनिवर्सिटी के एक शोध ने बताया है कि फास्ट फूड के कई रसायन सीधे दिमाग में असर डालते हैं और इनसे लगातार खाने की लत बढ़ती है। फास्ट फूड में ट्रांस फैट होती है, जो पचाई नहीं जा सकती। दुनिया के कई देशों में इस तरह के भोजन पर रोक लगी है। ऐसे भोजन से मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है, पर इसकी बड़ी चर्चा नहीं होती। अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में फास्ट फूड का विरोध शुरू हो गया है, क्योंकि यह सबके लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। मोटापा, हृदय व गुर्दे के रोगों की बढ़ोतरी के बीच फास्ट फूड को भी दोषी ठहराया जा रहा है, क्योंकि इनमें नमक, मसाला व वसा की मात्रा अधिक होती है, जिनसे हमारे शरीर के कई अंगों पर सीधा असर पड़ता है। दिमागी सुस्ती के पीछे के कई कारणों में फैटी फूड भी आता है। ब्रिटेन के कैंसर रिसर्च ने 11-19 साल के बच्चों पर केंद्रित खानपान को लेकर अध्ययन में पाया कि ज्यादा कैलोरी फैट व शुगर से मोटापा बढ़ता है और कई तरह की बीमारियां फैलती हैं। इस तरह के भोजन में पोषक तत्वों की कमी होती है और इनमें प्रयोग की जाने वाली कृत्रिम गंध व रंग भी हानिकारक होते हैं। यही नहीं, महिलाओं में इनके लगातार सेवन से हार्मोन्स की कमी आती है। कुछ वर्ष पूर्व एक ब्रांड विशेष के नूडल्स को हमारे देश में जमकर विरोध झेलना पड़ा था, जिसमें सीसा और धातु भस्म की मात्रा निर्धारित मात्रा से कई गुना ज्यादा पाई गई थी और कंपनी को 3,000 करोड़ की सीधी चपत लगी थी। सरकारों को अब इस पर गंभीर हो जाना चाहिए, क्योंकि बीमार समाज देश को ही बीमार कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि फास्ट फूड पर भी उसी तरह की चेतावनी देनी चाहिए, जैसी कि तंबाकू उत्पादों पर होती है। इसमें नैतिकता दिखाने की भी बड़ी जरूरत है और यह कहीं न कहीं सरकार की जिम्मेदारी भी बनती है कि इस तरह के भोजनों पर रोक न भी लगा सके, तो जानकारियां बढ़ाने का काम करें, ताकि इस तरह के भोजन पर अंकुश लग सके। 

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