जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से बातचीत करने की वजह से भारत ने पाकिस्तान के साथ होने वाली विदेश सचिव स्तरीय वार्ता को रद्द कर दिया है। और इसी के साथ दोनों देशों के बीच बनते-बिगड़ते रिश्तों की पुरानी कहानी में एक नया मोड़ आ गया है। दरअसल भारत से संबंधित नीति के मद्देनजर कश्मीर के सवाल पर अपने नागरिकों को अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए पाकिस्तान पहले भी द्विपक्षीय वार्ताओं से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ बैठक करता आया है, और ऐसा भी नहीं है कि भारत को यह जानकारी न रहती हो। मगर इस बार भारत ने अलग रवैया दिखाया है। मोदी सरकार ने साफ किया है कि पाकिस्तान की हुर्रियत के साथ बातचीत सीधे तौर पर भारत के आंतरिक मामलों में दखल है, जो बर्दाश्त नहीं की जा सकती। यही नहीं, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने यह भी कहा, 'पाकिस्तान के सामने यही रास्ता बचा है कि वह शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के तहत शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता के जरिये दोनों देशों के बीच चल रहे प्रमुख विवादों का समाधान ढूंढे।' इससे साफ होता है कि पिछले डेढ़ दशक से दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता के जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनमें मोदी सरकार को रत्ती भर भरोसा नहीं है।
वैसे पाकिस्तान की हुर्रियत से वार्ता की कई वजहें हो सकती हैं। मुमकिन है कि पाकिस्तान भारत की नई सरकार को परख रहा हो। अगर ऐसा है, तो उसे दो टूक जवाब मिल चुका है। उसे नरेंद्र मोदी की मजबूरियों को पहले ही समझ लेना चाहिए था। वह इस वायदे के साथ सत्ता में आए हैं कि वह पाकिस्तान को लेकर कड़ा रुख अपनाएंगे। ऐसे में, प्रधानमंत्री नहीं चाहेंगे कि पाकिस्तान को लेकर अब तक जिस तरह का रवैया चल रहा था, वह कायम रहे। दूसरी ओर, पाकिस्तान का बयान भी काबिले गौर है। उसका कहना है कि पाकिस्तान पहले भी ऐसी वार्ताएं करता आया है, ताकि कश्मीर के मुद्दे पर सार्थक बातचीत हो सके। मगर यह समझना भी जरूरी है कि हाल के समय में पाकिस्तान की ओर से भारत को कुछ और संदेश भी मिले हैं। पिछले दो हफ्तों में पाकिस्तान युद्धविराम का कई बार उल्लंघन कर चुका है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। मानसून के मौसम में जब पहाड़ों पर जमी बर्फ पिघलने लगती है, पाकिस्तान ऊंचे पहाड़ी रास्तों के जरिये अपने आदमियों और सामान को भारत में अवैध ढंग से प्रवेश कराने की कोशिशें करता है। अगर पाकिस्तान की तरफ से होने वाली इस फायरिंग को हुर्रियत के साथ हुई वार्ता के साथ जोड़कर देखा जाए, तो स्पष्ट है कि पाकिस्तान में अब भी वे ताकतें हावी हैं, जो दोनों देशों के बीच कड़वाहट को बनाए रखना चाहती हैं। यह ताकत और कोई नहीं पाकिस्तानी सेना है।
नवाज शरीफ को इमरान खान और ताहिर अल-कादिरी की तरफ से जिस आंतरिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, उसे लेकर भी सेना उदासीन दिख रही है। गौरतलब है कि सेना पर नियंत्रण रखना हमेशा से नवाज शरीफ का उद्देश्य रहा है। 1999 में सैन्य कारागार में बिताए गए महीने अब भी उनके जेहन में ताजा होंगे, जब जनरल परवेज मुशर्रफ ने उनकी सरकार का तख्ता पलट दिया था।
खैर अब अगर मोदी सरकार ने फैसला ले ही लिया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके दिमाग में जरूर कोई योजना होगी। हर कोई वाकिफ है कि पाकिस्तान और कश्मीर का मुद्दा बेहद नाजुक है। भारत बेशक इसे अपना आंतरिक मसला बताए, मगर न तो पाकिस्तान और न ही पूरी दुनिया ऐसा मानती है। सुनने में भले अच्छा न लगे, मगर वैश्विक समुदाय मानता है कि कश्मीर मुद्दे का समाधान हमें पाकिस्तान के साथ मिलकर ढूंढना होगा। फिर 1972 का शिमला समझौता भी विवादों के अंतिम समाधान के लिए द्विपक्षीय वार्ता की जरूरत को रेखांकित करता है। पाकिस्तान हुर्रियत को महत्व देकर यह जतलाना चाहता है कि वह कश्मीरियों की आवाज है। जबकि भारत का मानना है कि राज्य सरकार और लोकतांत्रिक चुनावों में सहभागिता करने वाले विपक्ष को ही कश्मीरियों का प्रतिनिधि माना जा सकता है। भारत का तर्क अपनी जगह सही है, मगर उसे प्रभावी ढंग से कश्मीरियों तक अपनी पहुंच बनाने की जरूरत है। और यही बात हुर्रियत पर भी लागू होती है। जब तक ऐसा नहीं होता घाटी के लोगों की असंतुष्टि कम नहीं हो सकती।
इसके अलावा, यह समझने की भी जरूरत है कि भारत में लोग पाकिस्तान को लेकर आजिज आ चुके हैं। फिर मुंबई हमलों के बाद से पाकिस्तान के साथ स्थायी शांति का ख्वाब दूर की कौड़ी जैसा है। भारतीय यह नहीं चाहते कि सरकार पाकिस्तान पर हमले जैसा कुछ करने का फैसला ले। ज्यादातर लोग यह चाहते हैं कि सरकार कुछ समय के लिए इस्लामाबाद की ओर पीठ करके उसे अनदेखा करे। मगर यह एक खतरनाक विकल्प भी साबित हो सकता है। पाकिस्तान जैसे आक्रामक पड़ोसी की तरफ से लापरवाह नहीं हुआ जा सकता। खासकर यह ध्यान रखते हुए कि पाकिस्तान एक परमाणु हथियार संपन्न देश है, जो विफल राष्ट्र होने की कगार पर खड़ा है, और जहां का एक शक्तिशाली तबका भारत को लेकर दुश्मनी पाले हुए है।
दरअसल अपनी सुरक्षा के लिए हमें एक संतुलित नीति अपनानी होगी। वार्ता को जारी रखते हुए अपना नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश ही समय की दरकार है। 1991 से भारत की यही नीति रही है, और इससे बेहतर समाधान अब तक कोई सरकार ढूंढ भी नहीं सकी है। शायद मोदी सरकार किसी ऐसे समाधान की तलाश में है, जिसके जरिये भारत-पाकिस्तान के बीच के विवाद को हमेशा के लिए खत्म किया जा सके। मगर इसके लिए उन्हें किस्मत और शुभकामनाओं पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा।
(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के जाने-माने फैलो हैं)