पंद्रह अगस्त को अपने संबोधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई आलोचना मोल ली है कि वह कई मुद्दों पर एक साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। इससे पहले से आस लगाए लोगों की उनसे उम्मीदें और बढ़ गई हैं। यह उन्हें मुसीबत में डाल सकता है। आलोचक, जिनमें उनके कुछ समर्थक भी शामिल हैं, अब मोदी के उस सामाजिक सुधार के एजेंडा को निशाना बना रहे हैं, जिसकी घोषणा उन्होंने लाल किले के प्राचीर से की। मोदी ने कहा था कि वह एक वर्ष के अंदर भारत के हर स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था करवाएंगे और महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में वर्ष 2019 तक देश को गंदगी से मुक्त कराएंगे। आलोचकों का सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री को समाज सुधारक की भूमिका अपनानी चाहिए, और क्या 15 अगस्त का मौका शौचालय जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए उपयुक्त था?
निस्संदेह प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों की उम्मीदें आसमान तक बढ़ाई हैं। इन्हें पूरा करना प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लोगों की इन उम्मीदों को धरातल पर उतारना इतना आसान नहीं है। स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, फ्रेट कॉरिडोर, बुनियादी ढांचे का निर्माण, ये ऐसी चीजें हैं, जिनके पूरा होने पर बदलाव स्पष्ट नजर आएगा, मगर ये ऐसे वायदे हैं, जिन्हें पूरा करने में अभी वक्त लगेगा। जरूरी चीजों के दामों में भी कमी नहीं आई है, जैसा कि लोग आस लगाए बैठे थे। यूपीए सरकार के पतन के पीछे आखिर महंगाई भी एक बड़ा कारण थी।
यह नई सरकार के लिए शुभ शगुन नहीं है, जबकि आने वाले कुछ महीनों में भाजपा महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों का सामना करने वाली है। अगर पार्टी लोकसभा चुनाव के जैसा प्रभाव बनाए नहीं रख पाती है और महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को सत्ता से बेदखल नहीं कर पाती है, तो उसकी यह चमक भी फीकी पड़ने लगेगी। हालांकि मोदी पहले की तरह ही लोगों की उम्मीदें बढ़ा रहे हैं। इन सबके बावजूद मोदी ने शौचालय का एक प्रासंगिक मुद्दा उठाया है, जिसे पूरा किया जा सकता है; बशर्ते कि प्रधानमंत्री तथा भाजपा की राज्य सरकारें, कंपनियों और उनके सीएसआर (कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी) फंड, विशेषज्ञ तथा स्थानीय प्रशासन इसके लिए साझा प्रयास करें। प्रधानमंत्री ने उद्योगों को जो कर में छूट और विशेष आर्थिक क्षेत्र का वायदा किया है, उसे भी इससे जोड़ना चाहिए। यदि इस वायदे पर आधा भी अमल हो जाए, तो देश न सिर्फ बड़े बदलाव का गवाह बन जाएगा, बल्कि देश को उस बेबसी से उबरने में भी मदद मिलेगी, जो उसे सात दशकों से झेलनी पड़ रही है।
प्रधानमंत्री जानते थे कि इस मुद्दे पर बात करने के लिए लाल किले से अच्छी कोई जगह नहीं हो सकती थी, जब देश-दुनिया के लाखों भारतीय उन्हें सुनने बैठे थे। और स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में इस मुद्दे को जगह देकर प्रधानमंत्री ने इसे वह महत्व दिया है, जिसका यह हकदार था। क्योंकि जब तक कोई मुद्दा राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में नहीं आता, उसके समाधान के लिए जिस तरह के प्रयास की जरूरत होती है, वह नहीं किए जाते।
दरअसल 'लड़कियों के लिए शौचालय' एक ऐसा विचार है, जो उस वर्ग के जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, जो हमारे समाज में सबसे नीचे है। लड़कियां शौचालय नहीं होने की वजह से या तो स्कूल छोड़ देती हैं या फिर जंगल में जाने को विवश होती हैं, जहां उनके 'शिकार' बनने की आशंका होती है। अगर वह निबटने के लिए अपने समूह में नहीं जा पातीं, तो घंटों इसे रोकने के लिए मजबूर होती हैं, जिस कारण उन्हें कई बीमारियां भी हो जाती हैं। यह सामाजिक समूह सबसे वंचित वर्ग से जुड़ा है और इसमें काफी हद तक ग्रामीण क्षेत्रों में दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक शामिल हैं। ये सिर्फ जाति और वर्ग के आधार पर ही नहीं, लिंग के आधार पर भी भेदभाव का शिकार होते हैं। लिहाजा 'लड़कियों के लिए शौचालय' बुनियादी स्तर पर गरिमा के अधिकार पर केंद्रित है।
इसके साथ ही शौचालय बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करेगा और उनमें बेहतर स्वास्थ्य भी सुनिश्चित करेगा, जिसका परोक्ष असर उनके गर्भ में पलने वाली नई पीढ़ी पर होगा। आज आलम यह है कि कुपोषण के मामले में हम अफ्रीकी देशों से भी पीछे हैं, क्योंकि अपने देश में महिलाएं रक्ताल्पतता, बेहतर स्वास्थ्य और पर्याप्त वजन की कमी से जूझ रही हैं, जिस कारण वे कुपोषित बच्चे को जन्म देती हैं। अपने देश में पांच वर्ष से कम उम्र के कुल बच्चों में से अगर आधे कुपोषित रहेंगे, तो भारत भला कैसे क्षेत्रीय या वैश्विक ताकत बन सकता है? हमारी आबादी कैसे बेहतर उत्पादन कर पाएगी और हमारा सकल घरेलू उत्पाद कितना आगे बढ़ेगा? इसलिए बिना किसी शंका के मोदी ने समस्या की जड़ पर हमला किया है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि वह इसे भला पूरा किस तरह करेंगे।
ऐसे में निश्चय ही मोदी के सामने वे औजार हासिल करने की चुनौती है, जिनके माध्यम से वह उन वायदों को पूरा करने में सक्षम हो सकें, जो उन्होंने किए हैं। ले-देकर उनकी नजरें गुजरात मॉडल की तरफ उठ रही हैं और वह उम्मीद कर रहे हैं कि नौकरशाहों की मदद से वह इसे पूरे देश में साकार करेंगे। लेकिन उन्हें समझना होगा कि यह मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर काम नहीं कर सकता, भले ही उन्होंने सरकारी अधिकारियों को समय पर दफ्तर आने के लिए आग्रह किया है। यह इतना बड़ा काम है कि इसे पूरा करने के लिए मोदी को न सिर्फ राजनीतिक, बल्कि गैर सरकारी संगठनों, मीडिया और उद्योग घरानों से भी सहयोग की जरूरत होगी। लेकिन हां, यह सहयोग बिना किसी डर तथा बाध्यता के होना चाहिए।