फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

इन दिशा-निर्देशों से क्या बदलेगा

जगदीप एस छोकरृ
Updated Sun, 14 Oct 2018 04:36 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट

पांच राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई है। इसी के साथ इन राज्यों में न केवल चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है, बल्कि आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है। स्वाभाविक है, मतदाताओं को उम्मीद होगी कि सभी राजनीतिक दल स्वच्छ एवं साफ छवि के उम्मीदवार मैदान में उतारें, ताकि राजनीति में आपराधिक छवि के उम्मीदवारों का प्रवेश बंद हो। हालांकि राजनीति को स्वच्छ बनाने एवं चुनावी सुधार की बातें एक लंबे अर्से से हो रही हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि राजनीति के गलियारे में आपराधिक छवि के उम्मीदवारों का प्रवेश निरंतर जारी है।



पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की सांविधानिक पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने से तो इन्कार कर दिया, लेकिन उसने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और संबंधित राजनीतिक दलों के लिए पांच दिशा-निर्देश जारी किए हैं। पहला, प्रत्येक चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को निर्वाचन आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए प्रपत्र भरने होंगे और उन प्रपत्रों में आवश्यक सभी विवरण शामिल होने चाहिए। दूसरा, उसमें उम्मीदवार के खिलाफ लंबित सभी आपराधिक मामलों को बड़े अक्षरों में बताया जाएगा। तीसरा, अगर कोई उम्मीदवार किसी खास राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ता है, तो उसे अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की सूचना राजनीतिक दल को देने की जरूरत है। चौथा, संबंधित राजनीतिक दल को उम्मीदवार से संबंधित सभी पूर्ववर्ती आपराधिक मामलों की जानकारियों को अपनी वेबसाइट पर बताना होगा। पांचवां, उम्मीदवार के साथ-साथ संबंधित राजनीतिक दलों को व्यापक प्रसार वाले स्थानीय समाचार पत्रों में उम्मीदवार के आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में एक घोषणा जारी करनी होगी और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उसका व्यापक प्रचार करना होगा। शीर्ष अदालत ने व्यापक प्रचार का मतलब स्पष्ट करते हुए कहा कि नामांकन के बाद कम से कम तीन बार इस संबंध में प्रचार करना होगा।

 

जहां तक पहले दिशा-निर्देश का मामला है, तो इसमें नया कुछ नहीं है। वर्ष 2002 के सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश के बाद से पिछले सोलह वर्ष से ऐसा हो रहा है। मेरा मानना है कि अदालत का अपने पुराने आदेश को दोहराने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि पिछले सोलह वर्षों से इस दिशा-निर्देश के बावजूद आपराधिक छवि के लोगों का राजनीति में प्रवेश जारी है। दूसरे निर्देश में उम्मीदवारों को बड़े अक्षरों में अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी देने के लिए कहा गया है, लेकिन इससे क्या फर्क पड़ेगा? यह वास्तव में बहस का विषय है कि इससे कुछ फर्क पड़ सकता है या नहीं। उम्मीदवारों से अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी अपने राजनीतिक दल को देने संबंधी निर्देश का भी कोई मतलब नहीं है, क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल अगर किसी को टिकट देता है, तो वह उम्मीदवार का पिछला इतिहास खंगालकर ही देता है। इस निर्देश से ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल बिना उम्मीदवारों के बारे में कोई जानकारी रखे ही उन्हें टिकट देते हैं।


सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर डालेंगे। और सबसे बड़ा सवाल यह है कि शीर्ष अदालत के इन दिशा निर्देशों का अनुपालन हो रहा है या नहीं, उसकी निगरानी कैसे की जाएगी और इसकी निगरानी कौन करेगा। और मतदाताओं से यह उम्मीद करना भी बेमानी है कि वे राजनीतिक दलों की वेबसाइट पर जाकर अपने उम्मीदवारों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारियां खंगालेंगे। यह वास्तविकता से परे है और अगर ऐसा संभव भी है, तो कितने फीसदी मतदाता ऐसा करेंगे? खासकर, देश के दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में जहां, इंटरनेट तक पहुंच आज भी बहुत कम है और लोगों में जागरूकता की भी भारी कमी है, वहां ऐसा संभव नहीं है।


इसके अलावा, किसी भी राजनीतिक दल से यह अपेक्षा करना कितना यथार्थवादी है कि वह अपने उम्मीदवार के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी इलाके के व्यापक प्रसार वाले समाचार पत्र में प्रकाशित करवाएगा और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में उसका व्यापक प्रचार करेगा? आखिर कोई भी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार के खिलाफ ऐसी जानकारी का प्रचार क्यों करेगा, जो उसके हित में न हो!


माननीय शीर्ष न्यायालय का संसद को आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की भावभीनी अपील करने का क्या असर होगा और क्या नहीं होगा, यह तो इस तथ्य से पता चलता है कि 2002 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने उम्मीदवारों को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि को सार्वजनिक करने का आदेश दिया था, तो संसद ने सर्वसम्मति से कानून में संशोधन करके सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नकार दिया था। 2002 के बाद कई बार चुनाव आयोग ने सरकार को लिखा है कि इस तरह का कानून बनाना चाहिए। इसके अलावा विभिन्न स्वैच्छिक संस्थाओं ने भी इस बारे में कई बार मांग की है, लेकिन राजनीतिक दलों पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। न तो सरकार आपराधिक छवि के उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने का कानून बनाना चाहती है और न ही राजनीतिक दल इस तरह के उम्मीदवारों को टिकट देने से बाज आते हैं। इन हालात में, सर्वोच्च न्यायालय का गेंद संसद के पाले में डालते हुए यह कहना कि वह समय आ गया है, जब संसद को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गंभीर आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे लोग चुनावी क्षेत्र में प्रवेश न करें, निरर्थक-सा लगता है।

 

जो काम सोलह साल से संसद ने नहीं किया है, वह सर्वोच्च न्यायालय के कहने पर अब उसे करेगी, मैं इस बारे में आशावादी नहीं हूं। मेरे विचार में सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना चाहिए था कि जब तक संसद इस बारे में कानून नहीं बनाती, तब तक आपराधिक मुकदमों का सामना करने वाले लोग चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।
विज्ञापन


असलियत तो यही है, लेकिन फिर भी यह तो देखना ही पड़ेगा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का क्या असर होता है।


-लेखक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संस्थापक हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next