यूपीए सरकार के 2009 में दोबारा सत्ता में आने के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को भोपाल से आई पांच दिलचस्प चिट्ठियां मिलीं। पहली चिट्ठी में नए आईआईटी संस्थान खोलने की सरकार की योजना को आड़े हाथ लिया गया था। इसमें यह भी लिखा था कि नए संस्थानों के लिए अच्छी फैकल्टी ढूंढ पाने में काफी मुश्किलें आएंगी। चिट्ठी के मुताबिक सरकार बेशक शिक्षा में उत्कृष्टता लाने की बात कर रही है, मगर सरकार की यह योजना ऐसे सभी संस्थानों को औसत बनाकर रख देगी। चिट्ठी लिखने वाले ने प्रधानमंत्री को नए आईआईटी खोलने के बजाय मौजूदा आईआईटी संस्थानों को बेहतर बनाने का सुझाव भी दिया था, ताकि ये वाकई उत्कृष्टता के केंद्र बन सकें।
प्रधानमंत्री को लिखी गई दूसरी चिट्ठी में लिखा था कि तकनीकी उत्कृष्टता के प्रयासों को मानविकी शाखा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का भी साथ मिलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो सका, तो केवल इंजीनियरिंग शिक्षा पर फोकस करने का नतीजा यह होगा कि भारत में ऐसे अत्यधिक कुशल रोबोट पैदा होने लगेंगे, जो जैविक स्तर पर तो इंसान होंगे, मगर उनका नजरिया बेहद संकीर्ण और केवल तकनीक के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ होगा।
बिगड़ती कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर लिखी गई भोपाल के इस शख्स की तीसरी चिट्ठी में पुलिस अधिकारियों और नौकरशाहों को इसके लिए उतना ही दोषी माना गया था, जितना कि राजनेताओं को। यह शख्स लिखता है, 'चाहे ट्रैफिक के नियमों की अनदेखी हो, या सांप्रदायिक भावना भड़काना, दंगों या आतंकवाद के जरिये सामूहिक हत्याएं कराना हो या फिर भ्रष्टाचार, दिक्कत यह है कि हम दोषियों को सजा ही नहीं देते। इस स्थिति को कैसे सुधारा जाए? एक तरीका यह हो सकता है कि आईएएस, आईपीएस और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों में से उन सभी को निकाल बाहर किया जाए, जो अयोग्य, काम से जी चुराने वाले, पक्षपाती और भ्रष्ट हैं। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि जिला स्तर के अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली विकास परियोजनाओं के लिए निजी तौर पर उत्तरदायी बनाया जाए। वहीं, जिलाधिकारी को इतनी ताकत मिलनी चाहिए कि वह अपने अधीनस्थों के खिलाफ कार्रवाई कर सके और राजनेताओं को साफ तौर पर बता सके कि इस मामले में किसी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।'
चौथी चिट्ठी में प्रधानमंत्री को आगाह किया गया था कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका को जरूरत से ज्यादा सम्मान न दें और अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के मद्देनजर भारत के अधिकार को मजबूती के साथ व्यक्त करें। चिट्ठी में लिखा था, 'बगैर किसी शोरगुल के हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब भी कोई अमेरिकी खुफिया अधिकारी भारत आए, तब उच्चतम स्तर पर उसे आईबी या रॉ के उप-निदेशक स्तर तक के अधिकारी तक से ही मिलने की अनुमति हो। ऐसा ही व्यवहार अमेरिका भी हमारे साथ करता है।'
पांचवीं चिट्ठी में तर्क दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद-15 और 16 जाति आधारित भेदभाव को खारिज करते हैं, इसलिए सभी तरह के सकारात्मक विभाजन जाति के आधार पर न होकर, श्रेणी के आधार पर होने चाहिए। जिस जाति आधारित जनगणना को अंग्रेजों ने भारत को बांटने के लिए शुरू किया था, उसे फिर से शुरू करने के सरकार के फैसले को लेकर चिट्ठी में निराशा जाहिर की गई थी।
ये चिट्ठियां लिखने वाला भोपाल का वह ज्ञानी (और साहसी) व्यक्ति कौन था? इनका नाम था, एम एन बुच, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में आने से पहले कैंब्रिज में अर्थशास्त्र की पढ़ाई कर चुके थे। उनकी शुरुआती पोस्टिंग मध्य प्रदेश के बैतूल में हुई थी, जहां उन्होंने आदिवासी जीवन को आत्मसात किया। बाद में यह नौकरी उन्हें मध्य प्रदेश के दूसरे हिस्सों में ले गई, जहां उन्होंने खुद को उन लोगों की जिंदगी से गहराई से जोड़ा, जिन लोगों की देखभाल और बेहतरी का जिम्मा उन पर था। बाद में, वह भोपाल में सचिवालय से जुड़े और वन सचिव और न्यू टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख की भूमिका निभाई।
सिविल सेवा में अपने करियर के अंतिम चरण में एम एन बुच शहरी मामलों के विशेषज्ञ बन गए थे। वह शहरी इलाकों को जोनों में बांटने के पक्षधर और शहरों में खतरनाक औद्योगिक इकाइयों के विरुद्ध चेतावनी देने में अग्रणी थे। उन्होंने जोर देकर कहा था कि यूनियन कार्बाइड के प्लांट को भोपाल के बाहर भेजा जाना चाहिए। अगर उनके वरिष्ठों ने उनकी बात सुनी होती, तो दिसंबर, 1984 में गैस के रिसाव से हुआ नुकसान कम होता।
1984 के प्रारंभ में ही बुच आईएएस से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके थे। दूर की न सोचने वाले नेताओं की कार्यशैली से उकता कर उन्होंने खुद राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। अपने प्रिय बैतूल से उन्होंने 1984 का लोकसभा चुनाव बतौर निर्दलीय प्रत्याशी लड़ा। मगर कांग्रेस के प्रत्याशी हॉकी खिलाड़ी असलम शेर खान के हाथों उन्हें 30 हजार वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा। दरअसल, इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से उस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जबर्दस्त लहर थी। बुच के पास चुनाव में खर्च करने के लिए न के बराबर पैसा था। इसके बावजूद चुनाव में बुच का प्रदर्शन बताता था कि बैतूल के लोग उन्हें कितना चाहते थे।
फिर बुच ने शिक्षा और विभिन्न मुद्दों पर दृढ़ता से विचार रखने की ओर रुख किया। उन्होंने शहरी नियोजन पर तमाम किताबें लिखीं। इसके अलावा आईएएस के पद पर अपने शुरुआती वर्षों पर उन्होंने एक जीवनी भी लिखी है। मगर, उनकी सबसे शानदार किताब शायद मध्य प्रदेश के वनों पर है, जिसमें दिल्ली में पले-बढ़े इस काठियावाड़ी ने अपने दत्तक राज्य (मध्य प्रदेश) की पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक विविधता पर सुंदर ढंग से रोशनी डाली है।
इस महीने की शुरुआत में महेश बुच के निधन पर हमारे एक साझा मित्र ने उन्हें 'खुलकर विचार रखने वाले, मगर दुराग्रही नहीं' कहा। यह उनकी शख्सियत को बयान करने वाले सबसे उपयुक्त शब्द थे। एक बार मुझे बुच के साथ कार में नैनीताल से दिल्ली आने का मौका मिला। उस यात्रा के दौरान ज्यादातर वक्त मैं बस उन्हें सुनता ही रहा। मगर, मैं काफी खुश था, क्योंकि मेरी जानकारी में ऐसे बहुत कम नौकरशाह हैं, जो लोगों के साथ बुच जैसी गहराई से जुड़ पाते हों। मैं ऐसे किसी नौकरशाह को भी नहीं जानता, जो इतनी निर्भीकता के साथ सच को सत्ता के सामने प्रकट करने का दम रखता हो।
अंत में, बात उन चिट्ठियों की, जो महेश बुच ने प्रधानमंत्री को लिखी थी। डॉ मनमोहन सिंह ने शिष्टता के साथ उनका जवाब दिया, और इन्हें अपनी फाइल में जगह दी। पर उन सुझावों पर अमल करने का संकेत शायद ही दिखा हो। हालांकि इनमें जो लिखा है, वह आज भी प्रासंगिक है। हमारी नई सरकार आईआईटी संस्थानों के प्रसार को लेकर पिछली सरकार से भी ज्यादा जल्दबाजी में दिख रही है। यह सरकार अमेरिका के प्रति भी ज्यादा झुकाव रखती दिख रही है।
एक दूसरे आईएएस अधिकारी के निधन पर प्रताप भानु मेहता ने लिखा है, 'चूंकि अच्छे आईएएस अधिकारियों की आधुनिक भारत में कोई जगह रह नहीं गई है, इसीलिए शायद भगवान को खुद के लिए अच्छे नौकरशाहों की जरूरत पड़ती रहती है।' मुझे लगता है कि यही वजह है कि भगवान को महेश बुच को भी बुलाना पड़ा। लेकिन अगर यही हाल रहा, तो शायद जल्द ही भगवान को अपने कामों के लिए भी काबिल अधिकारियों की किल्लत हो जाएगी।