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अनुभूति: भाषिक सौंदर्य का मौन प्रस्थान, नाट्यशास्त्र में आचार्य भरत का दर्शन

गौतम चटर्जी
Updated Sun, 18 Jun 2023 06:48 AM IST

सार

सारे शब्द मौन के प्रणव आकाश से ही प्रकट हैं और शब्दों की घर वापसी मौन में ही विश्राम लेने से हो सकती है। नाट्यशास्त्र में आचार्य भरत यही सिखाते हैं कि शब्दों का उच्चारण ऐसा हो कि श्रोताओं में मौन का प्रभाव फैल जाए।
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Rasoolan Bai - फोटो : सोशल मीडिया


ऐसा क्यों होता गया कि समाज ने अपनी प्राचीन भाषिक समृद्धि इस शती में अधिक खोई है? अब प्रकाशित लेखों या विश्लेषणों में भाषिक अशुद्धि कोई विषय ही नहीं है। कबीर तत्कालीन समाज के लिए अनपढ़ थे, किंतु उनकी सधुक्कड़ी बोली में एक भी अक्षर अनुपयुक्त नहीं, बल्कि उस अपूर्व, अरूप अनुभूति के बारे में व्यक्त सभी सबद क्षरणहीन शब्दों में उत्कृष्ट पवित्रता की तरह अनुस्यूत हैं। स्वाभाविक है कि समय के साथ हम शब्दों के स्वरूप को बदलते और वरण करते हैं। लेकिन हृदय तो यही कहता है कि शब्दों को जस का तस ही रहने दिया जाए। जैसे, चींटी के पांव में मेहर बाजे सो भी साहब सुनता है। आज इसे समझाने के लिए अक्सर अध्यापक मेहर की जगह घुंघरू कर देते हैं। शब्दों को न बदल कर यदि पद के अभिधेय संदेश और तलस्पर्शी अनुभूति को साझा किया जाए, तो यह मनुष्य के आत्यंतिक प्रकाश को भी छूएगा और शोभन वचन भी रहेगा, जिसे वैदिक भाषा में सूक्ति कहा गया है।


लोक अनुश्रुत बोलियों का माधुर्य इसी आशय से जनगृहीत है। लोकगीतों और गायन में शब्दों का बनाव अपनी मिट्टी से जुड़ कर ही हृदयांकित होता रहा है। चैती हो या ठुमरी, श्रोता पश्चिम की नहीं, पूरब अंग की ही सुनना चाहते हैं, जैसे टप्पा पंजाब अंग का। आप प्रभा अत्रे और सिद्धेश्वरी देवी से चैती और ठुमरी सुनिए, अंतर दिख जाएगा। इसके बावजूद शब्दों के उच्चारण में अंतर होता रहता है। लोकप्रिय चैती है, एहीं ठइयां मोतिया हेराइल हो रामा...। पूरब अंग, विशेषकर बनारस में भोजपुरी काशिका और अवधी के शब्दों के साथ विकसित हुई है। 'हेराइल' की जगह 'हेरा गइल' का प्रयोग चलता है, लेकिन ‘एहीं’ की जगह ‘यहीं’ का प्रयोग बताता है कि हम भोजपुरी से खड़ी बोली में कब आ गए, हमें ही पता नहीं। यही वह जगह है, जहां मेरा मोती खोया या मेरा मोती यहीं पर कहीं खोया, इस भाषा में सोचते हुए हमने कब ‘एहीं’ को ‘यहीं’ कर दिया, हम खुद भूल बैठे। यदि ठइयां बोल रहे तो ‘एहीं’ को ‘यहीं’ क्यों कर रहे? सिद्धेश्वरी देवी और रसूलन बाई ‘एहीं’ गाती थीं।


सविता देवी दिल्ली गईं, तो ‘यहीं’ हो गया। निर्मला देवी मुंबई गईं, तो भी ‘एहीं’ बदल कर ‘यहीं’ हो गया। ऐसे बदलाव की ओर हमारा ध्यान प्रायः नहीं जाता। सिद्धेश्वरी देवी की प्रिय शिष्या कौमुदी मुंशी ‘याही’ गाती थीं, क्योंकि उनके उच्चारण में गुजराती प्रभाव था। बनारस में तबला-शिल्पी लच्छू महाराज के घर एक बार निर्मला देवी से मैंने यह पूछ लिया था, तो उन्होंने बड़े प्यार से कहा था कि क्या करें, जब तक बनारस में रहे, तो एहीं ठइयां गाते रहे और अब मुंबई चले गए, तो यहीं ठइयां हो गया। अब हम आपन हेराइल मोतिया ओही ठइयां न ढूंढब!


इस प्रसंग में वैदिक आर्यभाषा या कबीर की संध्याभाषा दुर्निवार या प्रत्यग्र लग सकती है। लेकिन इसके पीछे जो अक्षर है, अक्षत तत्व की अरूप अनुभूति का अहर्निश स्पर्श है, उसे हम कैसे विस्मृत कर सकते हैं? विचार या मन तो चाहेगा ही, हम इस शाश्वत और अक्षुण्ण मौन को शब्दों से दूर रखें। लेकिन हम इस तथ्य से विदा नहीं ले सकते कि सारे शब्द मौन के प्रणव आकाश से ही प्रकट हैं और शब्दों की घर वापसी मौन में ही विश्राम लेने से हो सकती है।


नाट्यशास्त्र में आचार्य भरत यही सिखाते हैं कि शब्दों का उच्चारण ऐसा हो कि श्रोताओं में मौन का प्रभाव फैल जाए। क्या ऐसा शास्त्रीय या लोक गायन से हम कर पाते हैं? भाषिक सौंदर्य का जो मौन प्रस्थान हम समाज में देख रहे, वह मौन प्रस्थान नहीं, बल्कि ऐसी चुप्पी है, जो शव या मृत्यु के साथ चलती है। मौन प्रस्थान हम उसे कह रहे, जिसे ऋषि-मुनिगण अपने ध्यान (या रचयित्री शक्ति) को शब्दों से हटाकर मौन पर केंद्रित करने का सुझाव देते हैं। और यह कहीं भी हो सकता है। इसके लिए काशी या वृंदावन में रहना जरूरी नहीं। मन के प्रति मरना जरूरी है। मगहर कबीर के लिए ऐसा ही मन बना। यह प्रतीक भाषा या स्वयं वैदिक या कबीर साहब की संध्याभाषा ही है। इस आनुष्ठानिक मृत्यु के क्षण ही प्रेम की यह अनुभूति हमें नए सिरे से रचती है, किसी शाश्वत अभिप्राय के लिए हमारा पुनर्नवा करती है।

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