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समाज: आरक्षण के लाभ से वंचित होता पिछड़ा वर्ग, राज्य सरकार की नीतियां जिम्मेदार

अवधेश कुमार
Updated Sat, 17 Jun 2023 08:00 AM IST

सार

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार की नीतियों के कारण पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित होना पड़ रहा है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


पहले बिहार की बात। बिहार में क्रीमी लेयर से नीचे आने के लिए आर्थिक प्रमाण पत्र में माता-पिता के साथ भाई-बहनों की आय का भी लेखा-जोखा लिखा जाता है। यही नहीं, उसमें कृषि आय भी शामिल है। परिणामतः अनेक लोग, जिन्हें आरक्षण मिलना चाहिए, वंचित रह जाते हैं।


बिहार में नीतीश कुमार एवं लालू प्रसाद, दोनों मंडलवादी राजनीति के कारण शीर्ष पर पहुंचे। दोनों नेता आज भी स्वयं को पिछड़ी जातियों का मसीहा घोषित करते हैं और उनकी राजनीतिक शक्ति का मूलाधार यही है। वही लोग अगर अपने शासन की नीतियों से पिछड़ी जातियों को आरक्षण से वंचित कर रहे हैं, तो इसे क्या कहा जाए? बिहार के पिछड़ी जाति के लोगों को इस सच्चाई को समझना चाहिए।


पश्चिम बंगाल में 179 जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया है, जिनमें से 118 जातियां मुस्लिम समुदाय से हैं और शेष यानी 61 जातियां हिंदू समुदाय से। मुसलमानों में पिछड़े वर्ग से आने वाले पात्रों को आरक्षण की परिधि में रखना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन यह तो विचार करना पड़ेगा कि आखिर हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों में पिछड़ी जातियां क्यों हैं? इस बारे में जब आयोग ने पूछा, तो बताया गया कि अनेक पिछड़ी जातियां हिंदू से मुस्लिम धर्म में परिवर्तित हो गईं। हालांकि राज्य सरकार के पास यह आंकड़ा नहीं है कि कितनी जातियों के कितने लोग मुस्लिम धर्म में परिवर्तित हुए।


पश्चिम बंगाल में 1971 के बाद लगातार मुसलमानों की आबादी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 1981 में वहां मुसलमानों की आबादी 21.5 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 27.05 प्रतिशत हो गई। जनसंख्या के अनुपात में यह असामान्य वृद्धि है। इस समय अनुमानतः बंगाल में मुसलमानों की आबादी करीब 30 प्रतिशत है। क्या इसके पीछे आरक्षण की भूमिका है?


राजस्थान में तो सात जिलों में पिछले अनेक वर्षों से किसी को भी अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र ही नहीं मिला है, जबकि इन जिलों में बड़ी संख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग रहते हैं। राजस्थान में भी लगभग बिहार की तरह आय प्रमाण पत्र का आधार तय किया गया है और इस कारण भारी संख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाले पात्र आरक्षण से वंचित हो रहे हैं।


थोड़ी गहराई से देखें, तो साफ दिख जाएगा कि इन तीन राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण का लाभ मुस्लिम समुदाय को ज्यादा मिल रहा है। साफ है कि इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति है। 2018 में नरेंद्र मोदी सरकार ने जब पिछड़ा वर्ग आयोग को सांविधानिक दर्जा दिया, तो राज्यों को अपने यहां  पिछड़े वर्ग की सूची में जातियों को शामिल करने की छूट मिली। इन तीनों राज्यों सहित कई अन्य राज्यों ने भी भारी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसमें शामिल किया।
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इससे साफ है कि वोट बैंक की राजनीति ने किस तरह आरक्षण व्यवस्था का घातक दुरुपयोग किया है। यह सब राज्य सरकार की नीतियों के कारण ही हुआ है। दूसरे समुदाय के लोगों को इस तरह आरक्षण का लाभ दिए जाने का अनैतिक आधार बनाए रखना क्या अवसरों की समानता का पर्याय हो सकता है? अगर आरक्षण का आधार संविधान के अनुच्छेद 16 और 16 ए हैं, तो यह नीति उसके अनुकूल नहीं मानी जा सकती। अतः समय आ गया है कि वस्तुपरक अध्ययन कर इसे दुरुस्त करने के कदम उठाए जाएं। हालांकि जब तक आरक्षण के लाभ से वंचित जातियां इसके विरुद्ध खड़ी नहीं होंगी, सरकारों को मजबूर नहीं करेंगी, तब तक ऐसा होना असंभव है।
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